10 मई 2016

गर्भवती महिला का आहार क्या हो

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गर्भवती महिला का आहार - Diet of pregnant woman

गर्भवती महिला का आहार - Diet of pregnant woman

आज के लाइफ स्टाइल में गर्भवती महिलाओं के लिए शिशु को जन्म देना किसी चैलेंज से कम नहीं है परिवार में जब बच्चा जन्म लेने वाला होता है तो ऐसे में पति-पत्नी के लिए सावधानियां बरतनी और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है तब  ऐसी स्थिति में थोड़ी सी असावधानी भी बाद में जाकर जच्चा-बच्चा के लिए जानलेवा साबित हो सकती है-

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपना विशेष ध्यान देना चाहिए और इस दौरान महिलाओं को संतुलित आहार लेना चाहिए- संतुलित आहार महिलाओं के लिए वरदान साबित होता है तथा हल्का व्यायाम इसमें फायदेमंद होता है-

गर्भावस्था के दौरान ध्यान दें(Attention during pregnancy)

गर्भधारण करने के बाद से महिलाओं को स्त्री रोग विशेषज्ञ से रेगुलर जांच करवाते रहना चाहिए-

गर्भधारण के शुरू के दो महीनों में भूख कम लगती है इस दौरान महिलाओं को थोड़े-थोड़े अंतराल में हल्का भोजन लेना चाहिए-

दो महीने के बाद भूख बढ़नी शुरू हो जाती है उस स्थिति में पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन का सेवन करना चाहिए-

गर्भवती महिला के भोजन में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, विटामिन, खनिज-लवण व जल आदि का समुचित संतुलन होना जरूरी है-

गर्भवती महिला अगर पौष्टिक आहार का सेवन नहीं करती तो उसे एनीमिया (खून की कमी) होने का अंदेशा बना रहता है-

गर्भवती महिला को खट्टे, बासी व चर्बी वाले भोजन से दूर ही रहना चाहिए-
गर्भावस्था में दौड़ लगाना, तैरना, टेनिस खेलना व घुड़सवारी करना करना भी वर्जित है महिला को भारी काम करने से भी बचना चाहिए-इस अवस्था में हल्का व्यायाम अच्छा रहेगा-

शारीरिक तंदुरुस्ती के साथ-साथ मानसिक तंदरुस्ती की ओर भी विशेष ध्यान देना चाहिए-गर्भवती महिला को तनाव होने की सूरत में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज व गर्भपात होने की आशंका बनी रहती है-

गर्भवती महिला को माहिर डाक्टर की सलाह से टेटनेस का इंजेक्शन जरूर लगवा लेना चाहिए-

गर्भवती महिला को हर महीने अपना यूरिन (मूत्र) टेस्ट अवश्य करवाना चाहिए-

आचार्य चरक भी कहते हैं कि गर्भिणी के आहार का आयोजन तीन बातों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए-

गर्भवती के शरीर का पोषण, स्तन्यनिर्मिती की तैयारी व गर्भ की वृद्धि माता यदि सात्त्विक, संतुलित, पथ्यकर एवं सुपाच्य आहार का विचारपूर्वक सेवन करती है तो बालक सहज ही हृष्ट-पुष्ट होता है और प्रसव भी ठीक समय पर सुखपूर्वक होता है अत: गर्भिणी रुचिकर, सुपाच्य, मधुर रसयुक्त, चिकनाईयुक्त एवं जठराग्नि प्रदीपक आहार लें-

पानी को 15-20 मिनट उबालकर ही लेना चाहिये जितना सम्भव हो तो पानी उबालते समय उसमें उशीर (सुंगधीबाला ), चंदन, नागरमोथा आदि डालें तथा शुद्ध चाँदी या सोने (24 कैरेट) का सिक्का या गहना साफ़ करके डाला जा सकता है-

दूध ताजा व शुद्ध होना चाहिये- फ्रीज का ठंडा दूध योग्य नहीं हैं-यदि दूध पचता न हो या वायु होती हो तो 200 मि.ली. दूध में 100 मि.ली. पानी के साथ 10 नग वायविडंग व 1 से.मी. लम्बा सौंठ का टुकड़ा कूटकर डालें व उबालें- भूख लगनेपर एक दिन में 1-2 बार लें सकते हैं- नमक, खटाई, फलों और दूध के बीच २ घंटे का अंतर रखें-

