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28 फ़रवरी 2015

नारियल का प्रयोग करे तो दूर होगी ये समस्याए ....!

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* आप सभी जानते हें की नारियल एक ऐसी वस्तु है जो कि किसी भी सात्त्विक अनुष्ठान, सात्त्विक पूजा, धार्मिक कृत्यों तथा हरेक मांगलिक कार्यों के लिये सबसे अधिक महत्व
पूर्ण सामग्री है. इसकी कुछ विभिन्न विधियों द्वारा हम अपने पारिवारिक, दाम्पत्य तथा आर्थिक परेशानियों से निजात पा सकते हैं जाने केसे करे ये उपाय ...!
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* यदि आपके व्यापार में लगातार हानि हो रही हो, घाटा रुकने का नाम नही ले रहा हो तो
गुरुवार के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में लपेटे. एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान के साथ आस-पास के किसी भी विष्णु मन्दिर में अपने संकल्प के साथ चढ़ा दें. तत्काल ही लाभ प्राप्त होगा. व्यापार चल निकलेगा.

* यदि धन का संचय न हो पा रहा हो, परिवार आर्थिक दशा को लेकर चिन्तित हो तो आप
शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मन्दिर में एक जटावाला नारियल, गुलाब, कमल पुष्प माला, सवा मीटर गुलाबी, सफ़ेद कपड़ा, सवा पाव चमेली, दही, सफ़ेद मिष्ठान एक जोड़ा जनेऊ के साथ माता को अर्पित करें. माँ की कपूर व देसी घी से आरती उतारें तथा श्रीकनकधारास्तोत्र का जाप करें. धन सम्बन्धी समस्या तत्काल समाप्त हो जायेगी.

* घर में किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्या हो और कोई भी परेशानी हो तो आप एक नारियल पर चमेली का तेल मिले सिन्दूर से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें. कुछ भोग (लड्डू अथवा गुड़ चना) के साथ हनुमान जी के मन्दिर में जाकर उनके चरणों में अर्पित करके ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें. तत्काल लाभ प्राप्त होगा.ये प्रयोग सात मंगलवार करे तो कर्ज से भी मुक्ति मिलती है आप प्रार्थना करे .

* किसी भी प्रकार की बाधा, नजर दोष, किसी भी प्रकार का भयंकर ज्वर, गम्भीर से गम्भीर रोगों की समस्या विशेषकर रक्त सम्बन्धी हो तो आप  शनिवार के दिन एक नारियल, लाल कपड़े में लपेटकर उसे अपने ऊपर सात बार उवारें. किसी भी हनुमान मन्दिर में ले जाकर उसे हनुमान जी के चरणों में अर्पित कर दें. इस प्रयोग से तत्काल लाभ होगा.

* शनि, राहू या केतु जनित कोई समस्या हो, कोई ऊपरी बाधा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, कोई अनजाना भय आपको भयभीत कर रहा हो अथवा ऐसा लग हो कि किसी ने आपके परिवार पर कुछ कर दिया है तो इसके निवारण के लिये आप  शनिवार के दिन एक जलदार जटावाला नारियल लेकर उसे काले कपड़े में लपेटें. 100 ग्राम काले तिल, 100 ग्राम उड़द की दाल तथा एक कील के साथ उसे बहते जल में प्रवाहित करें. ऐसा करना बहुत ही लाभकारी होता है.

* यदि आप किसी गम्भीर आपत्ति में घिर गये हैं. आपको आगे बढ़ने का कोई रास्ता नही दिख रहा हो तो आप  दो नारियल, एक चुनरी, कपूर, गूलर(अगर आपको मिले ) के पुष्प की माला से देवी दुर्गा का दुर्गा मंदिर में पूजन करें. एक नारियल चुनरी में लपेट कर (यथासम्भव दक्षिणा के साथ) माता के चरणों में अर्पित कर दें. माता की कपूर से आरती करें. ‘हुं फ़ट्’ बोलकर दूसरा नारियल फ़ोड़कर माता को बलि दें. सभी प्रकार के अनजाने भय तथा शत्रु बाधा से तत्काल लाभ होगा.

* यदि कुण्ड़ली में शनि, राहू, केतु की अशुभ दृष्टि, इसकी अशुभ दशा , शनि की ढ़ैया या साढ़े साती चल रही तो आप  एक सूखे मेवे वाला नारियल लेकर उस पर मुँह के आकार का एक कट करें. उसमें पाँच रुपये का मेवा और पाँच रुपये की चीनी का बुरादा भर कर ढ़क्कन को बन्द कर दें. पास ही किसी किसी पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथ या सवा हाथ गढ्ढ़ा खोदकर उसमें नारियल को स्थापित कर दें. उसे मिट्टी से अच्छे से दबाकर घर चले जायें. ध्यान रखें कि पीछे मुड़कर नही देखना. सभी प्रकार के मानसिक तनाव से छुटकारा मिल जायेगा.

* यदि राहू की कोई समस्या हो, तनाव बहुत अधिक रहता हो, क्रोध बहुत अधिक आ रहा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, परेशानियों के कारण नींद न आ रही हो तो आप  बुधवार की रात्रि को एक नारियल को अपने पास रखकर सोयें. अगले दिन अर्थात् वीरवार की सुबह वह नारियल कुछ दक्षिणा के साथ गणेश जी के चरणों में अर्पित कर दें. मन्दिर में यथासम्भव 11 या 21 लगाकर दान कर कर दें. हर प्रकार का अमंगल, मंगल में बदल जायेगा

* सभी उपरोक्त प्रयोग विश्वाश के साथ करे अविश्वास और शंका होने पे निष्फल होने पर दोष आपका है "विश्वासम : फल्दायाकम"
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अतृप्त शक्तियों से कैसे बचाव करें

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इस संसार में कुछ नकारात्मक उर्जा या अतृप्त शक्तियां(Unquenchable)भी विद्धमान है जो कभी-कभी अचानक ही कमजोर या कम इच्छा शक्ति वाले लोगो को प्रभावित कर देती हैं और व्यक्ति परेशान हो सकता है इस तरह आप अतृप्त(Unquenchable)शक्तियों से पीड़ित व्यक्ति के लिए एक प्रयोग करके लाभ ले-

Unquenchable Power


अतृप्त(Unquenchable)शक्तियों के लिए क्या करें-


1- लहसुन के तेल में हींग मिलाकर दो बूंद नाक में डालने, नीम के पत्ते, हींग, सरसों, बच व सांप की केंचुली की धूनी देने तथा रविवार को काले धतूरे की जड़ हाथ में बांधने से ऊपरी बाधा दूर होती है-

2- गंगाजल में तुलसी के पत्ते व काली मिर्च पीसकर घर में छिड़कने, गायत्री मंत्र के(सुबह की अपेक्षा संध्या समय किया गया गायत्री मंत्र का जप अधिक लाभकारी होता है)जप, हनुमान जी की नियमित रूप से उपासना, राम रक्षा कवच या रामवचन कवच के पाठ से नजर दोष से शीघ्र मुक्ति मिलती है साथ ही, पेरीडॉट, संग सुलेमानी, क्राइसो लाइट, कार्नेलियन जेट, साइट्रीन, क्राइसो प्रेज जैसे रत्न धारण करने से भी लाभ मिलता है-

3- हमुमान जी के बजरंग बाण का पाठ जिस घर में नित्य होता है उस घर में कभी भी अद्रश्य और अतृप्त शक्तियों का आगमन नहीं हो पाता है-


Upcharऔर प्रयोग-

26 फ़रवरी 2015

स्वाइन फ्लू के लिए.....!

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आयुर्वेदिक दुकानों में स्वाइन फ्लू के लिए.....!

नाम -Septillin (टेबलेट और सिरप में उपलब्ध )

एक शेयर ही कई लोगो की जान बचा सकता है ....!

* ये टेबलेट और सिरप दोनों में उपलब्ध है .

* Septilin के immunomodulatory, एंटीऑक्सिडेंट, साइड इफेक्ट और रोगाणुरोधी गुणों सामान्य बनाए रखने में फायदेमंद होते हैं। यह इस तरह के संक्रमण से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ऊपर उठाने, एंटीबॉडी के गठन की कोशिकाओं के स्तर बढ़ जाता है। Septilin संक्रमण combats जो मैक्रोफेज (श्वेत रक्त कोशिकाओं) सक्रियण, द्वारा phagocytosis (घूस के माध्यम से बैक्टीरिया के उन्मूलन) को उत्तेजित करता है।

* Septilin ज्वरनाशक (कम कर देता है बुखार) गुणों के पास। यह भी जीर्ण tonsillitis, ग्रसनीशोथ, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, नाक की सर्दी (श्वसन तंत्र की श्लेष्मा झिल्ली में सूजन) और गलत बैठ सहित श्वसन तंत्र में संक्रमण, में फायदेमंद है।

* ऊपरी और निचले श्वसन तंत्र में संक्रमण, ऊपरी श्वसन तंत्र की एलर्जी संबंधी विकार, त्वचा और कोमल ऊतकों में संक्रमण, दंत चिकित्सा और periodontal संक्रमण, आंख में संक्रमण, हड्डी और संयुक्त संक्रमण और मूत्र मार्ग में संक्रमण के प्रबंधन में एक immunomodulator के रूप में है किसी भी प्रकार के वाइरस से लड़ने की अदभुद छमता है .

* For early recovery in postoperative conditions

* संक्रमण की आशंका वाले व्यक्तियों में पुनरावृत्ति को कम करने के लिए तथा विरोधी संक्रामक उपचार के लिए एक सहायक के रूप मेंऔर एंटीबायोटिक चिकित्सा के लिए प्रतिरोध करता है .

इसमें प्रयुक्त मुख्य सामग्री:-
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गुग्गुलु भारतीय- 0.324gm

शंख भस्म (शंख / शंख bhasma)- 64mg

Maharasnadi Quath- 130mg

Guduchi / Gulancha tinospora (गिलोय)- 98mg

Manjishtha भारतीय / मजीठ (रुबिया cordifolia)- 64mg

Amalaki भारतीय / करौदा (Emblica officinalis)- 32mg

Shigru / हार्स-मूली पेड़ (Moringa pterygosperma)- 32mg

Yashti-मधु (Glycyrrhiza glabra)- 12mg

* Tinospora Gulancha (Guduchi) एंटीबॉडी के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है जो immunostimulatory गुण है कि एक शक्तिशाली रोगाणुरोधी है। इस संक्रमण के लिए शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण में मदद करता है।

* नद्यपान (Yashtimadhu) immunostimulation को बढ़ाता है और इन विट्रो में समारोह (एंटीबॉडी ingests कि सफेद रक्त कोशिकाओं) बृहतभक्षककोशिका बढ़ जाती है। यह भी एक antiviral एजेंट और अस्थमा, तीव्र या पुराना ब्रोंकाइटिस और पुरानी खांसी में लाभकारी है जो एक expectorant है।

* भारतीय गुग्गल (गुग्गुलु) एक गले में खराश को शांत करना और सूजन को कम करने में मदद की, जो anti-inflammatory properties है। एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में, भारतीय गुग्गल समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है।

उपयोग के लिए दिशा - निर्देश:-
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* सबसे अच्छा - खुराक लेने की सलाह के लिए अपने चिकित्सक से परामर्श करें।

* गोलियों के रूप में या एक सिरप के रूप में उपलब्ध है।

दुष्प्रभाव:-
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Septilin निर्धारित मात्रा प्रति के रूप में लिया गया है  अगर कोई साइड इफेक्ट के लिए नहीं जाना जाता है।

मार्केट कीमत मात्र -एक सौ पांच के लगभग

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20 फ़रवरी 2015

देश में पहली बार आई ये मशीन, 10 साल पहले ही बता देगी किसे है कैंसर....!

