28 अगस्त 2017

वेरीकोज वेन्स(Varicose Veins)क्या है

रक्त में हिमोग्लोबिन(Hemoglobin)नामक लाल पदार्थ होता है इसकी विशेषता यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड एवं ऑक्सीजन दोनों के साथ प्रति वतर्यता(Reversibly)से जुड़ सकता है-हिमोग्लोबिन जब शरीर के ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करता है वह कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन कहलाता है कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन वाला रक्त अशुद्ध होता है जो शिराओं से होकर फेफड़ों में श्वांस लेने की प्रक्रिया में हीमोग्लोबिन कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़कर शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है-

वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)क्या है

क्या होता है वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)-


1- यह शुद्ध रक्त धमनियों द्वारा कोशिकाओं तक पहुंचता है तथा अशुद्ध रक्त का रंग नील लोहित या बैंगनी होता है-शिराओं की भित्तियां पतली होती हैं और ये त्वचा के ठीक नीचे होती हैं-इसीलिए ऊपर से शिराओं को देखना आसान होता है अशुद्ध नील लोहित रंग के रक्त के कारण शिराएं(Veins)हमें नीले रंग की दिखाई देती हैं-शिराओं की तुलना में धमनियों की भित्ति अधिक मोटी होती है और काफी गहराई में स्थित होती है-इस कारण लाल रक्त प्रवाहित होने वाली धमनी हमें दिखाई नहीं देती है-

2- हमारे शरीर में रक्त को वापस ह्रदय तक ले जाने वाली शिराए जब मोटी होकर उभर कर दिखाई देने लगती है तथा सुजन आ जाती है तब व्यक्ति को टांगो में थकान और दर्द महसूस होता है अधिक उभरी शिराओ के होने का मुख्य कारण  हृदय की तरफ रक्त ले जाने वाली शिराओं में वाल्व लगे होते हैं जिसके कारण ही रक्त का प्रवाह एक दिशा की ओर होता है-

3- कई प्रकार की बीमरियों(कब्ज, खानपान सम्बन्धी विकृतियां, गर्भावस्था से सम्बन्धित रोग) के कारण शिराओं के रक्त संचार में बाधा उत्पन्न हो जाती है जिसकी वजह से ये शिरायें फैल जाती हैं और रक्त शिराओं में रुककर जमा होने लगता है और सूजन हो जाती हैं और अन्य प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-व्यायाम की कमी, बहुत समय तक खड़ा रहना, अधिक तंग वस्त्र, अधिक मोटापा के कारण भी यह रोग हो जाता है यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक होता है क्योंकि आजकल रसोईघर में खड़े होकर ही भोजन बनाया जाता है-

4- इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के टांगों में दर्द होता है तथा रोगी व्यक्ति को थकान और भारीपन महसूस होता है इसमें रोगी के टखने सूज जाते हैं और रात के समय टांगों  में ऐंठन होने लगती है तथा त्वचा का रंग बदल जाता है और उसके निचले अंगों में त्वचा के रोग भी हो जाते हैं-

प्राकतिक उपचार(Natural Treatments)करे-


1- रोगी व्यक्ति को नारियल  का पानी, जौ का पानी, हरे धनिये का पानी, खीरे का पानी, गाजर का रस, पत्तागोभी, पालक का रस आदि के रस को पी कर उपवास रखना चाहिए तथा हरी सब्जियों का सूप भी पीना चाहिए-

2- कुछ दिनों तक रोगी व्यक्ति को फल, सलाद तथा अंकुरित दालों को भोजन के रूप में सेवन करना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को वे चीजें अधिक खानी चाहिए जिनमें विटामिन सी तथा ई की मात्रा अधिक हो और उसे नमक, मिर्च मसाला, तली-भुनी मिठाइयां तथा मैदा नहीं खाना चाहिए-

3- पीड़ित रोगी को गरम पानी का एनिमा भी लेना चाहिए तथा इसके बाद रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए और फिर पैरों पर मिट्टी का लेप करना चाहिए तथा यदि रोगी व्यक्ति का वजन कम हो जाता है तो मिट्टी का लेप कम ही करें-

4- जब रोगी व्यक्ति को ऐंठन तथा दर्द अधिक तेज हो रहो हो तो गर्म तथा इसके बाद ठण्डे पानी से स्नान करना चाहिए-रोगी व्यक्ति को गहरे पानी में खड़ा करने से उसे बहुत लाभ मिलता है-

5- इस रोग से पीड़ित रोगी को सोते समय पैरों को ऊपर उठाकर सोना चाहिए-इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है-

6- यदि इस रोग में कुछ ये आसन का उपयोग करे तो इसमें निश्चित ही लाभ होता है जैसे-सूर्यनमस्कार, शीर्षासन, सर्वागासन, विपरीतकरणी, पवनमुक्तासन, उत्तानपादासन, योगमुद्रासन आदि ये किसी अच्छे योगाचार्य से सीख सकते है इसमें समय अवश्य लग सकता है मगर धीरे-धीरे ये रोग चला जाता है-

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