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26 जुलाई 2015

रहस्मयी अनोखे खज़ाने जो आज भी रहस्य है-

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खजानों की खोज का विचार हमेशा से इंसानी दिमाग में आता रहा है। बहुत से लोगों ने इस तरह की खोजों में अपना जीवन लगा दिया। ऐसे कुछ खजाने खोज भी लिए गए लेकिन कुछ खजाने केवल किवदंतियां बन कर रह गए।

इस दुनिया में सैंकड़ों ऐसे खजाने दबे और छुपे हुए हैं जो कभी किसी काल में खो गए थे। इस तरह के खजाने या तो जानबूझ कर छुपाए गए या फिर दुर्घटनावश वह खो गए। समुद्र के गर्भ में, पहाडियों को चोटी पर, पूजा घरों में, कुओं में, महलों में, और भी जाने कहां कहां इन खजानों को छुपाने का प्रयास किया गया था। भारत में भी ऐसे खजाने और उनकी कहानियों की कोई कमी नहीं है।

हम आपको बताएंगे भारत के ऐसे कुछ खोए हुए खजानों के बारे में जिनकी कहानी भी बेहद दिलचस्प है। हालांकि इनमें से कौन सी कहानी सच्ची है और कौन सी कल्पना इसके बारे में ठीक-ठीक कुछ कहा नहीं जा सकता।


चारमीनार की सुरंग का खजाना:-
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ऐसा माना जाता है कि कभी ऐतिहासिक गोलकुंडा किला और चारमीनार के बीच 15 फुट चौड़ी और 30 फुट ऊंची एक भूमिगत सुरंग थी। इस सुरंग को सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। और माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना छिपाकर रखा था जो स्‍थानीय किस्सों के अनुसार आज भी यहां मौजूद है।

सुल्तान ने यूं तो इस सुरंग को इसलिए बनवाया था कि मुश्किल वक्त में जान बचाई जा सके लेकिन बाद में इस सुरंग में उन्होंने गुप्त तहखाने भी बनवाए जिनमें उन्होंने खरबों रुपये के खजाने को छुपा दिया। सैंकडों सालों तक पैसा, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य रत्न जमा किए गए थे और फिर इस सुरंग में दफना दिए गए। 1936 में निजाम मीर ओसमान अली ने एक सर्वे कराया था और साथ ही नक्शा भी बनवाया था। हालांकि उस दौरान यहां खुदाई नहीं कराई गई थी।

इस खजाने का रहस्य अभी तक भी सुलझ नहीं पाया है और इसके सुलझने की संभावना भी कम ही है लेकिन भी भी इसमें लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है।


पद्मनाभ मंदिर का खजाना:-
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आज-कल फिलहाल में जिस खजाने की चर्चा सबसे ज्यादा हुई थी वह था पद्मनाभ स्वामी मंदिर का खजाना। माना जाता है कि करीब एक लाख करोड़ का खजाना अभी तक वहां मिल चुका है जबकि इससे कहीं अधिक वहां के तहखानों में बंद है।

कहा जाता है कि 10 वीं शताब्दी में आए राजवंश ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। कहीं-कहीं इस मंदिर के 16वीं शताब्दी के होने का भी जिक्र है। इसके बाद 1750 में त्रावणकोर के एक योद्धा मार्तंड वर्मा ने आसपास के इलाकों को जीत कर संपदा बढ़ाई।

त्रावणकोर के शासकों ने शासन को दैवीय स्वीकृति दिला दी थी और राज्य भगवान को समर्पित कर दिया था। मंदिर से भगवान विष्णु की एक मूर्ति भी मिली है जो शालिग्राम पत्थर से बनी हुई है।

मार्तंड वर्मा ने पुर्तगाली समुद्री बेडे और उसके खजाने पर भी कब्जा कर लिया था। यूरोपीय लोग मसालों खासकर काली मिर्च के लिए भारत आते थे। त्रावणकोर ने इस व्यवसाय पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया था।

यह मंदिर एक ऐसे इलाके में बना हुआ है जहां कभी कोई विदेशी हमला नहीं हुआ। 1790 में टीपू सुल्तान ने मंदिर पर कब्जे की कोशिश की थी लेकिन कोच्चि में उसे हार का सामना करना पड़ा था।

1991 में त्रावणकोर के अंतिम महाराजा बलराम वर्मा की मौत हो गई। 2007 में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी सुंदरराजन ने एक याचिका कोर्ट में दाखिल कर राज परिवार के अधिकार को चुनौती दी। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने तहखाने खोलकर खजाने का ब्यौरा तैयार करने को कहा।

27 जून 2011, यही वो तारीख थी जब तहखाने खोलने का काम शुरू किया गया। तहखाने खुले तो लोगों की आंखे खुली रह गई। पांच तहखानों में करीब एक लाख करोड़ की संपत्ति निकली है जबकि एक तहखाना अभी भी नहीं खोला गया है। उस तहखाने को जोड़कर कई अंधविश्वास जनित कहानियां सुना दी गईं!

माना जा रहा है कि इस तहखाने में जितना खजाना है वह इस पूरे खजाने से बड़ा है। सोचिए उस तहखाने से क्या निकलेगा? क्या यही है दुनिया का सबसे बड़ा खजाना.?