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*  अब 3 से 10 साल पहले महिलाओं में बच्चेदानी और पुरुषों में मुंह के कैंसर का पता लग जाएगा। अब तक दोनों किस्मों के कैंसर का पता तब लगता था, जब कैंसर अगली और जानलेवा स्टेज में पहुंच जाता था।

* इसके लिए मेडिकल कॅालेज में ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) सिस्टम लगाया गया है। मशीन में सैंपल डालने के साढ़े 3 घंटे बाद रिपोर्ट आ जाएगी। इस तरह की यह देश की पहली मशीन है।


* पंजाब में मुंह और बच्चेदानी के कैंसर के सबसे अधिक मरीज सामने रहे हैं। दोनों किस्मों के कैंसर को पहली स्टेज में डिटेक्ट करने के लिए यह मशीन लगाई गई है। कैंसर अरली डिटेक्शन के लिए इस तरह की यह देश की पहली मशीन है, जो बताएगी कि मरीज को यदि कैंसर होना है तो कितने समय में हो सकता है।

* पॉपुलेशन वेस्ड कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के तहत यह मशीन करीब 80 लाख में खरीदी गई है। पहले कैंसर पता लगाने के लिए पैप स्मीयर टेस्ट तकनीक अपनाई जाती थी, जिससे कैंसर का पूरी तरह से पता नहीं लग पाता था, और मरीज को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।


* एचपीवी मशीन सिर्फ सैंपल की जांच करके यह बताएगी कि मरीज को कैंसर कितने समय बाद होगा। यदि मरीज के अंदर कैंसर के सैल पाए जाते हैं तो मशीन कैंसर सेल का डीएनए टेस्ट करेगी, और बताएगी कि कैंसर कहां से आया है। बेक्टन डिक्नसन कंपनी के सर्विस मैनेजर हरजिंदर सिंह ने बताया कि मशीन पूरी तरह से ऑटोमेटिक है। मशीन में एक बार 30 सैंपल डाले जा सकते हैं। साढ़े 3 घंटे में रिपोर्ट तैयार हो जाएगी।



* पैथालॉजी डिपार्टमेंट के हेड डा. मंजीत सिंह बल ने बताया कि पंजाब में बढ़ते बच्चेदानी ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या को देखते हुए मशीन मंगवाई गई है। यदि मरीज के अंदर कैंसर सैल का समय पर पता लग जाता है तो उसके इलाज में भी तेजी आएगी। समय पर कैंसर का इलाज संभव होगा। एचपीवी 3 घंटे में देगी सैंपल की रिपोर्ट।






* मशीन में एक मॉनिटर लगा है, जिसमें मशीन की हर एक्टिविटी दिखती है। मशीन के अंदर स्लाइड बनाकर एक साथ 30 सैंपल डाले जाते हैं। मशीन की मैग्नेटिक बीट्स वायरस को अलग कर देते हैं। डिस्पले पर जाता है कि मरीज के शरीर में कैंसर के सैल हैं या नहीं है।

18 फ़रवरी 2015

अस्थमा क्या है करे ये उपाय

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जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने मे परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं-





अस्थमा (Asthma) एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर-बाहर करती हैं-

अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन होता है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी बेचैन करनेवाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और उस स्थिति में फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा होते हैं।

अस्थमा एक अथवा एक से अधिक पदार्थों (एलर्जेन) के प्रति शारीरिक प्रणाली की अस्वीकृति (एलर्जी) है। इसका अर्थ है कि हमारे शरीर की प्रणाली उन विशेष पदार्थों को सहन नहीं कर पाती और जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया या विरोध प्रकट करती है, उसे एलर्जी कहते हैं। हमारी श्वसन प्रणाली जब किन्हीं एलर्जेंस के प्रति एलर्जी प्रकट करती है तो वह अस्थमा होता है। यह साँस संबंधी रोगों में सबसे अधिक कष्टदायी है। अस्थमा के रोगी को सांस फूलने या साँस न आने के दौरे बार-बार पड़ते हैं और उन दौरों के बीच वह अकसर पूरी तरह सामान्य भी हो जाता है।

दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन इस पर नियंत्रण जरूर किया जा सकता है,ताकि दमे से पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।अस्थमा तब तक ही नियंत्रण में रहता है, जब तक मरीज जरूरी सावधाननियां बरत रहा है।

इस रोग के लक्षण व्यक्ति के अनुसार बदलते हैं। अस्थमा के कई लक्षण तो ऐसे हैं, जो अन्य श्वास संबंधी बीमारियों के भी लक्षण हैं। इन लक्षणों को अस्थमा के अटैक के लक्षणों के रूप में पहचानना जरूरी है।दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा सांस को बाहर छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाले फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी तन्तुओं (पेशियों) में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा वायु (श्वास) की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है।

इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है तब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो प्राय: प्रश्वास (सांस के अन्दर लेना) में कठिनाई होती है तथा नि:श्वास (सांस को बाहर छोड़ना) लम्बे समय के लिए होती हैं। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।

जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है। जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है। अस्थमा के सभी रोगियों को रात के समय, खासकर सोते हुए, ज्यादा कठिनाई महसूस होती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं। दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं। दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेनें में बहुत अधिक कठिनाई होती है। सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है। लगातार छींक आना  सामान्यतया अचानक शुरू होता है  यह किस्तों मे आता है  रात या अहले सुबह बहुत तेज होता है  ठंडी जगहों पर या व्यायाम करने से या भीषण गर्मी में तीखा होता है  दवाओं के उपयोग से ठीक होता है, क्योंकि इससे नलिकाएं खुलती हैं  बलगम के साथ या बगैर खांसी होती है  सांस फूलना, जो व्यायाम या किसी गतिविधि के साथ तेज होती है

खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग हो सकता है।  मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है।  खून में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है।  नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।  खांसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है।  नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिया करने से दमा रोग हो सकता है।  भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है।  मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है।  फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी, स्नायुमण्डल में कमजोरी तथा नाकड़ा रोग हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है।  मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा ठंड लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है।  धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।

मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में जलन उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है।  मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दमा रोग हो सकता है।

धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।यदि गर्भावस्था के दौरान कोई महिला तंबाकू के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा होने का खतरा होता है। औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।

जानवरों से (जानवरों की त्वचा, बाल, पंख या रोयें से) ठंडी हवा या मौसमी बदलाव  मजबूत भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव  पारिवारिक इतिहास, जैसे  की परिवार में पहले किसी को अस्थमा रहा हो तो आप को अस्थमा होने की सम्भावना है।  मोटापे से भी अस्थमा हो सकता है। अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं। सिर्फ पदार्थ ही नहीं बल्कि भावनाओं से भी दमे का दौरा शुरू हो सकता है। जैसे क्रोध, रोना व विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाएं।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।घर में या अस्थमा से प्रभावित लोगों के आस -पास धूम्रपान न करें संभव हो तो धूम्रपान ही करना बंद कर दें क्योंकि अस्थमा से प्रभावित कुछ लोगों को कपडों पर धुएं की महक से ही अटैक आ सकता है |

इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है। रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ो से बचना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।  एयरटाइट गद्दे .बॉक्स स्प्रिंग और तकिए के कवर का इस्तेमाल करें ये वे चीजें है जहां पर अक्सर धूल-कण होते है जो अस्थमा को ट्रिगर करते है पालतू जानवरों को हर हफ्ते नहलाएं,इससे आपके घर में गंदगी पर कंट्रोल रहेगा |

अस्थमा से प्रभावित बच्चों को उनकी उम्र वाले बच्चों के साथ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने दें |  अस्थमा के बारे में अपनी और या अपने बच्चे की जानकारी बढाएं इससे इस बीमारी पर अच्छी तरह से कंट्रोल करने की समझ बढेगी |  बेड सीट और मनपसंद स्टफड खिलोंनों को हर हफ्ते धोंए वह भी अच्छी क्वालिटीवाल एलर्जक को घटाने वाले डिटर्जेंट के साथ |  सख्त सतह वाले कारपेंट अपनाए |  एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है | किसी तरह की तकलीफ होने पर या आपकी दवाइयों के आप पर बेअसर होने पर अपने डॉक्टर से संर्पक करें |

यदि आपके घर में पालतू जानवर है तो उसे अपने विस्तर पर या बेडरूम में न आने दें | पंखों वाले तकिए का इस्तेमाल न करें |  मोल्ड की संभावना वाली जगहों जैसे गार्डन या पत्तियों के ढेरों में काम न करें और न ही खेलें |  दोपहर के वक्त जब परागकणों की संख्या बढ जाती है बाहर न ही काम करें और न ही खेलें |  अस्थमा से प्रभावित व्यक्ति से किसी तरह का अलग व्यवहार न करें |

अस्थमा का अटैक आने पर न घबराएं.इससे प्रॉब्लम और भी बढ जाएगी. ये बात उन माता-पिता को ध्यान देने वाली है जिनके बच्चों को अस्थमा है अस्थमा अटैक के दौरान बच्चों को आपकी प्रतिक्रिया का असर पडता है यदि आप ही घबरा जाएंगे तो आपको देख उनकी भी घबराहट और भी बढ सकती है | एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है

दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।

सबसे पहले पेट पर मिट्टी की पट्टी सुबह-शाम रखकर कब्ज के कारण आतों में सचित मल को मुलायम करे। तत्पश्चात एनिमा या वस्ति क्रिया अथवा अरंडी के तेल से ‘गणेश क्रिया’ करके कब्ज को तोड़े।

नाक के बढ़े हुए मास या हड्डी से छुटकारा पाने के लिए तेल नेति, रबर नेति व नमक पड़े हुए गर्म पानी से जल नेति करे।

फेफड़े में बसी ठडक निकालने के लिए छाती और पीठ पर कोई गर्म तासीर वाला तेल लगाकर ऊपर से रुई की पर्त बिछाकर रात भर या दिन भर बनियान पहने रहें।

बायीं नासिका के छिद्र में रुई लगाकर बन्द कर लेने से दाहिनी नासिका ही चलेगी। इस स्वर चिकित्सा से दमा के रोगियों को बहुत आराम मिलता है।

भोजन में प्रात: तुलसी, अदरक, गुलबनफसा आदि की चाय या सब्जी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्जी, गर्म दाल, तीसरे पहर सूप या देशी चाय और रात्रि में सादे तरीके से बनी मिश्रित हरी सब्जिया माइक्रोवेब या कुकर से वाष्पित (स्ट्रीम्ड) सब्जियों का सेवन करे।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी है जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभाति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तामन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।

कंबल या दरी बिछाकर घुटनों के बल लेट जाएं और अपने दाहिने पांव को घुटने से मोड़कर नितंब के नीचे लगा दें। अब बाएं पांव को भी घुटने से मोड़कर, बाएं भुजदण्ड पर रख लें और दोनों हाथों को गर्दन के पीछे ले जाकर परस्पर मिला लें। इस आसन की यही पूर्ण स्थिति है।इस आसन से फेंफड़ों में शक्ति आती है। दमा और क्षय आदि रोगों को यह शांत करता है। साथ ही हाथ-पांवों में लचीलापन और दृढ़ता लाकर उन्हें मजबूत बनाता है। यह आसन लड़के और लड़कियों के लिए बेहद फायदेमंद है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल जो प्राकृतिक चिकित्सा से बनाया गया है उसे लगभग 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्राल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।

