एक रामबाण दवा-अश्वगंधा -Ek Rambaan Dava Ashwgandh

5:12 pm 7 comments
अश्वगंधा एक बलवर्धक जड़ी है इसका पौधा झाड़ीदार होता है आयुर्वेद में जड़ी बूटियों का बड़ा महत्व है औषधि के रूप में मुख्यतः इसकी जड़ों का प्रयोग किया जाता है अश्वगंधा की गीली ताजी जड़ से घोड़े के मूत्र के समान तीव्र गंध आती है इसलिए इसे अश्वगंधा या वाजिगंधा कहते हैं-



अश्वगंधा या वाजिगंधा का अर्थ है अश्व या घोड़े की गंध। इसकी जड़ 4−5 इंच लंबी, मटमैली तथा अंदर से शंकु के आकार की होती है, इसका स्वाद तीखा होता है इस जड़ी को अश्वगंधा कहने का दूसरा कारण यह है कि इसका सेवन करते रहने से शरीर में अश्व जैसा उत्साह उत्पन्न होता है-

ये सस्ती होने के कारण यह मध्यम व निर्धन परिवारों के लिये रसायन का काम करती है। असगंध पंसारियों की दुकानों से सरलता से मिल जाती है। असगंध की जड़ भूरे रंग की होती है और स्वाद में कसैली होती है। इसकी जड़ कूटने से इसमें घोड़े के मूत्र की बू आती है-

नागपुर में उत्पन्न होने वाली असगंध उत्तम होती है, इसलिये इसे असगंध नागौरी कहते हैं-

निम्नलिखित रोगों में प्रयोग की जाती है-

असंगध से सूखा रोग से ग्रस्त, हड्डियों के पिंजर बच्चे मोटे ताजे हो जाते हैं। इसके प्रयोग से कमजोर बच्चों का वजन बढ़ जाता है। दूध पिलाने वाली स्त्रियों का दूध बढ़ जाता है-

इसके निरंतर प्रयोग से बुढ़ापा पास नहीं फटकता। सायु की कमजोरी, वात व सर्दी से उत्पन्न होने वाले रोगों में जैसे पट्ठों में दर्द होना। अंग सुन्न होना, कमर दर्द, पक्षाघात, शरीर पर च्युटियां चलना प्रतीत होना आदि पर असगंध सोने पर सोहागे का काम करता है-

पक्षाघात की दवाओं में जैसे महानारायण तेल, नारायण तेल अश्वगंधारिष्ट में इसका प्रयोग होता है-

असगंध एक वर्ष तक यथाविधि सेवन करने से शरीर रोग रहित हो जाता है। केवल सर्दीयों में ही इसके सेवन से दुर्बल व्यक्ति भी बलवान होता है। वृद्धावस्था दूर होकर नवयौवन प्राप्त होता है-

अश्वगंधा के चूर्ण की एक−एक ग्राम मात्रा दिन में तीन बार लेने पर शरीर में हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणों की संख्या तथा बालों का काला पन बढ़ता है। रक्त में घुलनशील वसा का स्तर कम होता है तथा रक्त कणों के बैठने की गति भी कम होती है। अश्वगंधा के प्रत्येक 100 ग्राम में 789.4 मिलीग्राम लोहा पाया जाता है। लोहे के साथ ही इसमें पाए जाने वाले मुक्त अमीनो अम्ल इसे एक अच्छा हिमोटिनिक (रक्त में लोहा बढ़ाने वाला) टॉनिक बनाते हैं-

असंगध चूर्ण, तिल व घी 10-10 ग्राम लेकर और तीन ग्राम शहद मिलाकर नित्य सर्दी में सेवन करने से कमजोर शरीर वाला बालक मोटा हो जाता है-

अश्वगंधा का चूर्ण 6 ग्राम, इसमें बराबर की मिश्री और बराबर शहद मिलाकर इसमें 10 ग्राम गाय का घी मिलायें, इस मिश्रण को सुबह शाम शीतकाल में चार महीने तक सेवन करने से बूढ़ा व्यक्ति भी युवक की तरह प्रसन्न रहता है-

अश्वगंधा की जड़ के महीन चूर्ण को तीन ग्राम की मात्रा में गर्म प्रकृति वाली गाय के ताजे दूध से वात प्रकृति वाला शुद्ध तिल से और कफ प्रकृति का व्यक्ति गर्म पानी के साथ एक वर्ष तक सेवन करे तो निर्बलता दूर होकर सब व्याधियों का नाश होता है और निर्बल व्यक्ति बल प्राप्त करता है-