गर्भावस्था के अंतिम तीन-चार मासों में मस्से या पाँव पर सूजन आने की सम्भावना होने से मक्खन निकाली हुई एक कटोरी ताज़ी छाछ दोपहर के भोजन में नियमित लिया करें-

आयुर्वेद ने घी को अमृत सदृश बताया है अत: प्रतिदिन1-2 चम्मच घी पाचनशक्ति के अनुसार सुबह-शाम लें-

घी का छौंक लगा के नींबू का रस डालकर एक कटोरी दाल रोज सुबह के भोजन में लेनी चाहिये- इससे प्रोटीन प्राप्त होती है दालों में मूंग सर्वश्रेष्ठ है और अरहर भी ठीक है -कभी-कभी राजमा, चना, चौलाई, मसूर कम मात्रा में लें -सोयाबीन पचने में भारी होने से न लें तो आपके लिए अच्छा है-

लौकी गाजर, करेला, भिन्डी, पेठा, तोरई, हरा ताजा मटर तह सहजन बथुआ, सुआ, पुदीना आदि हरे पत्तेवाली सब्जियाँ रोज लेनी चाहिये ‘भावप्रकाश निघुंट’ ग्रन्थ के अनुसार सुपाच्य, ह्र्द्यपोषक, वाट-पित्त का संतुलन करनेवाली, वीर्यवर्धक एवं सप्तधातु पोषक ताज़ी, मुलायम लौकी की सब्जी, कचूमर (सलाद), सूप या हलवा बनाकर रूचि अनुसार उपयोग करें-

शरीर में रक्तधातू लौह तत्त्व पर निर्भर होने से लौहवर्धक काले अंगूर, किशमिश, काले खजूर, चुकन्दर, अनार, आँवला, सेब, पुराना देशी गुड़ एवं पालक, मेथी हरा धनिया जैसी शुद्ध व ताज़ी पत्तोंवाली सब्जियाँ लें-लौह तत्व के आसानी से पाचन के लिये विटामिन ‘सी’ की आवश्यकता होती है, अत: सब्जी में नींबू निचोड़कर सेवन करें-खाना बनाने के लिये लोहे की कढाई, पतीली व तवे का प्रयोग करे-

हरे नारियल का पानी नियमित से गर्भोदक जल की उचित मात्रा बनी रहने में मदद मिलती है-मीठा आम उत्तम पोषक फल हैं, अत: उसका उचित मात्र में सेवन करे -वर, कैथ, अनन्नास, स्ट्राँबेरी, लीची आदि फल ज्यादा न खायें -चीकू, रामफल, सीताफल, अमरुद, तरबूज, कभी-कभी खा सकती हैं -पपीते का सेवन कदापि न करें- कोई भी फल काटकर तुरंत खा लें तथा फल सूर्यास्त के बाद न खाये-

गर्भिणी निम्न रूप से भोजन का नियोजन करे( Following the placement of food to Pregnant)

सुबह - 7-7:30 बजे नाश्ते में रात के भिगोये हुए 1-2 बादाम, 1-2 अंजीर व 7-8 मुनक्के अच्छे-से चबाकर खाये-

साथ में पंचामृत पाचनशक्ति के अनुसार ले-वैद्यकीय सलाहानुसार आश्रम निर्मित शक्तिवर्धक योग-सुवर्णप्राश, रजतमालती, च्यवनप्राश आदि ले सकती हैं-

सुबह 9 से 11 के बीच तथा शाम को 5 से 7 ले बीच प्रकृति-अनुरूप ताजा , गर्म, सात्त्विक, पोषक एवं सुपाच्य भोजन करें-

भोजन से पूर्व हाथ-पैर धोकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके सीधे बैठकर ‘गीता’ के 15वे अध्याय का पाठ करे और भावना करे कि ‘ह्रदयस्थ' प्रभु को भोजन करा रही हूँ-

मासानुसार गर्भिणी परिचर्या(Masanusar with child care )

हर महीने में गर्भ-शरीर के अवयव आकार लेते हैं अत: विकास-क्रम के अनुसार हर महीने गर्भिणी को कुछ विशेष आहार लेना चाहए -