शरीर शोधन में कफ के निवारण के लिए वमन (उल्टी) लाभप्रद उपाय है। श्वास के रोगी को आमाशय, आतों और फेफड़ों के शुद्धीकरण के लिए ‘अमलतास’ का विरेचन विशेष लाभप्रद है। इसके लिए 250 मि.ली. पानी में 5 से 10 ग्राम अमलतास का गूदा उबालें। चौथाई शेष रहने पर छानकर रात को सोते समय दमा पीड़ित शख्स को चाय की तरह पिला दें।हमेशा खुश रहें , खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।


अस्थमा के लिए उचित आहार :-


जो लोग आस्थमा जैसी बीमारी से लड़ रहे हैं, उनके लिए सबसे ज़रूरी है खाने में एण्टी आक्सिडेंट का इस्तेमाल। एण्टी आक्सिडेंट सीधा फेफड़ों में जाकर फेफड़ों की बीमारियों से और सांसों की बीमारियों से लड़ते हैं। वो खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन सी और ई होते है वो हर प्रकार की सूजन कम करते हैं।

साइट्रस फूड जैसे संतरे का जूस, हरी गोभी में विटामिन सी की मात्रा अधिक पायी जाती हैं और यह अस्‍थमा के मरीज़ों के लिये  अच्‍छे होते हैं।  ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमे विटामिन ए की मात्रा अधिक होती है वो फेफड़ों से एलर्जेन निकालने में बहुत उपयोगी होते हैं।

ऐसे फल व सब्ज़ियां जो गहरे रंग की होती हैं उनमें बीटा कैरोटिन की मात्रा बहुत अधिक होती है जैसे गाज़र, गहरे हरे रंग की सब्ज़ियां पालक आदि। फल व सब्ज़ियों का रंग जितना गहरा होता है उनमें एण्टीआक्सिडेंट की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।

विटामिन ई का उपयोग ज़्यादातर खाना बनाने के तेल में होता है। लेकिन अस्थमा के मरीज़ को इसका उपयोग कम कर देना चाहिए।  विटामिन ई गेहूं, पास्ता और ब्रेड में भी पाया जाता है लेकिन इन आहार में विटामिन की मात्रा कम होती है।

ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन बी की मात्रा ज़्यादा होती है जैसे दाल और हरी सब्ज़ियां, वो अस्थमैटिक्स को अटैक से बचाती हैं। ऐसा भी पाया गया है कि अस्थमैटिक्स में नायसिन और विटामिन बी 6 की कमी होती है।

कच्चे प्याज़ में सल्फर की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है जिससे कि आस्थमा के मरीजों को बहुत लाभ मिलता है।

ओमेगा 3 फैटी एसिड फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने के साथ बार बार हो रहे आस्थमा अटैक से भी बचाने में मदद करता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड मछलियों में पाया जाता है।  सेलेनियम भी फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने में उपयोगी होता है। अगर सेलेनियम के साथ अस्थमैटिक्स द्वारा विटामिन सी और ई भी लिया जा रहा है तो प्रभाव दोगुना हो जाता है। सेलेनियम सी फूड, चिकेन और मीट में भी पाया जाता है।

वो खाद्य पदार्थ जिनमें कि मैगनिशीयम की मात्रा ज़्यादा होती है वो श्वास नली से अतिरिक्त हवा को अन्दर आने देते हैं जिससे कि सूजन पैदा करने वाले सेल्स भी कम हो जाते है। मैग्निशीयम की मात्रा पालक, हलिबेट, ओएस्टर में ज़्यादा होती है। कुछ खाने पीने की चीज़ों से श्वासनली में मौजूद म्यूकस बहुत पत्ला और पानी सा हो जाता है जैसे स्पाइसी खाना अदरक, प्याज़ आदि।

फैट युक्त पदार्थ जैसे दूध, बटर से अस्थमा की तीव्रता कम हो जाती है। वो बच्चे जो ज़्यादा फैट युक्त आहार लेते है उनकी तुलना में वो बच्चे जो फैट युक्त आहार कम लेते हैं, उनमें आस्थमा की सम्भावना अधिक होती है।  आस्थमा अटैक के समय कॉफी  बहुत ही फायदेमंद सिद्ध हो सकती है क्योंकि कैफीन थियोफाइलिन से बहुत ही मिलता जुलता है और थियोफाइलिन का इस्तेमाल कई दवाओं में होता है, जिससे कि सांस लेने में मदद मिलती है। लेकिन वो लोग जो थियोफाइलिन ले रहे है उन्हें कैफीन युक्त चाय, काफी या कोल्ड ड्रिंक नहीं लेना चाहिए क्योंकि थियोफाइलिन और कैफीन मिलकर टाक्सिक हो सकते हैं। अगर आपके अटैक का कारण चिन्ता है तो आप ज़्यादा मात्रा में कैफीन ले सकते हैं।

अस्थमा के रोगी को शीतल खाद्य पदार्थो और शीतल पेयों का सेवन नहीं करना चाहिए। उष्ण मिर्च-मसाले व अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थो का सेवन न करें। भोजन में अरबी, कचालू, रतालू, फूलगोभी आदि का सेवन न करें। अस्थमा के रोगी को केले नहीं खाने चाहिए। उड़द की दाल से बने खाद्य पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए। अस्थमा के रोगी को दही और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।

समुद्री मछली, सैल्मन, ट्यूना और कॉड लिवर इत्यादि को मिलाकर ही फिश ऑयल और फिश के अन्य उत्पादों का निर्माण किया जाता है। फिश ऑयल में ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है जो कि बहुत जल्दी अस्‍थमा रोगियों को ठीक करने में कारगार है। यानी यदि अस्थमा रोगी फिश ऑयल का सेवन करते हैं तो ये उनके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक है। इससे गले में आने वाली सूजन से निजात मिलती हैं। जो बच्चे श्वास दमा (bronchial asthma) के शिकार होते हैं उनके लिए फिश ऑयल का सेवन बहुत फायदेमंद है। अस्थमा रोगियों के लिए रोजाना तीन ग्राम फिश ऑयल लेना उनके अस्थमा की समस्याओं को दूर कर सकता है। लेकिन यदि इससे अधिक फिश ऑयल लिया जाता है तो सांस संबंधी विकार, दस्त की समस्या और नाक से खून बहना इत्यादि की समस्या हो सकती है। अस्थमा के दौरान आराम पाने के लिए फिश ऑयल के बदले दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। अस्थमा से निजात पाने के लिए फिश ऑयल का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए। अस्थमा के अलावा फिश ऑयल से दिल की बीमारियां, अलजाइमर रोग, अर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को भी कम किया जा सकता है।

मछली के नियमित सेवन से आप कई बीमारियों से निजात पा सकते हैं। जब बात हो अस्थमा की तो अस्थमैटिक मरीजों को अस्थमा से जुड़ी समस्याओं से निजात पाने के लिए निश्चित रूप से मछली का सेवन करना चाहिए। फैटी फिश अस्थमा रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होती है। अस्थमा के मरीजों को सप्ताह में कम से कम दो बार मछली का सेवन जरूर करना चाहिए। इससे ना सिर्फ वे आसानी से सांस ले सकते हैं बल्कि उनके गले की सूजन, खराश, संकरी श्‍वासनली इत्यादि में भी सुधार होता है। क्या आप जानते हैं जो अस्थमैटिक मरीज सप्ताह में दो बार मछली का सेवन करते हैं, ऐसे मरीजों में लगभग 90 फीसदी अस्थमा की समस्याएं कम हो जाती हैं।


अस्थमा को नियन्त्रित करने के कुछ उपाय इस प्रकार हैं :-



तुलसी के पत्तों को अच्छी तरह से साफ कर उनमें पिसी काली मिर्च डालकर खाने के साथ देने से दमा नियंत्रण में रहता है।

दमे का दौरा बार-बार न पड़े इसके लिए हल्दी और शहद मिलाकर चांटना चाहिए।

तुलसी दमे को नियंत्रि‍त करने में लाभकरी है। तुलसी को पानी के साथ पीसकर उसमें शहद डालकर चाटने से दमे से राहत मिलती है।

दमे आमतौर पर एलर्जी के कारण भी होता है। ऐसे में एलर्जी को नियंत्रि‍त करने के लिए दूध में हल्दी डालकर पीनी चाहिए।

शहद की गंध को दमे रोगी को सुधांने से भी आराम मिलता है।

नींबू पानी दमे के दौरे को नियंत्रि‍त करता है। खाने के साथ प्रतिदिन दमे रोगी को नींबू पानी देना चाहिए।

आंवला खाना भी ऐसे में अच्छा रहता है। आंवले को शहद के साथ खाना तो और भी अच्छा है।

गर्म पानी में अजवाइन डालकर स्टीम लेने से भी दमे को नियंत्रि‍त करने में राहत मिलती है।

अस्थमा रोगी को लहसून की चाय या फिर दूध में लहसून उबालकर पीना भी लाभदायक है।

सरसों के तेल को गर्म कर छाती पर मालिश करने से दमे के दौरे के दौरान आराम मिलता है।

मेथी के बीजों को पानी में पकाकर पानी जब काढ़ा बन जाए तो उसे पीना दमें में लाभकारी होता है।

लौंग को गर्म पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर उसमें शहद डालकर पीने से दमे को नियंत्रि‍त करने में आसानी होती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।

तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसका पाने में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिए तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।

1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए। लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है।

अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।

दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदे मंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।

180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमें चुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है।

अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है। मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है।

लहसुन भी दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है ३० मि.ली.दूध में लहसुन की ५ कलियाँ उबालें और इस मिश्रण को हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है अदरख की गर्म चाय में लहसुन की दो पिसी कलियाँ मिलाकर पिने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है सुबह-शाम इस चाय के सेवन करने से मरीज को फायदा होता है ।

दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें यह घरेलु उपाय काफी फायदेमंद रहता है ।

4-5 लौंग लें और 125 मि.ली.पानी में 5 मिनट तक उबालें इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलें और गर्म-गर्म पि लें हर रोज दो -तीन बार यह काढ़ा बनाकर पिने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है ।

दमे को नियंत्रित रखने के लिए शहद और तुलसी की पत्तियों का पीसकर मिश्रण तैयार करें और प्रतिदिन सुबह सुबह इसका सेवन करें  यदि आपको एलर्जी पैदा करने वाला तत्व अपने आसपास नजर आए और आपको लगे की दमा भड़क सकता है तो इसे में तत्काल तुलसी की पत्तियों में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करे ।

श्वसन मार्ग को स्वच्छ रखने के लिए दूध के साथ भुने चनों का प्रयोग करें ।

एक चम्मच शहद हल्दी का चूर्ण मिलाकर सेवन करना भी अस्थमा का एक और बेहद कारगर घरेलु उपचार है । अस्थमा से तत्काल अस्थाई राहत पाने के लिए काली मिर्च में तुलसी की पत्तियां मिलाकर सेवन करे ।

प्रति दिन एक गिलास दूध में हल्दी चूर्ण मिलाकर पीने से भी लाभ मिलता है खली पेट हल्दी दूध पीने से ज्यादा फायदा होता है जिन तत्वों से दमा भड़कने की आशंका हो या साँस लेने में तकलीफ बढ़ती हो उससे बचने की कोशिश करे अस्थमा के मरीज को नियमित रूप से अलग-अलग किस्म की दालों और सूखे अंगूरों का सेवन करना चाहिए ताकि यह रोग दूर रहे तली भुनी सामग्री का सेवन न करे और रात के समय मरीज को हल्का भोजन करने से भी फायदा मिलता है ।