सोनगुफा का खजाना:-
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बिहार के राजगीर में भी खजाना दबे होने की बात कही जाती है। यहां की पहाड़ियों में सोन गुफा का महत्व बेहद खास है। माना जाता है कि इन पहाड़ियों के सीने में दफन है बेशुमार सोना।

कहा जाता है कि यह जगह महाभारत कालीन है। किदवंती है कि यहां भीम ने जरासंध का वध किया था। पहले इस जगह को राजगृह कहा जाता था। कालांतर में यह जगह मगध साम्राज्य के आधीन आ गई।

बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले भी इन गुफाओं को पवित्र मानते हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक ये गुफाएं तीसरी-चौथी शताब्दी की हैं। वहां स्थित सरकारी शिलालेखों के मुताबिक यहां रथ के पहियों के निशान मिले थे और शंख भाषा में लिखे कुछ अंश भी मिले थे।
बिम्बिसार को अजातशत्रु ने इसी जगह पर कैद करके रखा था। यहां से लोहे की हथकड़ियां भी मिली थीं। पिप्पल गुफा में भागवान बुद्ध आया करते थे ऐसा भी माना जाता है।

खजाना किसका है और कबसे यहां दबा पड़ा है ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिलते। कोई खजाने को महाभारत कालीन मानता है तो कोई बिम्बिसार और अजातशत्रु का बताता है। ऐसा भी कहा जाता है कि खजाना अजातशत्रु को ना मिल पाए इसलिए उसके पिता बिम्बिसार ने खजाने को गुफाओं की भूलभुलैया में दफना दिया था।

अंग्रेजों ने भी तोप से इन गुफाओं तो उड़ाने की कोशिश की थी लेकिन असफल रहे। तोप के गोले के निशान अभी भी वहां पर मौजूद हैं। माना जाता है कि शंख भाषा में जो लिखा है वही खजाने की असली कुंजी है लेकिन इस भाषा का कोई जानकार इस दुनिया में नहीं है।
गुफाएं पॉलिश की हुईं है और भागवान विष्णु की मूर्ति भी यहां मिली थी। वर्तमान में यह मूर्ति नालंदा संग्रहालय में रखी है।




जयगढ़ के किले का खजाना:-
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राजस्थान के कुछ खजानों की चर्चा समय समय पर होती रही है। इन्हीं में से एक है मान सिंह प्रथम का खजाना। मान सिंह अकबर का सेनापति था। माना जाता है कि 1580 में उन्होंने अफगानिस्तान को जीत लिया था। वहां से मुहम्मद गजनी के खजाने को लेकर वह हिंदुस्तान तो आ गया लेकिन उसने इसके बारे में अकबर को नहीं बताया। उसने इस खजाने को जयगढ़ किले में दफना दिया। यह माना जाता है कि उसने महल के नीचे तहखाने बनाए और खजाने को उसमें भर दिया। कहा तो ये भी जाता है कि 1976 में इमरजेंसी के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस खजाने की तलाश में जान लगा दी , कई महीनों तक खुदाई चलती रही, लेकिन उनकी ये खोज व्यर्थ गई।

हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि छह महीने के बाद खुदाई जब रुकी तो ट्रकों का काफिला किले से निकला। दिल्ली जयपुर रोड को आम आदमियों के लिए बंद कर दिया गया और फौजी ट्रकों में खजाने के प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचा दिया गया। एक स्थानीय पत्रकार ने RTI के माध्यम से ये जानना चाहा कि क्या सरकार ने वाकई ऐसी कोई खुदाई कराई थी जिसमें खजाना निकला हो। लेकिन सरकार ने इस RTI का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया।

इस खजाने को लेकर एक और भी कहानी राजस्थान में प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि मान सिंह ने इस खजाने के बारे में जोधा बाई को बता दिया था। जोधा ने इस खजाने को फतेहपुर सीकरी स्थित एक मंदिर में रखवा दिया था। वक्त की रेत में ये मंदिर दफन हो गया और साथ ही खो गया खजाने का रहस्य भी। स्थानीय लोग मानते हैं कि खजाना अभी भी उसी मंदिर में है।

हिमाचल प्रदेश की कमरुनाग झील का खजाना:-
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हिमाचल प्रदेश की कमरुनाग झील के बारे में माना जाता है कि इसका अंत पाताल में होता है और खजाने की रक्षा करते हैं नाग देवता। मंडी से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस झील को लोग पवित्र मानते हैं। माना जाता है कि अगर इस झील में आभूषण अर्पित किए जाएं तो मनोकामना पूरी होती है। लोग दूर दूर से आते हैं और गहने आदि इस झील को अर्पित कर देते हैं। वह मानते हैं कि उनकी भेंट सीधे देवताओं तक पहुंच जाती है।

मंदिर के इतिहास के बारे में कोई ठीक-ठीक दावा कर पाना मुश्किल है । दावा तो यह भी किया जाता है कि यह झील महाभारत काल की है। यहां एक लकड़ी का मंदिर भी बना है। इस मंदिर में कमरुनाग की एक पुरानी मूर्ति भी रखी है। स्थानीय लोग इस झील को चमत्कारी भी मानते हैं। कहा जाता है कि रात के वक्त झील से गड़गड़ाहट की आवाजें आती हैं और पानी उपर उठ कर मंदिर तक आता है। पानी प्राचीन मूर्ति के चरणों तक आता है और फिर वापस लौट जाता है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

सदियों से झील में गहने चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। झील की तलहटी में जमा खजाने का आकार कितना होगा या उसकी कीमत कितनी होगी यह कोई नहीं जानता लेकिन इसकी कीमत अरबों में होगी इसमें कोई दो राय नहीं।

आखिर सदियों से जमा हो रहे गहनों की कीमत इससे कम हो भी कैसे सकती है?

आधारित-(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)

उपचार और प्रयोग-http://www.upcharaurprayog.com

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