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17 फ़रवरी 2015

अस्थमा के इलाज को हजारों लोग आते है -

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क्या आप सोच सकते हैं कि जिंदा मछली को निगलने से अस्थमा ठीक किया जा सकता है। हैदराबाद के बाधिनी गौड़ परिवार की मानें तो हां, बशर्ते मछली के मुंह में जड़ी-बूटियों से तैयार दवा भरी हो। तस्वीरों में देखें कैसे करता है बांधिनी गौड़ परिवार अस्थमा का इलाज।ये परिवार दशकों से अस्थमा मरीजों को ये दवा दे रहा है और हजारों लोग न सिर्फ देश से बल्कि विदेश से भी जिंदा मछली निगलने वाला ये इलाज कराने इस परिवार के पास आ रहे हैं -




आंध्र प्रदेश में हर वर्ष हज़ारों लोग 'मछली इलाज' कहे जाने वाले इस उपचार के लिए आते हैं और इसकी लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में घटने के बदले बढ़ी है. दमा के रोगी को एक जीवित मछली निगलनी होती है जिसके भीतर दमा की दवाई होती है और हर वर्ष लगभग पाँच लाख लोग जून के महीने में इस उपचार के लिए हैदराबाद आते हैं-


मछली के ज़रिए दी जाने वाली इस दवा पर हैदराबाद के गौड़ परिवार का एकाधिकार है, उनका कहना है कि यह प्राकृतिक औषधि है जो उनके परदादा को हिमालय के एक तपस्वी ने 1854 में दी थी.गौड़ परिवार के एक सदस्य बठिनी हरिनाथ कहते हैं कि उनका परिवार पिछले 150 वर्षों से यह दवा लोगों को मुफ़्त में देता रहा है.
गौड़ परिवार का कहना है कि वे इस दवा का फ़ार्मूला नहीं बता सकते क्योंकि ऐसा करने से उसकी 'शक्ति चली जाएगी' और दूसरे लोग इसे अपना धंधा बना लेंगे.



दमा रोग के इलाज के लिए यह दवा साल में केवल एक दिन मृगशिरा कार्तिक के दिन ही दी जाती है। मृगशिरा कार्तिक 5 से 9 जून तक किसी भी दिन होती है और हैदराबाद में मानसून के आने की निर्धारित तारीख़ 5 जून है। दवा देने का यह सिलसिला 150 सालों से चला आ रहा है। हैदराबाद के पुराने शहर में चारमीनार से कुछ ही दूरी पर एक स्थान है दूध बाउली।  दूध बाउली में बत्तिनी गौड़ परिवार रहता है। यह ब्राह्मण परिवार है। इसी परिवार में यह दवा तैयार की जाती है और वितरित की जाती है जिसे मछली प्रसाद का वितरण कहते है-




वास्तव में दवाई कुछ जड़ी-बूटियों से तैयार की जाती है। यह कौन सी जड़ी-बूटियाँ है और दवाई कैसे बनाई जाती है यह सब राज़ है और इस परिवार के अलावा इसे कोई नहीं जानता। इस दवा की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाई जाती है। इस गोली को छोटी मरल जाति की जीवित मछली के मुख में रखा जाता है फिर इस मछली को रोगी का मुहँ खोलकर उसमें भीतर डाला जाता है फिर रोगी का मुहँ बन्द कर मुँह को थोड़ा पीछे करते है जिससे रोगी मछली को साबुत निगल लें-


यह दवाई लेने के तीन-चार घण्टे पहले से रोगी कुछ नहीं खाता है यानि खाली पेट रहता है। माना जाता है कि मछली रोगी के खाली पेट में चक्कर लगाती है। मछली और उस दवा की रासायनिक क्रियाओं से दमा रोग ठीक होता है। यह दवाई लेने के पन्द्रह दिन बाद तक कुछ फल और सब्जियाँ खाने की मनाही होती है और कुछ विशेष रूप से खाए जाते है। ऐसा लगातार चार साल तक करने पर दमा रोग पूरी तरह से ठीक होता है-


पहले यह दवाई दूध बाउली स्थित घर में ही दी जाती थी। फिर रोगियों की संख्या बढने लगी और मुहल्ले के मैदान में इसे दिया जाने लगा। पर इधर कुछ सालों से रोगियों की संख्या बहुत बढ गई है। देश के कोने-कोने से रोगी आ रहे है। इसीलिए शहर के सबसे बड़े मैदानों जैसे नुमाइश मैदान और निज़ाम काँलेज मैदान में मछली प्रसाद वितरण की व्यवस्था की जा रही है-



मृगशिरा कार्तिक के दिन सुबह तड़के से ही दवाई दी जाती है जो लगातार चौबीस घण्टे और नक्षत्र के आधार पर कुछ घण्टे और भी जारी रहती है। दवाई मुफ़्त दी जाती है पर मछली रोगी को खुद खरीदनी होती है जिसके लिए लगभग 50 काउंटर खोले जाते है। टोकन के अनुसार जब बारी आने वाली होती है तभी मछाली खरीदनी होती है ताकि मछली जीवित रह सके-



राज्य प्रशासन इसमें पूरी मदद करता है। भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस बन्दोबस्त होता है। कई स्वयंसेवी संघटन भी मदद करते है। रोगियों की संख्या बहुत होती है इसीलिए पाँच दिन पहले से ही टोकन जारी किए जाते है। इस तरह बाहर से आए रोगी और साथ आए रिश्तेदारों को लगभग एक सप्ताह तक ठहरना पड़ता है। यह संघठन उनके ठहरने की व्यवस्था करते है। विभिन्न रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से उनकी सुविधा के लिए राज्य परिवहन विशेष बसें चलाता है। दवाई देने यानि मछली प्रसाद वितरण के स्थान पर पानी और छाँछ वितरण की व्यवस्था भी यह संघठन करते है-

दवाई की रासायनिक जाँच करवाने और इसे अवैध ठहराने की बहुत कोशिश की गई। डाँक्टरों की एसोसिएशन ने इसे अदालत में चुनौती भी दी पर फ़ैसला गौड़ परिवार के हक़ में हुआ और रोगियों की बढती संख्या को देखकर इसे जारी रखने को कहा गया-

महत्वपूर्ण बात ये है कि मछली के मुंह में भरी जाने वाली दवा के बारे में सिर्फ ये परिवार ही जानता है और सिर्फ परिवार की अगली पीढ़ी को ही ये सीक्रेट फॉर्मूला बताया जाता है-


अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है। लग रहा है जैसे मरल जाति की मछली की नस्ल समाप्त हो रही है। वैसे मछलियों को प्रजनन के बाद ही मार्किट में भेजा जाता है जिससे नस्ल बढती रहती है। मगर इस दवाई में छोटी मछली का प्रयोग किया जाता है यानि प्रजनन के पहले ही मछली समाप्त हो रही है-


रोगियों की संख्या बढने से मछलियाँ भी हज़ारों की संख्या में प्रयोग में आ रही है।


भीड़ बढ़ने के कारण लोगो को इंतज़ार करना पड़ रहा है -



आप इसे यू ट्यूब पे भी देखे -https://www.youtube.com/watch?v=uLN-g5xf3ZQ

उपचार और प्रयोग -

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