शहद एक सबसे आम घरेलू उपचार है, जो कि अस्‍थमा के इलाज के लिये प्रयोग होती है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से जल्‍द राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी से राहत मिलती है। शहद बलगम को ठीक करता है, जो अस्‍थमा की परेशानी पैदा करता है।

एक कप घिसी हुई मूली में एच चम्‍मच शहद और नींबू का रस मिला कर 20 मिनट तक पकाएं। इस मिश्रण को हर रोज एक चम्‍मच खाएं। यह इलाज बड़ा ही प्रसिद्ध और असरदार है।

रातभर एक गरम पानी वाले ग्‍लास में सूखी अंजीर को भिगो कर रख दें। सुबह होते ही इसे खाली पेट खाएं। ऐसा करने से बलगम भी ठीक होता है और संक्रमण से भी राहत मिलती है।

करेला, जो कि अस्‍थमा का असरदार इलाज है, उसके एक चम्‍मच पेस्‍ट को लेकर शहद और तुलसी के पत्‍ते के रस के साथ मिला कर खाएं। इससे अंदर की एलर्जी से बहुत राहत मिलती है।

अंदर की एलर्जी को सही करने के लिये मेथी भी बहुत असरदार होती है। एक ग्‍लास पानी के साथ मेथी के कुछ दानों को तब तक उबालें, जब तक पानी एक तिहाई न हो जाए। अब उसी पानी में शहद और अदरक का रस मिला लें। इस रस को दिन में एक बार पीने से जरुर राहत मिलेगी।

10 ग्राम सरसों का तेल और 10 ग्राम गुड़ को हल्का गुनगुना कर प्रतिदिन सुबह लें। इस नुस्खे को 21 से 40 दिनों तक प्रयोग करें।

एक चम्मच अदरक का रस + एक चम्मच तुलसी का रस+ एक चम्मच शहद सुबह-शाम लें।

शुद्ध आवलासार गधक 2 ग्राम + 2 ग्राम कालीमिर्च पीसकर, 10 ग्राम गाय के घी में मिलाकर चाटें। प्रतिदिन सुबह एक बार 15 दिनों तक।

मदार या आक का एक पत्ता + 25 दाने कालीमिर्च ठीक से पीसकर 250 मि.ग्रा. की गोलिया बना लें। 1 से 2 गोली शहद से प्रतिदिन लें।

कालीमिर्च, छोटी पीपल और भुना सुहागा समान मात्रा में लेकर, पीसकर, छानकर रखें। इस चूर्ण को 2 से 4 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम शहद से सेवन करें।

अनार के दानों को कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर, 3 ग्राम चूर्ण मधु के साथ दिन में दो बार सेवन करें।

खजूर की गुठली निकालकर, सोंठ के चूर्ण के साथ पान में रखकर खांए।

अस्थमा में श्वास अवरोध होने पर कॉफी पिएं।

कोष्ठबद्धता के कारण रोगी को बहुत परेशानी होती है। कोष्ठबद्धता को नष्ट करने के लिए रात्रि को एरंड का तेल 5 ग्राम मात्रा में दूध या हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।

दूध में दो पीपल उबालकर, छानकर सेवन करें।

सैंधावादि तेल की छाती पर मालिश करने से अस्थमा रोग में बहुत आराम मिलता है।

चौलाई की सब्जी बनाकर खाने से अस्थमा रोगी को बहुत लाभ होता है।

रात को सोने से पहले भुने चने खाकर ऊपर से थोड़ा-सा गरम दूध पीना भी लाभप्रद है।

गाजर का रस सुबह व दोपहर प्रतिदिन पीने से इस रोग से मुक्ति में सहारा मिलता है।

रात को सोने से पूर्व एक दो काली मिर्च लेने से भी आराम पहुंचता है।

एक पका केला छिला लेकर चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर उसमें एक छोटा चम्मच दो ग्राम कपड़छान की हुई काली मिर्च भर दें । फिर उसे बगैर छीले ही, केले के वृक्ष के पत्ते में अच्छी तरह लपेट कर डोरे से बांध कर 2-3 घंटे रख दें । बाद में केले के पत्ते सहित उसे आग में इस प्रकार भूने की उपर का पत्ता जले । ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें ।प्रतिदिन सुबह में केले में काली मिर्च का चूर्ण भरें। और शाम को पकावें ।आप इसे 15-20 दिन करे  खूब लाभ होगा ।

केला के पत्तों को सुखाकर किसी बड़े बर्तन में जला लेवें। फिर कपड़छान कर लें और इस केले के पत्ते की भरम को एक कांच की साफ शीशी या डिब्बे में रख लें । बस, दवा तैयार है । एक साल पुराना गुड़ 3 ग्राम चिकनी सुपारी का आधा से थोड़ा कम वनज को 2-3 चम्मच पानी में भिगों दें । उसमें 1-4 चौथाई दवा केले के पत्ते की राख डाल दें और पांच-दस मिनट बाद ले लें । दिनभर में सिर्फ एक बार ही दवा लेनी है, कभी भी ले लेवें ।

बच्चे का असाध्य दमा - अमलतास का गूदा 15 ग्राम दो कप पानी में डालकर उबालें चौथाई भाग बचने पर छान लें और सोते समय रोगी को गरम-गरम पिला दें । फेफड़ों में जमा हुआ बलगम शौच मार्ग से निकल जाता है । लगातार तीन दिन लेने से जमा हुआ कफ निकल कर फेफड़े साफ हो जाते है । महीने भर लेने से फेफड़े कर तपेदिक ठीक हो सकती है ।

यह करके भी देखें-


सांस की बीमारी (दमा या अस्थमा) एक आम रोग है। वर्तमान समय में अधिकांश लोग इससे पीडि़त हैं। आमतौर पर यह रोग अनुवांशिक होता है तो कुछ लोगों को मौसम के कारण हो जाता है। इसके कारण रोगी कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते और जल्दी थक जाते हैं। मेडिकल साइंस द्वारा इस रोग का संपूर्ण उपचार संभव है। साथ ही यदि नीचे लिखे उपायों को भी किया जाए तो इस रोग में जल्दी आराम मिलता है।

शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से लगातार तीन सोमवार तक एक सफेद रूमाल में मिश्री एवं चांदी का एक चौकोर टुकड़ा बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें तथा शिवजी को चावल के आटे का दीपक कपूर मिश्रित घी के साथ अर्पित करें। श्वास रोग दूर हो जाएंगे।

रविवार को एक बर्तन में जल भरकर उसमें चांदी की अंगूठी डालकर सोमवार को खाली पेट उस जल का सेवन करें। दमा रोग दूर हो जाएगा।

किसी भी मास के प्रथम सोमवार को विधि-विधानपूर्वक चमेली की जड़ को अभिमंत्रित करके सफेद रेशमी धागे में बांधकर गले में धारण करें और प्रत्येक सोमवार को बार-बार आइने में अपना चेहरा देंखे। सांस की सभी बीमारियां दूर हो जाएंगी।

सांस की नली में सूजन, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों में सूजन के कारण कफ जमने अथवा खांसी से मुक्ति पाने के लिए किसी शुभ समय में केसर की स्याही और तुलसी की कलम द्वारा भोजपत्र पर चंद्र यंत्र का निर्माण करवाकर गले में धारण करें। श्वास संबंधी सभी रोग दूर हो जाएंगे।

रविवार के दिन सुबह छोटी दूधी लाकर, उसमें से 6 ग्राम और 3 ग्राम सफेद जीरा लेते हैं। दोनों को बारीक पीसकर पानी में घोलकर पी लेते हैं। इस दिन केवल दही में इच्छानुसार चिवड़ा भिगोंकर इच्छानुसार खाना चाहिए। अगले दिन सोमवार को दवा का सेवन न करें। मंगलवार को फिर उसी दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं। इसके बाद अगले दिन यानी बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को दवा का सेवन न करें। फिर रविवार को दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं इस प्रकार दवा का कोर्स पूरा करने पर पुराने से पुराना दमा नष्ट हो जाता है।

विशेष सावधानी :- रोगी को किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।


अस्थमा का मछली से इलाज:-



हैदराबाद में मछली के जरिए किया जाने वाला इलाज लोगों में काफी मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि करीब 150 साल पहले वीरन्ना गौड़ नाम के एक व्यक्ति थे, जो दूसरों की हमेशा मदद किया करते थे। अचानक एक दिन उनसे एक दैवीय व्यक्ति मिले। प्रसन्न होकर उन्होंने इलाज का यह सीक्रेट फॉर्म्युला बताया और कहा कि इससे लोगों का मुफ्त इलाज करना। तब से लेकर आज तक बेथानी गौड़ परिवार इस फॉर्म्युला से लोगों का मुफ्त इलाज करता आ रहा हैं। हर साल मॉनसून की शुरूआत होते ही जून महीने में हैदराबाद की बेथियानी गौड़ फैमिली के पास दुनिया भर से हजारों लोग इस तरीके से अस्थमा का इलाज कराने आते हैं।


कैसे होता है इलाज:-



सबसे पहले बैथिनी मछली से बनी दवा को जिंदा मुरेल मछली के मुंह में रखा जाता है और उस मछली को मरीज के मुंह में डाल दिया जाता है। दो से सवा दो इंच लंबाई की यह मछली काफी चिकनी होती है, इसलिए मुह में आसानी से स्लिप हो जाती है और मरीज भी इसे आराम से निगल लेता है। शरीर के अंदर यह 15 मिनट तक जिंदा रहती है। यह मछली गले से लेकर पेट तक जाती है। उस दौरान उसकी पूंछ और पंख फड़फड़ाने से सांस लेने का पूरा सिस्टम साफ हो जाता है। बताते हैं कि अगर इस तरीके से तीन साल तक इलाज कराएं और 45 दिनों तक उनके अनुसार डाइट लेते रहें तो अस्थमा 100 फीसदी तक ठीक हो जाता है। यह दवा मृगशिरा कार्तिक नक्षत्र यानी जून के पहले सप्ताह के आस-पास दी जाती है।

नोट- 


जब आज से पांच साल पहले जब हम हैदराबाद रहते थे वहां पांच साल  रहा हमने भी कई लोगो से पता किया तो पता चला कि ये सही है फिर एक बार हम देखने गए और बड़ी भीड़ होती है वहां का प्रसाशन भी काफी सुरक्षा व्यवस्था में लगता है - इसकी एक अलग ही पोस्ट है चित्रों सहित आपके लिए नीचे इसका लिंक दे रहा हूँ-


लिंक -http://www.upcharaurprayog.com/2015/02/blog-post_92.html

17 फ़रवरी 2015

अस्थमा के इलाज को हजारों लोग हैदराबाद आते है

By With 2 टिप्‍पणियां:

क्या आप सोच सकते हैं कि जिंदा मछली को निगलने से अस्थमा ठीक किया जा सकता है। हैदराबाद के बाधिनी गौड़ परिवार की मानें तो हां, बशर्ते मछली के मुंह में जड़ी-बूटियों से तैयार दवा भरी हो। तस्वीरों में देखें कैसे करता है बांधिनी गौड़ परिवार अस्थमा का इलाज।ये परिवार दशकों से अस्थमा मरीजों को ये दवा दे रहा है और हजारों लोग न सिर्फ देश से बल्कि विदेश से भी जिंदा मछली निगलने वाला ये इलाज कराने इस परिवार के पास आ रहे हैं -




आंध्र प्रदेश में हर वर्ष हज़ारों लोग 'मछली इलाज' कहे जाने वाले इस उपचार के लिए आते हैं और इसकी लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में घटने के बदले बढ़ी है. दमा के रोगी को एक जीवित मछली निगलनी होती है जिसके भीतर दमा की दवाई होती है और हर वर्ष लगभग पाँच लाख लोग जून के महीने में इस उपचार के लिए हैदराबाद आते हैं-


मछली के ज़रिए दी जाने वाली इस दवा पर हैदराबाद के गौड़ परिवार का एकाधिकार है, उनका कहना है कि यह प्राकृतिक औषधि है जो उनके परदादा को हिमालय के एक तपस्वी ने 1854 में दी थी.गौड़ परिवार के एक सदस्य बठिनी हरिनाथ कहते हैं कि उनका परिवार पिछले 150 वर्षों से यह दवा लोगों को मुफ़्त में देता रहा है.
गौड़ परिवार का कहना है कि वे इस दवा का फ़ार्मूला नहीं बता सकते क्योंकि ऐसा करने से उसकी 'शक्ति चली जाएगी' और दूसरे लोग इसे अपना धंधा बना लेंगे.