पहला महिना-

गर्भधारण का संदेह होते ही गर्भिणी सादा मिश्री वाला सहज में ठंडा हुआ दूध पाचनशक्ति के अनुसार उचित मात्रा में तीन घंटे के अंतर से ले अथवा सुबह-शाम ले -साथ ही सुबह 1 चम्मच ताजा मक्खन (खट्टा न हो) 3-4 बार पानी से धोकर रूचि अनुसार मिश्री व 1-2 कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर ले तथा हरे नारियल की 4 चम्मच गिरी के साथ 2 चम्मच सौंफ खूब देर तक चबाकर खाये -इससे बालक का शरीर पुष्ट, सुडौल व गौरवर्ण का होगा इस महीने के प्रारम्भ से ही माँ को बालक में इच्छित धर्मबल, नीतिबल, मनोबल व सुसंस्कारों का अनन्य श्रद्धापूर्वक सतत मनन-चिंतन करना चाहिए-ब्रम्हनिष्ठ महापुरुषों का सत्संग एवं उत्तम शास्त्रों का श्रवण, अध्ययन, मनन-चिंतन करना चाहिए-

दूसरा महीना-

इसमें शतावरी, विदारीकंद, जीवंती, अश्वगंधा, मुलहठी, बला आदि मधुर औषधियों के चूर्ण को समभाग मिलाकर रख लें- इनका 1 से 2 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. दूध में 200 मि.ली. पानी डाल के मध्यम आँच पर उबालें, पानी जल जाने पर सेवन करें -

तीसरा महीना-

इस महीने में दूध को ठंडा कर 1 चम्मच शुद्ध घी व आधा चम्मच शहद (अर्थात घी व शहद विषम मात्रा में) मिलाकर सुबह-शाम लें -उलटियाँ हो रही हों तो अनार का रस पीने तथा ‘ॐ नमो नारायणाय’ का जप करने से वे दूर होती हैं-

चौथा महीना-

इसमें प्रतिदिन 10 से 25 ग्राम मक्खन अच्छे-से धोकर, छाछ का अंश निकाल के मिश्री के साथ या गुनगुने दूध में डालकर अपनी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन करें -इस मास में बालक सुनने-समझने लगता है -बालक की इच्छानुसार माता के मन में आहार-विहार संबंधी विविध इच्छाएँ उत्पन्न होने से उनकी पूर्ति युक्ति से (अर्थात अहितकर न हो इसका ध्यान रखते हुए) करनी चाहिए -यदि गर्भाधान अचानक हो गया हो तो चौथे मास में गर्भ अपने संस्कारों को माँ के आहार-विहार की रूचि द्वारा व्यक्त करता है-आयुर्वेद के आचार्यों का कहना है कि यदि इस समय भी हम सावधान होकर आग्रहपूर्वक दृढ़ता से श्रेष्ठ विचार करने लगें और श्रेष्ठ सात्त्विक आहार ही लें तो आनेवाली आत्मा के खुद के संस्कारों का प्रभाव कम या ज्यादा हो जाता है अर्थात रजस, तमस प्रधान संस्कारों में बदला जा सकता हैं एवं यदि सात्त्विक संस्कारयुक्त है तो उस पर उत्कृष्ट सात्त्विक संस्कारों का प्रत्यारोपण किया जा सकता है-

पाँचवाँ महीना-

इस महीने से गर्भ में मस्तिष्क का विकास विशेष रूप से होता हैं अत: गर्भिणी पाचनशक्ति के अनुसार दूध में 15 से 20 ग्राम घी ले या दिन में दाल-रोटी, चावल में 1-2 चम्मच घी, जितना हजम हो जाय उतना ही ले रात को 1 से 5 बादाम (अपनी पाचनशक्ति के अनुसार) भिगो दे, सुबह छिलका निकाल के घोंटकर खाये व ऊपर से दूध पिये -इस महीने के प्रारम्भ से ही माँ को बालक में इच्छित धर्मबल, नीतिबल, मनोबल व सुसंस्कारों का अनन्य श्रद्धापूर्वक सतत मनन-चिंतन करना चाहिए- 