अश्वगंधा चूर्ण 20 ग्राम, तिल इससे दुगने, और उड़द आठ गुने अर्थात 140 ग्राम, इन तीनों को महीन पीसकर इसके बड़े बनाकर ताजे-ताजे एक ग्राम तक खायें-

अश्वगंधा चूर्ण और चिरायता बराबर-बराबर लेकर खरल (कूटकर) कर रखें। इस चूर्ण को 10-10 ग्राम की मात्रा में सुबह ग्राम शाम दूध के साथ खायें-

एक ग्राम अश्वगंधा चूर्ण में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिश्री डालकर उबालें हुए दूध के साथ सेवन करने से वीर्य पुष्ट होता है, बल बढ़ता है-

शतावर, असगंधा, कूठ, जटामांसी और कटेहली के फल को 4 गुने दूध में मिलाकर या तेल में पकाकर लेप करने से लिंग मोटा होता है और लिंग की लम्बाई भी बढ़ जाती है-

कूटकटेरी, असगंध, वच और शतावरी को तिल के तेल में जला कर लिंग पर लेप करने से लिंग में वृद्धि होती है-असगंध चूर्ण को चमेली के तेल के साथ खूब मिलाकर लिंग पर लगाने से लिंग मज़बूत हो जाता है-

स्त्रियों को यह दवा खिलाते रहने से गर्भाशय के रोग दूर हो जाते हैं। बच्चा होने के पश्चात प्रसूता को असगंध का प्रयोग निरंतर कराते रहने से उसकी कमजोरी व दूसरे रोग दूर हो जाते हैं-

यदि प्रदर अधिक आता हो तो उसमें भी असगंध रामबाण का काम करती है-

जिन स्त्रियों के असमय ही स्तन ढीले हो जाते है असगंध का लेप करने से स्तन कड़े हो जाते हैं-

बांझ स्त्रियां यदि निरंतर प्रयोग करें तो भगवान की कृपा से संतान प्राप्ति होती है-

असगंध मर्दाना शक्ति उत्पन्न करती है। नपुंसकता को दूर करती है। वीर्य उत्पन्न करती है, शुक्रकीटों को बढ़ाती है-

शारीरिक, मानसिक और स्ायुविक कमजोरी, याद न रहना, आंखों में गढ़े पड़ जाना आदि रोगों में लाभदायक है-

स्वप्नदोष व प्रमेह को दूर करती है-

वात रोग जैसे गठिया, आमवात, जोड़ों का दर्द, शोच और जोड़ पत्थरा जाने पर असगंध खाने व लगाने पर कमाल का असर दिखाती है-

असगंध को गोमूत्र में घिस कर कंठमाला पर कुछ दिन लगाने से आराम होता है-

इसे बकरी के दूध के साथ प्रयोग करने से तपेदिक रोग ठीक हो जाता है-

असगंध पाचनांगों को शक्तिशाली बनाती है, भूख बढ़ाती है और भोजन की शरीरांश बनाती है-

असगंध मानसिक कमजोरी, पुराना सिर दर्द, नींद न आना, वहम व पागलपन जैसे रोगों की चोटी की दवा है-

हजारों वर्षों से असगंध का प्रयोग हमारे देश में होता आ रहा है। बड़ों के लिये इसकी खुराक दो से चार ग्राम व बच्चों के लिये एक ग्राम प्रात: सायं दूध के साथ प्रयोग में लायें-

उपचार और प्रयोग-

7 टिप्‍पणियां :

  1. अगर अश्वगंधा की कैप्सूल लिया जाय तब इसका सेवन कैसे करे।

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    1. Ashok Agrahri जी आप अश्वगंधा का कैप्सूल भी लेगे तो भी कोई नुकशान नहीं है आप गर्मी में एक कैप्सूल से जादा न ले और इसके साथ आधे घंटे बाद आधा किलो दूध का भी सेवन करे -

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  2. Uderkap churn se kabaj kitne dino m thik ho jayegi ager kabaj 1 mahina ki ho

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  3. श्रीमान जी आयुर्वेदिक औषधियों पर आपने रौशनी डाल कर अच्छा काम किया है , आपका धन्यवाद है लेकिन इसमें ओषधियों की मात्रा नही बताई गयी उस पर भी थोड़ा प्रकाश डाले

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  4. Meri ma ko migraine ki problem hai so kya kare sir???

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    1. कब से है देखे-http://www.upcharaurprayog.com/2014/11/Migraine-treatment.html

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