दमा रोग के इलाज के लिए यह दवा साल में केवल एक दिन मृगशिरा कार्तिक के दिन ही दी जाती है। मृगशिरा कार्तिक 5 से 9 जून तक किसी भी दिन होती है और हैदराबाद में मानसून के आने की निर्धारित तारीख़ 5 जून है। दवा देने का यह सिलसिला 150 सालों से चला आ रहा है। हैदराबाद के पुराने शहर में चारमीनार से कुछ ही दूरी पर एक स्थान है दूध बाउली।  दूध बाउली में बत्तिनी गौड़ परिवार रहता है। यह ब्राह्मण परिवार है। इसी परिवार में यह दवा तैयार की जाती है और वितरित की जाती है जिसे मछली प्रसाद का वितरण कहते है-




वास्तव में दवाई कुछ जड़ी-बूटियों से तैयार की जाती है। यह कौन सी जड़ी-बूटियाँ है और दवाई कैसे बनाई जाती है यह सब राज़ है और इस परिवार के अलावा इसे कोई नहीं जानता। इस दवा की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाई जाती है। इस गोली को छोटी मरल जाति की जीवित मछली के मुख में रखा जाता है फिर इस मछली को रोगी का मुहँ खोलकर उसमें भीतर डाला जाता है फिर रोगी का मुहँ बन्द कर मुँह को थोड़ा पीछे करते है जिससे रोगी मछली को साबुत निगल लें-


यह दवाई लेने के तीन-चार घण्टे पहले से रोगी कुछ नहीं खाता है यानि खाली पेट रहता है। माना जाता है कि मछली रोगी के खाली पेट में चक्कर लगाती है। मछली और उस दवा की रासायनिक क्रियाओं से दमा रोग ठीक होता है। यह दवाई लेने के पन्द्रह दिन बाद तक कुछ फल और सब्जियाँ खाने की मनाही होती है और कुछ विशेष रूप से खाए जाते है। ऐसा लगातार चार साल तक करने पर दमा रोग पूरी तरह से ठीक होता है-


पहले यह दवाई दूध बाउली स्थित घर में ही दी जाती थी। फिर रोगियों की संख्या बढने लगी और मुहल्ले के मैदान में इसे दिया जाने लगा। पर इधर कुछ सालों से रोगियों की संख्या बहुत बढ गई है। देश के कोने-कोने से रोगी आ रहे है। इसीलिए शहर के सबसे बड़े मैदानों जैसे नुमाइश मैदान और निज़ाम काँलेज मैदान में मछली प्रसाद वितरण की व्यवस्था की जा रही है-



मृगशिरा कार्तिक के दिन सुबह तड़के से ही दवाई दी जाती है जो लगातार चौबीस घण्टे और नक्षत्र के आधार पर कुछ घण्टे और भी जारी रहती है। दवाई मुफ़्त दी जाती है पर मछली रोगी को खुद खरीदनी होती है जिसके लिए लगभग 50 काउंटर खोले जाते है। टोकन के अनुसार जब बारी आने वाली होती है तभी मछाली खरीदनी होती है ताकि मछली जीवित रह सके-



राज्य प्रशासन इसमें पूरी मदद करता है। भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस बन्दोबस्त होता है। कई स्वयंसेवी संघटन भी मदद करते है। रोगियों की संख्या बहुत होती है इसीलिए पाँच दिन पहले से ही टोकन जारी किए जाते है। इस तरह बाहर से आए रोगी और साथ आए रिश्तेदारों को लगभग एक सप्ताह तक ठहरना पड़ता है। यह संघठन उनके ठहरने की व्यवस्था करते है। विभिन्न रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से उनकी सुविधा के लिए राज्य परिवहन विशेष बसें चलाता है। दवाई देने यानि मछली प्रसाद वितरण के स्थान पर पानी और छाँछ वितरण की व्यवस्था भी यह संघठन करते है-

दवाई की रासायनिक जाँच करवाने और इसे अवैध ठहराने की बहुत कोशिश की गई। डाँक्टरों की एसोसिएशन ने इसे अदालत में चुनौती भी दी पर फ़ैसला गौड़ परिवार के हक़ में हुआ और रोगियों की बढती संख्या को देखकर इसे जारी रखने को कहा गया-

महत्वपूर्ण बात ये है कि मछली के मुंह में भरी जाने वाली दवा के बारे में सिर्फ ये परिवार ही जानता है और सिर्फ परिवार की अगली पीढ़ी को ही ये सीक्रेट फॉर्मूला बताया जाता है-


अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है। लग रहा है जैसे मरल जाति की मछली की नस्ल समाप्त हो रही है। वैसे मछलियों को प्रजनन के बाद ही मार्किट में भेजा जाता है जिससे नस्ल बढती रहती है। मगर इस दवाई में छोटी मछली का प्रयोग किया जाता है यानि प्रजनन के पहले ही मछली समाप्त हो रही है-


रोगियों की संख्या बढने से मछलियाँ भी हज़ारों की संख्या में प्रयोग में आ रही है।


भीड़ बढ़ने के कारण लोगो को इंतज़ार करना पड़ रहा है -



आप इसे यू ट्यूब पे भी देखे -https://www.youtube.com/watch?v=uLN-g5xf3ZQ

उपचार और प्रयोग -

9 फ़रवरी 2015

चाय, कॉफी और कोल्डड्रिंक -दांतों के दुश्मन

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आमतौर पर ये धारणा होती है कि सिर्फ गुटखा, तंबाकु और सुपारी खाने से ही दांत खराब होते हैं। लेकिन हाल में इंडियन डेंटल एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में खुलासा हुआ कि चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक और ज्यूस भी दांतों का पीलापन बढ़ता है। अस्पताल में पहुंचने वाले डेंटल मरीजों में से 50 प्रतिशत मरीजों के दांत इसी वजह से पीले हुए हैं।




ये खुलासा गत दिनों इंडियन डेंटल एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में हुअा। कई लोग दांतों का पीलापन दूर करने ब्लीचिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। फिलहाल ये तकनीक डेंटल कॉलेज में ही उपलब्ध हैं। सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिनके दांत स्मोकिंग, गुटाखा, पान मसाला या सुपारी खाने से पीले पड़े। लेकिन ऐसे मरीज भी कम नहीं जिनके दांत ज्यादा काेल्डड्रिंक, चाय, कॉफी अौर ज्यूस पीने पड़े हैं।

ऐसेहोती है दांतों की ब्लीचिंग :-
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डेंटलस्पेशलिस्ट डॉ. रेखा मीणा ने बताया कि दांतों की ब्लीचिंग दो तरह से होती है। पहली तकनीक में दांतों पर सिंपल ब्लीच कर दिया जाता है जिससे दांत कुछ दिनों के लिए सफेद हो जाते हैं। दूसरी तकनीक में पेस्ट मेटेरियल बना कर कुछ हफ्तों के लिए दांतों पर लगाकर रखना पड़ता है। इस तकनीक से दांत एक दो साल तक सफेद बने रहते हैं।

स्थाई सफेदी भी बनी रह सकती है :-
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डॉ.मीणा ने बताया कि दांतों को परमानेंट सफेद बनाए रखने के लिए उन पर पोर्सलिन का लेमिनेशन किया जाता है। इसके लिए पहले दांतों को पहले थाेड़ा घिसा जाता है। फिर दांतों का साइज लिया जाता है। जिनके आधार पर लैब में पोर्सलिन लेमिलेशन तैयार करके दांतों पर लगा दिया जाता है। इस तकनीक से कई साल तक दांत सफेद बने रहते है।

दांतों की ब्लीचिंग के बारे में अभी ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। ये सही है कि चाय कॉफी और कोल्ड ड्रिंक से भी दांतों में पीलापन आता है। लेकिन दांतों की ब्लीचिंग या पोर्सलिन लेमिलेशन के साइड इफेक्ट भी हैं। इससे सेंस्टीविटी होने के साथ दांत कमजोर भी हो जाते हैं।

स्पोर्ट्स ड्रिंक दांत के कुदरती कड़ापन को कम करता है और उस पर पाई जाने वाली बेहद उपयोगी एनामेल परत को नष्ट कर देता है। एक नए शोध से पता चलता है कि इस उत्पाद में घुला अम्ल दांत की ऊपरी चमकीली परत को भारी नुकसान पहुंचाता है। एनामेल को दांत का सुरक्षा कवच माना जाता है। एनामेल की परत नष्ट होने के बाद दांत खुरदरी हड्डी की तरह दिखने लगते हैं। इस परत के नष्ट होने की सूरत में कोई भी ठंडा या गर्म आहार लेने पर दांत में असहनीय सिहरन पैदा होती है या दर्द होता है।

वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से स्पष्ट हुआ है कि अभी तक दांतों की सुंदरता का दुश्मन समझा जाने वाला पनीर ही दांतों में होने वाले छिद्रों को दूर रखने का काम करता है। वैज्ञानिकों ने करीब 25 वर्षों तक दांतों का गहन अध्ययन करने पर पाया कि पनीर में मौजूद कैल्शियम और लार मिलकर जो जटिल आणविक संरचना बनाते हैं, वह दांतों की घटती सुरक्षा परत को पहले जैसा करने का काम करती है। पनीर में मौजूद चर्बी और नमक के कारण इसे मोटापा बढ़ाने वाला माना जाता था। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि पनीर खाने वाले व्यक्तियों के दांतों की सुरक्षा परत को होने वाला नुकसान 71 प्रतिशत कम हो जाता है।


 शोधकर्ताओं का मानना है कि पनीर में मौजूद कैल्शियम और फास्फेट सुरक्षा परत अथवा एनेमल को टूटने व कमजोर होने से बचाते हैं और इसे चबाने के कारण मुंह में लार भी ज्यादा बनती है, जो दांतों को साफ करने का कार्य करती है। पोषण विज्ञानी कहते हैं कि पनीर दांतों में होने वाली सड़न और छिद्रों से लड़ने का कारगर तरीका है किन्तु इसका सेवन भी एक निर्धारित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।
उपचार और प्रयोग -

6 फ़रवरी 2015

इस प्रकार करे #स्वाइन फ्लू से अपना बचाव .....!