छठा व सातवाँ महीना-

इन महीनों में दूसरे महीने की मधुर औषधियों -इसमें (शतावरी, विदारीकंद, जीवंती, अश्वगंधा, मुलहठी, बला आदि मधुर औषधियों के चूर्ण को समभाग मिलाकर रख लें -इनका 1 से 2 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. दूध में 200 मि.ली. पानी डाल के मध्यम आँच पर उबालें) में गोखरू चूर्ण का समावेश करे व दूध-घी से ले-इस महीने से प्रात: सूर्योदय के पश्चात सूर्यदेव को जल चढ़ाकर उनकी किरणें पेट पर पड़ें, ऐसे स्वस्थता से बैठ के ऊंगलियों में नारियल तले लगाकर पेट की हलके हाथों से मालिश (बाहर से नाभि की ओर) करते हुए गर्भस्थ शिशु को सम्बोधित करते हुए कहे - ‘जैसे सूर्यनारायण ऊर्जा, उष्णता, वर्षा देकर जगत का कल्याण करते हैं, वैसे तू भी ओजस्वी, तेजस्वी व परोपकारी बनना’ माँ के स्पर्श से बच्चा आनंदित होता है-

सातवें महीने में स्तन, छाती व पेट पर त्वचा के खिंचने से खुजली शुरू होने पर ऊँगली से न खुजलाकर देशी गाय के घी की मालिश करनी चाहिए-

आठवाँ व नौवाँ महीना-

इन महीनों में चावल को 6 गुना दूध व 6 गुना पानी में पकाकर घी दाल के पाचनशक्ति के अनुसार सुबह-शाम खाये अथवा शाम के भोजन में दूध-दलियें में घी डालकर खाये-शाम का भोजन तरल रूप में लेना जरूरी है गर्भ का आकार बढ़ने पर पेट का आकार व भार बढ़ जाने से कब्ज व गैस की शिकायत हो सकती है-निवारणार्थ निम्न प्रयोग अपनी प्रकृति के अनुसार करे -आठवें महीने के 15 दिन बीत जाने पर 2 चम्मच एरंड तेल दूध से सुबह 1 बार ले, फिर नौवें महीने की शुरुवात में पुन: एक बार ऐसा करे अथवा त्रिफला चूर्ण या इसबगोल में से जो भी चूर्ण प्रकृति के अनुकूल हो उसका सेवन वैद्यकीय सलाह के अनुसार करे -पुराने मल की शुद्धि के लिए अनुभवी वैद्य द्वारा निरुह बस्ति व अनुवासन बस्ति ले-चंदनबला लाक्षादि तेल से अथवा तिल के तेल से पीठ, कटि से जंघाओं तक मालिश करे और इसी तेल में कपडे का फाहा भिगोकर रोजाना रात को सोते समय योनि के अंदर गहराई में रख लिया करे -इससे योनिमार्ग मृदु बनता है और प्रसूति सुलभ हो जाती है-

पंचामृत-

9 महीने नियमित रूप से प्रकृति व पाचनशक्ति के अनुसार पंचामृत ले-

पंचामृत बनाने की विधि-

एक चम्मच ताजा दही, 7 चम्मच दूध, 2 चम्मच शहद, 1 चम्मच घी व 1 चम्मच मिश्री को मिला लें -इसमें 1 चुटकी केसर भी मिलाना हितावह है यह शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति, स्मरणशक्ति व कांति को बढ़ाता है तथा ह्रदय, मस्तिष्क आदि अवयवों को पोषण देता है-यह तीनों दोषों को संतुलित करता है व गर्भिणी अवस्था में होनेवाली उलटी को कम करता है उपवास में सिंघाड़े व राजगिरे की खीर का सेवन करें-इस प्रकार प्रत्येक गर्भवती स्त्री को नियमित रूप से उचित आहार-विहार का सेवन करते हुए नवमास चिकित्सा विधिवत् लेनी चाहिए ताकि प्रसव के बाद भी इसका शरीर सशक्त, सुडौल व स्वस्थ बना रहे, साथ ही वह स्वस्थ, सुडौल व सुंदर और ह्रष्ट-पुष्ट शिशु को जन्म दे सके-इस चिकित्सा के साथ महापुरुषों के सत्संग-कीर्तन व शास्त्र के श्रवण-पठन का लाभ अवश्य लें-

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