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* स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है, जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच1 एन1 के नाम से जाना जाता है और मौसमी फ्लू में भी यह वायरस सक्रिय होता है। 2009 में जो स्वाइन फ्लू हुआ था, उसके मुकाबले इस बार का स्वाइन फ्लू कम पावरफुल है, हालांकि उसके वायरस ने इस बार स्ट्रेन बदल लिया है यानी पिछली बार के वायरस से इस बार का वायरस अलग है।







कैसे फैलता है:-
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* स्वाइन फ्लू सूअरों में होने वाला सांस संबंधी एक अत्यंत संक्रामक रोग है जो कई स्वाइन इंफ्लुएंजा वायरसों में से एक से फैलता है. आमतौर पर यह बीमारी सूअरों में ही होती है लेकिन कई बार सूअर के सीधे संपर्क में आने पर यह मनुष्य में भी फैल जाती है.

* जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। यह कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, कीबोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी यह वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया हो।

* स्वाइन फ्लू के लक्षण हैं सर्दी, जुकाम, सूखी खांसी होना, थकान होना, सिरदर्द और आंखों से पानी आना. इसके अलावा सांस भी फूलने लगती है. अगर संक्रमण गंभीर है तो बुखार तेज होता जाता है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर के पास जाने की जरूरत होती है.

इसके शुरुआती लक्षण:-
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* नाक का लगातार बहना, छींक आना, नाक जाम होना।

* मांसपेशियां में दर्द या अकड़न महसूस करना।

* सिर में भयानक दर्द।

* कफ और कोल्ड, लगातार खांसी आना।

* उनींदे रहना, बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।

* बुखार होना, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना।

* गले में खराश होना और इसका लगातार बढ़ते जाना।

अकसर पूछे जाने वाले सवाल
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अगर किसी को स्वाइन फ्लू है और मैं उसके संपर्क में आया हूं, तो क्या करूं...?

सामान्य जिंदगी जीते रहें, जब तक फ्लू के लक्षण नजर नहीं आने लगते। अगर मरीज के संपर्क में आने के 7 दिनों के अंदर आपमें लक्षण दिखते हैं, तो डॉक्टर से सलाह करें।

अगर साथ में रहने वाले किसी शख्स को स्वाइन फ्लू है, तो क्या मुझे ऑफिस जाना चाहिए....?

हां, आप ऑफिस जा सकते हैं, मगर आपमें फ्लू का कोई लक्षण दिखता है, तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं और मास्क का इस्तेमाल करें।

स्वाइन फ्लू होने के कितने दिनों बाद मैं ऑफिस या स्कूल जा सकता हूं.....?

अस्पताल वयस्कों को स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखने पर सामान्यत: 5 दिनों तक ऑब्जर्वेशन में रखते हैं। बच्चों के मामले में 7 से 10 दिनों तक इंतजार करने को कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति को 7 से 10 दिन तक रेस्ट करना चाहिए, ताकि ठीक से रिकवरी हो सके। जब तक फ्लू के सारे लक्षण खत्म न हो जाएं, वर्कप्लेस से दूर रहना ही बेहतर है।

क्या किसी को दो बार स्वाइन फ्लू हो सकता है.....?

जब भी शरीर में किसी वायरस की वजह से कोई बीमारी होती है, शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उस वायरस के खिलाफ एक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। जब तक स्वाइन फ्लू के वायरस में कोई ऐसा बदलाव नहीं आता, जो अभी तक नहीं देखा गया, किसी को दो बार स्वाइन फ्लू होने की आशंका नहीं रहती। लेकिन इस वक्त फैले वायरस का स्ट्रेन बदला हुआ है, जिसे हो सकता है शरीर का प्रतिरोधक तंत्र इसे न पहचानें। ऐसे में दोबारा बीमारी होने की आशंका हो सकती है।

सावधानियां:-

* इस बीमारी से बचने के लिए हाइजीन का खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए. खांसते समय और झींकते समय टीशू से कवर रखें. इसके बाद टीशू को नष्ट कर दें.

* बाहर से आकर हाथों को साबुन से अच्छे से धोएं और एल्कोहल बेस्ड सेनिटाइजर का इस्तेमाल करें.

* जिन लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण हों तो उन्हें मास्क पहनना चाहिए और घर में ही रहना चाहिए.

* स्वाइन फ्लू के लक्षण वाले मरीज से क्लोज कॉंटेक्ट से बचें. हाथ मिलाने से बचें. रेग्यूलर ब्रेक पर हाथ धोते रहें.

* जिन लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही हो और तीन-चार दिन से हाई फीवर हो, उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए.

* स्वाइन फ्लू के टेस्ट के लिए गले और नाक के द्रव्यों का टेस्ट होता है जिससे एच1एन1 वायरस की पहचान की जाती है. ऐसा कोई भी टेस्ट डॉक्टर की सलाह के बाद ही करवाएं.
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स्वाइन फ्लू के लिए काढ़ा बनाये :-
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सामग्री :-
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छोटी इलाइची - दस नग

लौंग - सात से आठ पीस

तुलसी के पत्ते -सात पत्ते या अधिक

अदरक - एक छोटा टुकड़ा

दालचीनी - चौथाई चम्मच

हल्दी -चौथाई चम्मच

काला नमक - चौथाई चम्मच

पानी - चार कप

* सभी उपरोक्त सामग्री को चार कप पानी में इतना पकाए कि पानी एक कप रह जाए अब इसे छान ले और एक कांच की शीशी में रख ले और प्रात:काल नित्य क्रिया के पाश्चात् बिना कुछ खाए दो से तीन चम्मच सेवन करे  और आप दूसरों को भी बताये आवश्यकता अधिक होने पे मात्रा को बढ़ा सकते है .

* ये आपके जीवन में स्वाइनफ्लू से रक्षा करेगा तथा लड़ने की ताकत देगा.
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ऐसे करें बचाव:-
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इनमें से एक समय में एक ही उपाय आजमाएं।

* 4-5 तुलसी के पत्ते, 5 ग्राम अदरक, चुटकी भर काली मिर्च पाउडर और इतनी ही हल्दी को एक कप पानी या चाय में उबालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

* गिलोय (अमृता) बेल की डंडी को पानी में उबाल या छानकर पिएं।

* गिलोय सत्व दो रत्ती यानी चौथाई ग्राम पौना गिलास पानी के साथ लें।

* 5-6 पत्ते तुलसी और काली मिर्च के 2-3 दाने पीसकर चाय में डालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

* आधा चम्मच हल्दी पौना गिलास दूध में उबालकर पिएं। आधा चम्मच हल्दी गरम पानी या शहद में मिलाकर भी लिया जा सकता है।

* आधा चम्मच आंवला पाउडर को आधा कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिएं। इससे रोग प्रतिरोधक  छमता बढ़ेगी .
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4 फ़रवरी 2015

ये बाते भी है बड़े काम की ध्यान रक्खे-

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सबके अपने-अपने संस्कार होते हैं मगर कुछ बातो का ध्यान रखे तो हमारे जीवन में लाभदायक है  जब आप बाथरूम के लिए गए है तो आप हाथ-पैर धो लो और ३ बार कुल्ला करो | आँख और कान को पानी का स्पर्श कराओ | शुद्धि रखे | अशुद्धि नहीं | गंदगी नहीं | स्वच्छता बाहर की मन की पवित्रता में बहुत काम देगी... बहुत काम देगी |

* जब भी आप #भोजन करें तो दो हाथ, दो पैर, मुँह ये पाँच अंग धोकर भोजन करे | बहुत फायदा होगा | स्वच्छता से  पानी पियें, सभा में बैठे हो तो बात अलग है पर बाहर कही हो तो पानी पिए तो एक बार कुल्ला करें | स्वच्छता..... शरीर नीरोग रहेगा | आजकल लोग अपना शरीर भी नीरोग नहीं रख पाते | बीमारियाँ ढेरों होती है | बीमारियाँ हो ही क्यों..? अगर हो तो टिके क्यों...? हम ऐसी स्वच्छता रखे |


* एक दूसरे का  झूठा पानी पी रहें हैं तो ऐसा ना हो | आपसी प्रेम अलग बात है | झूठा पीना ... एक दूसरे का झूठा खाना.... जो अपना झूठा दूसरे को खिलाता है न उसके पुण्य नष्ट होते हैं | खिलने वाले के... जो अपना झूठा दूसरों को खिलाते  हैं |  उसके पुण्य भी स्वाहा हो जाते हैं | इसलिए अशुद्धि नहीं स्वच्छता नहीं करे .


* घर में रोज बहनें ध्यान रखे नाश्ता होने से पहले सफाई हो जाए इससे बरकत भी होगी और  आपके घर में लक्ष्मी ना आये तो कहना | और गंदगी पड़ी है कोई नाश्ता कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है तो लक्ष्मी क्यों आएगी वहाँ पर | लक्ष्मी को स्वच्छता पसंद है | सिंक में कभी जूठे बर्तन न छोड़े ..

* बहनें सुबह कभी घर से बाहर जाती हो तो घर में सफाई करके घर से बाहर जाए | ऐसे घर में लक्ष्मी अंदर आती है | ये बातें बहुत छोटी-छोटी है पर काम बहुत आएगी | घर में सुबह नाश्ता हो उससे पहले सफाई हो जाए |घर में लक्ष्मी का वास होगा |
रात को घर में झूठे बर्तन रखकर ना सोएं | एक भी बर्तन घर में जूठा रख कर ना सोएं | आपके घर लक्ष्मी जरुर आएगी और स्थाई वास करेगी |पलंग पर जहाँ आप सोते है वहाँ झूठे बर्तन मत रखो | आपके घर लक्ष्मी आये बिना नहीं रहेगी | शाम हो गई कपड़े सुखाने बाहर डाले, वो ले लो | शाम के बाद कपड़े डाले रात को तो उसमे मलिनता प्रवेश करती है | ये बातें छोटी-छोटी....
घर में टूटे-फूटे बर्तन मत रखो | जिनके घर में टूटे-फूटे बर्तन होते हैं वो जाने कि महाभारत में लिखा है- कोई ऐसे वैसे ग्रन्थ की बात नहीं है  जो टूटे-फूटे बर्तन रखते हैं ऐसे घर में झगड़े ज्यादा होते हैं |


* आप शादियों में जाते हैं, जाओ माना नहीं है | भले आपके बेटे की, भतीजे की भतीजी की शादी है जाओ पर शादी में क्या करते हैं फूल फेंकते हैं तो गुलाब के फूल पर पैर रखने से लक्ष्मी चली जाएगी| गुलाब के फूल में लक्ष्मी का वास होता है | फूल तो गुरु और ईश्वर को अर्पण करने के लिए होते हैं, हमारे पैरों तले कुचलने के लिए नहीं हैं | इसलिए बारातों में ऐसी बेवकूफी नहीं करनी चाहिए | गुलाब के फूल उछाल रहें हैं... पैरों में नहीं आने चाहिए | बात छोटी है पर है बड़े काम की है |


* खाना खाओ तो पूर्व या उत्तर की ओर मुहँ करके खाना खाओ | तबियत बढ़िया रहेगी |और अगर सोना है तो पूर्व या दक्षिण की तरफ सिर करके सोओ | तबियत बढ़िया रहेगी | और स्वप्न भी अच्छे दिखेगे तथा बीमारी से भी बचाव रहेगा तो दवाइयाँ नहीं खानी पड़ेगी |

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शादी शुदा औरतो के लिए काम की बात :-
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* अगर कोई खास कारण न हो तो सेक्स के लिए इनकार न करें। अगर किसी कारणवश (मेंसेस, प्रेग्नेंसी, थकान आदि) सेक्स न कर सकें तो पति को दूसरे तरीकों से संतुष्टि देने की कोशिश करें।

* पारिवारिक झगड़ों को प्यार के हसीं लम्हों को बीच न आनें दें। प्यार के बीच में सिर्फ प्यार की बात की बात करे .

* प्राइवेट पार्ट में अगर कोई बीमारी है तो इसका इलाज कराएं। यह पार्टनर
की कामेच्छा को कम कर सकता है। 

* सेक्स के वक्त पार्टनर के बेडौल शरीर या किसी और फिजिकल कमी को लेकर कॉमेंट न करें। कोशिश करे कि उसे अच्छे चिकित्सक से दिखाए .

* अगर पार्टनर जल्दी डिस्चार्ज हो जाता है तो सेक्सॉलजिस्ट की मदद से इलाज मुमकिन है। तब तक संतुष्टि के दूसरे तरीकों का सहारा ले सकते हैं। लेकिन पति की अवहेलना न करे न ही दूसरों से पति की कमियों को शेयर करे .

* अपनी सेक्स लाइफ को दूसरी सहेलियों से कंपेयर न करें। बल्कि खुद की सेक्स लाइफ को अच्छी तरह जिए .

* सेक्स के वक्त थोड़ा आकर्षक बनें। स्नान करें, वैक्सिंग कराएं, परफ्यूम का इस्तेमाल करें। प्राइवेट पार्ट को साफ- सुथरा रखें। आपके बेहतर पहनावे से भी पार्टनर की उत्तेजना में इजाफा हो सकता है। और जीवन का आनंद प्राप्त करे .

* अगर आप उनकी तारीफ करेंगी तो वह अधिक उत्साह और जोश महसूस करेंगे। प्यार करने के दौरान तारीफ के जुमले बोलना न भूलें। डॉक्टर की दो घंटे की साइकोथेरपी से ज्यादा असर पार्टनर की दो लाइन की तारीफ का होता है। 


* मुमकिन हो तो बड़े बच्चों (5 साल से बड़े) को अलग सुलाएं। घर में जगह कम हो तो सेक्स के लिए दोपहर का वक्त फिक्स करें।जो पॉजिशन पति को पसंद हो, उन्हें आजमाएं। अपनी पसंद-नापसंद को भी उनके साथ शेयर करें।
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3 फ़रवरी 2015

तगर अनेक रोगों में लाभदायक है .....!

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* सिर और मज्जा तन्तुओं की खराबी से पैदा हुए मधुमेह और बहुमूत्र में तगर के ताजे फल को लगभग चौथाई ग्राम से एक ग्राम की मात्रा तक दिन में दो या तीन बार सेवन करने से लाभ मिलता है। यह सिर के रोग, उन्माद, अपस्मार (मिर्गी), विष के विकारों और मधुमेह (शूगर) रोग को ठीक करने में उपयोगी होता है।

* तगर का 1 से 3 ग्राम चूर्ण या 50 से 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर काढ़ा बना लें। इसका सेवन करने से मासिकधर्म नियमित हो जाता है। यह नींद को लाता है और पुराने प्रमेह को ठीक करता है।

* तगर को थोड़ी मात्रा में सेवन करने से रक्तसंचारण क्रिया तेज होती है। तगर को बारीक पीसकर गर्म पानी में मिलाकर छानकर सेवन करने से हृदय की शक्ति और नाड़ी की शक्ति में वृद्धि होती है। ज्यादा मात्रा में यह नुकसानदायक होता है।

*तगर के पत्तों को पीसकर आंखों के बाहरी हिस्सों में लेप करने से आंखों का दर्द बंद हो जाता है।

* तगर की जड़ (मूल) को कूटकर उसमें 4 भाग पानी व बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर धीमी आग पर पकाएं तथा इसके बाद इसे छानकर सेवन करने से सभी प्रकार के स्नायु शूल व नसों की कमजोरी दूर होती है।

* तगर को यशद की राख के साथ सेवन करने से गठिया, पक्षाघात, कण्ठ के रोग व सन्धिवात आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
छाती के हडि्डयों की जोड़ के दर्द में तगर की हरी जड़ की छाल की तीन ग्राम मात्रा को छाछ में पीसकर पीना चाहिए।

* पुराने जख्मों (घावों) और फोड़ों पर इसका लेप करने से जख्म जल्दी भरकर ठीक हो जाते हैं।

* लगभग 25 मिलीग्राम से 900 मिलीग्राम तगर का चूर्ण बनाकर रोगी को सुबह और शाम को देने से भ्रम रोग दूर हो जाता है।

* तगर, सेंधानमक, कटेरी, कूठ और देवदारु को मिलाकर तिल के तेल में पकाकर मिश्रण बना लें, फिर इसी तेल में भिगी हुई रुई का फोहा बनाकर योनि में रखने से योनि का दर्द शांत हो जाता है।

* लगभग 250 मिलीग्राम ग्राम से 900 मिलीग्राम तगर के चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ लेने से घबराहट दूर हो जाती है इसके अलावा मानसिक अशांति खत्म हो जाती है।

* हाथ-पैर की ऐंठन को दूर करने के लिए लगभग 150 मिलीग्राम तगर का सेवन करने से लाभ मिलता है।

* लगभग 2 ग्राम तगर को ठंडे पानी में पीसकर 1 महीने तक प्रतिदिन सुबह पीने से हिस्टीरिया और मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है।

* लगभग 250 से 900 मिलीग्राम तगर के चूर्ण को यशद भस्म के साथ सुबह-शाम सेवन करने से कम्पवात ठीक होता है


2 फ़रवरी 2015

पेट के लिए पपीते को वरदान माना गया है

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* जी हाँ ,पपीते को पेट के लिए तो वरदान माना गया है। इसमें पेप्सिन नामक तत्व पाया जाता है, जो भोजन को पचाने में मदद करता है। पपीता का सेवन रोज करने से पाचन शक्ति में वृद्धि होती है। पका पपीता पाचन शक्ति को बढ़ाता है, भूख को बढ़ाता है, मोटापे को नियंत्रित करता है और अगर आपको खट्टी डकारें आती हैं तो पपीते का रस उसे भी बंद कर देगा। पके या कच्चे पपीते की सब्जी बना कर खाना पेट के लिए लाभकारी होता है।
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* पपीता को गुणों की खान कहा गया है। यह आपके पेट का भी खयाल रखता है और त्वचा की खूबसूरती का भी। यह कई बीमारियों से दूर रखता है और इसका स्वाद भी बेजोड़ है।

* लगभग हर मौसम में सस्ते में ही मिल जाने वाला पपीता आपकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है। कच्चे पपीते का दूध त्वचा रोग के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। पपीते का प्रयोग लोग फेस पैक में भी करते हैं। त्वचा को ठंडक पहुंचाने वाला पपीता आंखों के नीचे के काले घेरे को दूर करता है। अगर आप कील-मुंहासों से परेशान हैं तो कच्चे पपीते के गूदे को शहद में मिलाकर चेहरे पर लगाएं और जब वह सूख जाए तो गुनगुने पानी से चेहरा धो लें। उसके बाद मूंगफली के तेल से हल्के हाथ से चेहरे पर मालिश करें। एक महीने तक नियमित रूप से ऐसा करने से आपको काफी लाभ होगा।

* पपीते का रस अरुचि, अनिद्रा, सिरदर्द, कब्ज व आंव-दस्त आदि रोगों को ठीक करता है। आपको भूख नहीं लगती या पेशाब ठीक से नहीं होता तो सुबह में नियमित रूप से पके पपीते का सेवन करें। इससे भूख भी लगने लगेगी और पेशाब से संबंधित समस्या भी दूर हो जाएगी। पपीते के रस के सेवन से खट्टी डकारें बंद हो जाती है। यह हृदय रोग, आंतों की कमजोरी आदि को भी दूर करता है।

* पपीते के पत्तों के उपयोग से उच्च रक्तचाप में लाभ होता है और हृदय की धड़कन ठीक रहती है। यह पौरुष को बढ़ाता है, पागलपन को दूर करता है एवं वात दोषों को नष्ट करता है। अगर आप पपीता खाते रहते हैं तो आपको किसी कारण से होने वाला जख्म भी जल्द भरता है।

* पपीता कफ के साथ आने वाले खून को रोकता है और खूनी बवासीर को भी ठीक करता है। हृदय रोगियों के लिए भी पपीता काफी लाभदाक होता है। पपीते के दस बीज पानी में पीस कर चौथाई कप पानी में मिला कर पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। इसका एक हफ्ते तक नियमित रूप से प्रयोग करना चाहिए। बच्चा मां के दूध पर निर्भर रहता है, लेकिन कई बार ऐसा देखने में आता है कि मां को पर्याप्त दूध नहीं होता, जिससे बच्चा भूखा रह जाता है। कच्चे पपीते की सब्जी खाने से मां के दूध में वृद्धि होती है।

* आप मोटे हैं या पाचनतंत्र में गड़बड़ी है या आपकी आंतें कमजोर हैं या भूख नहीं लगती है  एक अदद पपीता आपके ऐसे दजर्नों सवाल का जवाब है। जी हां, अपनी खानपान में पपीता को जगह दीजिए और फिर देखिए इसका कमाल। यह पेट का ख्याल तो रखेगा ही, आपके चेहरे पर चमक लाकर आपको खूबसूरत भी बनाएगा। इसमें मौजूद विटामिन ए, बी, डी, प्रोटीन, कैल्शियम, लौह आदि इसे सेहत का खजाना बना देते हैं। जिन लोगों का लक्ष्य अपना वज़न कम करना है उन्हें अपने आहार में पपीते को ज़रूर शामिल करना चाहिए क्योंकि इसमें कैलोरी बहुत कम होती है। पपीते में मौजूद फायबर एक और जहां आपको तारो-ताज़ा महसूस करवाता है वहीं आपकी आँत की मूवमेंट को ठीक रखता है जिसके फलस्वरूप वज़न घटाना आसान हो जाता है।

* आपका प्रतिरोधक तंत्र आपको बीमार कर देने वाले कई संक्रमणों के विरुद्ध ढाल का काम करता है। केवल एक पपीते में इतना विटामिन सी होता है जो आपके प्रतिदिन की विटामिन सी की आवश्यकता का 200 प्रतिशत होता है। ज़ाहिर तौर पर ये आपके प्रतिरोधक तंत्र को मज़बूत करता है।

* पपीता मधुमेह रोगियों के लिए आहार के रूप में एक बेहतरीन विकल्प है क्योंकि स्वाद में मीठा होने के बावजूद इसमें शुगर नाम मात्र का होता है। साथ ही, वे लोग जो मधुमेह के मरीज़ नहीं हैं, इसे खाकर मधुमेह होने के खतरों को दूर कर सकते हैं।

* पपीते में विटामिन ए भी प्रचुर मात्रा में होता है जो आपके आँखों की रोशनी को कम होने से बचाता है। कोई भी व्यक्ति उम्र बढ़ने की वजह से आँखों की रोशनी से मरहूम नहीं होना चाहता, और पपीते को अपने आहार में शामिल करके आप ऐसी मुसीबत से बच  सकते हैं।पपीते में मौजूद केरोटिन आंखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए नियमित रूप से पपीता खाना चाहिए।

* गठिया वास्तव में एक ऐसी बीमारी है जो शरीर को बेहद दुर्बल तो करती ही है जीवनशैली को बुरी तरह प्रभावित भी करती है। पपीते खाना आपकी हड्डियों के लिए बेहद लाभकारी हो सकता है, इनमें विटामिन-सी के साथ-साथ सूजन-रोधी गुण होते हैं जो गठिया के कई रूपों से शरीर को दूर रखता है। एक अध्ययन के अनुसार विटामिन-सी युक्त भोजन न लेने वाले लोगों में गठिया का खतरा विटामिन-सी का सेवन करने वालों के मुकाबले तीन गुना होता है।

* आज के दौर में ऐसे खाने से मुंह मोड़ना जो आपके पाचन तंत्र के लिए बुरा हो, लगभग असंभव है। कई बार हम ऐसा भोजन करने को मजबूर होते हैं जो या तो जंक फ़ूड की श्रेणी में आता है या अधिक तेल में पका होता है। रोज़ एक पपीते का सेवन कभी-कभार खाए ऐसे भोजन के साइड-इफेक्ट को दूर रखता है क्योंकि इसमें फाइबर के साथ-साथ पपैन नामक एक एंजाइम होता है जो आपकी पाचन शक्ति को दुरुस्त रखता है।

* माहवारी के दर्द से गुज़र रही महिलाओं को अपने आहार में पपीता ज़रूर जोड़ना चाहिए क्योंकि पापिन नाम एंजाइम माहवारी के दौरान रक्त के प्रवाह को दर्द से दूर रखता है।

* हम सब हमेशा जवान रहना चाहते हैं पर कोइ भी ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाया है। फिर भी, स्वास्थय वर्द्धक आदतों जैसे एक पपीता रोजाना, की मदद से आप अपनी उम्र के मुकाबले अधिक युवा दिख सकते हैं। पपीते में विटामिन सी, विटामिन ई और बीटा-कैरोटीन सरीखे एंटी-ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं जो आपकी त्वचा को झुर्रियों से दूर रखते हैं।

* पपीते में एंटी-ऑक्सीडेंट, phytonutrients और flavonoids प्रचुर मात्रा में होते हैं जो आपकी कोशिकाओं को कश्ती पहुँचने नहीं देते। कुछ अध्ययनों ने पपीते के सेवन से कोलन और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे के कम होने की पुष्टि भी की है। जो लोग नियमित रूप से पपीते का सेवन करते हैं उन्हें कैंसर का खतरा कम रहता है।

* पूरे दिन टूटकर काम करने के बाद घर लौटने पर अगर एक प्लेट पपीते खा लिए जाएं तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। इस कमाल के फल में आपको तनाव से दूर रखने की ताकत है। युनिवार्सिटी ऑफ़ अलाबामा के एक अध्ययन के मुताबिक़ 200 mg विटामिन सी स्ट्रेस हारमोन को संचालित करने में सक्षम होता है। पपीते में यह प्रचुरता में उपलब्ध होता है।

* वैसे तो पपीता बहुत भी फायदेमंद फल है लेकिन कुछ बीमारियों और स्थितियों में पपीता नहीं खाना चाहिए। जैसे गर्भवती महिला को पपीता नहीं खाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में चिकित्सक से परामर्श लेकर ही पपीता खाना चाहिए।
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1 फ़रवरी 2015

रोज खाए एक सेब और रहे आप स्वस्थ - Roj Khaye Ek Sev Aur Rahe Aap Swasth

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रोजाना एक सेब  खाने से आप हमेशा डॉक्टर के पास जाने से बचे रहेंगे। तो मित्रों आप रोज एक छिलके सहित सेब खाएं और दवाओं को भूल जाए.सेब पोष्टिक तत्वो का घर है। सेब खाना कुछ रोगो को रोकने और इलाज करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह शरीर के समग्र स्वास्थ्य को भी बनाए रखने में मदद करता है-

एप्पल उन लोगो के लिए एक बढ़िया विकल्प है जो वजन कम करना चाहते है चूंकि यह अतिरिक्त कैलोरी को खाने में शामिल किये बिना भूख को शांत करता है। इसमें पैक्टिन शामिल है जो मानव शरीर की कोशिकाओं द्वारा अवशोषित वसा की मात्रा को नियंत्रित करता है। इसलिए सेब का सेवन अपने पेट को भरने के लिए एक अच्छा विकल्प है जब आप भोजन के लिए तड़प रहे हो। सेब में पाया जाने वाला पेक्टिन ग्लेक्टरोनिक एसिड का एक स्त्रोत है। यह शरीर में इंसुलिन की जरूरत पर प्रतिबंध लगाता है और इस प्रकार मधुमेह के प्रबंधन में मदद करता है-


सेब दोनों घुलनशील और अघुलनशील फाइबर का एक अच्छा स्रोत है। यह पाचन की प्रक्रिया को विनियमित करने में मदद करता है और कब्ज से राहत देता है। इसके अलावा, सेब का छिलका शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करता है। इसलिए, यह सलाह दी जाती है कि सेब का छिलका उतारे बिना उन्हे खाना चाहिए वरना सेव से फाइबर का लाभ प्राप्त करने में असमर्थ होगे। सभी को हमारे आहार में फाइबर के महत्व के बारे में जानना चाहिए-

सेब मस्तिष्क बिमारियों जैसे कि अल्जाइमर की रोकथाम करने में भी उपयोगी है क्योंकि यह मुक्त रेडिकल डेमेज से मस्तिष्क कोशिकाओं की रक्षा करता है जो अल्जाइमर का कारण बनती है। 

सेब फ्लेवोनॉयड क्यूरसेटिन और नरीन्जिन की मात्रा उच्च होती है जो 50 प्रतिशत तक फेफड़ो के कैंसर को होने से रोकती है-

सेब खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होता है। ये स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि बहुत स्वास्थ वर्धक भी होता है।

स्वस्थ जीवनशैली चाहते हैं, तो हर रोज एक सेब खाना शुरू करें। सेब में पाए जाने वाले विशेष तत्व मोटापे से संबंधित बीमारियों को दूर रखने में मददगार हो सक ते हैं।

सेब उर्जा का एक बहुत अच्छा स्रोत है चूंकि यह फेफड़ो के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति में मदद करता है। इसलिए, आपको वर्कआउट करने से पहले कुछ सेब खाने की सलाह दी जाती है। यह आपकी क्षमता को बढ़ाता है और आपकी उर्जा के स्तर में भी वृद्धि लाता है। इन स्वास्थ्य लाभों के अलावा, सेब में मिनरल और विटामिन प्रचुर मात्रा में होती है जो रक्त को साफ करते है।

इसमें एंटी आक्सीडेंट पाए जाते हैं जोकी हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के कैंसरो को बढने से रोकता है| सेब दिल की बिमारियों को भी ठीक कर देता है|

सेब का जूस हमारे शरीर मे से सभी हानिकारक तत्वों को बाहर निकाल देता है जिससे हमारी किडनी और लीवर कि बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं|

सेब मे अधिक मात्रा मे एंटी आक्सीडेंटपाए जातें हैं जो कि कलोस्ट्रोल के लेवल को कम करने मे मदद करते हैं|

सेब से बहुत से मिनरल्स (पोटाशियम, कैल्सियम, फोस्फोरोस और मग्नेशियम, आयरन, कापर और जिंक) होते हैं जो कि त्वचा, नाखुनो और बालों के स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होतें हैं|

सेब खाने से दिमाग तेज होता है। पड़ने वाले बच्चो को तो सेब जरुर खाना चाहिए|

सेब हमारे शरीर मे ऐसे बेक्टेरिया को बढने मे मदद करता है जो हमारी पाचन प्रणाली को बढ़ाते हैं|

सेब खाने हमारे शरीर के फेफड़े स्वस्थरहते हैं।

इसका सेवन दांतों और मसूढ़ों को मजबूत और कीटाणु रहित बनाता है।

गले में खराबी आने पर ताजे सेब का रस कुछ देर गले में ही रोक कर रखें।

सेब में पाया जाने वाला फाइबर दिल के मरीजों के लिए बहुत ही लाभदायक होता है|

सेब का जूस अधिक उम्र के लोगो के लिए बहुत लाभदायक होता है क्योंकि ये गठिया और जोड़ो के दर्द को कम करने मे मदद करता है|

सेब खाने से मस्तिष्क की कमजोरी दूर होती है। दोपहर तथा रात को कच्चे सेब की सब्जी मस्तिष्क के रोगों में लाभ पहुंचाती है। रोज शाम को एक मीठा सेब तथा रात को एक गिलास सेब का शरबत पीने से रोगी को अतिशीघ्र लाभ होता है।

शरीर में रक्त की कमी हो, उच्च रक्तचाप हो तो सेब का सेवन अति लाभदायक है।

आंखों के रोगी इसकी पुल्टिस बनाकरआंखों पर रखें और ताजे सेब को मक्खन के साथ खाएं। इससे पेशाब खुलकर आएगा तथा चेहरे की रंगत भी सुर्ख हो जाएगी।

यह पेट के कीड़े, कब्ज और अम्लता को दूर करता है। तथा पुराने सिर दर्द में रोज एक सेब नमक लगाकर खाएं।

खांसी में सेब के रस में मिश्री मिलाकर पिएं

बुखार में रोगी को ताजे सेब का रस पिलाने से फायदा होता है।

सेब का यौन संतुष्टि पर इसलिए बेहतर असर होता है क्योंकि रेडवाइन और चॉकलेट की तरह उनमें पॉलोफेनोल्स होते हैं और एंटीऑक्सिडेंट्स जननांग और योनि तक रक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने में मदद करते हैं, जिस कारण उत्तेजना में मदद मिलती है. सेब में फ्लोरीजिन भी पाए जाते हैं. फल और सब्जियों में पाया जाने वाला यह आम एस्ट्रोजन है और जो संरचनात्मक दृष्टि से एस्ट्राडियोल के समान है. यह महिला हार्मोन है और महिला कामुकता में बड़ी भूमिका निभाता है. बेशक अध्ययन की एक सीमा है. साथ ही शोध में अपेक्षाकृत छोटा सैंपल लिया गया था. हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि नतीजे दिलचस्प है. एक सेब हर रोज खाने जैसी सलाह तो है ही. इससे महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही सेक्स संबंधी हॉर्मोन भी सक्रिय होते हैं. सेब को महिलाओं के यौनजीवन के लिए खास कर फायदेमंद माना जाता है-



सेब की चटनी केसे बनाये :-

सामग्री :-
500 ग्राम हरे सेब(छीलकर कटे हुए), 2 टे.सपून घी या तेल, 1-1/2 टी स्पून जीरा, 2 हरी मिर्च (बारीक कटी हुई), 2 टी स्पून पिसा अदरक, 1 टी स्पून हल्दी पाउडर, 1/4 कप पानी, 1/2 टी स्पून दालचीनी, 1 चुटकी जायफल (पिसा हुआ), 1 कप चीनी।

विधि :-
तेल या घी को गर्म करके जीरे को भून लें। हरी मिर्च व अदरक पेस्ट डालकर 1 मिनट पकाएं फिर सेब और हल्दी डाल कर 2-3 मिनट तक हिलाएं। आंच धीमी कर के पानी, दालचीनी व जायफल डालें। जब तक सेब नरम न हो जाए तब तक बीच-बीच में हिलाते हुए पकाते रहें। चीनी डाल कर चटनी को तब तक पकाएं जब तक कि जैम जैसी न लगने लगे।

स्लाइडर सिरका बनाये :-

साधारण प्रयोग के लिए तीखा सिरका सेब या नासपाती के छिलके से बनाया जाता है। इन छिलकों को पानी के साथ किसी भी पत्थर के मर्तबान में रख देते हैं और उसमें कुछ सिरका या खट्टी मदिरा डालकर गर्म स्थान में रख देते हैं और कुछ दिनों बाद उसमें इच्छानुसार पानी डालते हैं एक-दो हफ्ते में सिरका तैयार हो जाता है।

उपचार और प्रयोग -