गर्भवस्था की सावधनियां-Caution In Pregnancy

गर्भवस्था की सावधनियां-Caution In Pregnancy


एक स्त्री  के गर्भाशय मे बालक के होने को गर्भावस्था (गर्भ+अवस्था) कहते हैं इसके उपरान्त महिला शिशु को जन्म देती है और आमतौर पर यह अवस्था मां बनने वाली महिलाओं में नौ माह तक रहती है-एक स्वस्थ महिला को प्रत्येक माह Menstrual bleeding (माहवारी) होती है गर्भ ठहरने के बाद मासिक-स्राव होना बंद हो जाता है इसके साथ-साथ दिल का खराब होना, उल्टी होना, बार-बार पेशाब का होना तथा स्तनों में हल्का दर्द बना रहना आदि साधारण शिकायतें होती है- इन शिकायतों को लेकर महिलाएं, स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाती है- 

डाक्टर महिला के पेट और योनि की जाचं करती है और बच्चेदानी की ऊंचाई को देखती है गर्भधारण करने के बाद बच्चेदानी का बाहरी भाग मुलायम हो जाता है इन सभी बातों को देखकर डाक्टर महिला को मां बनने का संकेत देता है इसी बात को अच्छे ढंग से मालूम करने के लिए डाक्टर रक्त या मूत्र की जांच के लिए राय देता है-

गर्भवती महिलाओं के रक्त और मूत्र में एच.सी.जी. होता है जो कौरिऔन से बनता है ये कौरिऔन औवल(Korion Oval) बनाती है- औवल का एक भाग बच्चेदानी की दीवार से तथा की नाभि से जुड़ा होता है इसके शरीर में पैदा होते ही रक्त और मूत्र में एच.सी.जी. आ जाता है- इस कारण महिला को अगले महीने के बाद से माहवारी होना रूक जाता है- एच.सी.जी. की जांच रक्त या मूत्र से की जाती है साधारणतया डाक्टर मूत्र की जांच ही करा लेते है-

जांच माहवारी आने के तारीख के दो सप्ताहे बाद करानी चाहिए ताकि जांच का सही परिणाम मालूम हो सके- यदि जांच दो सप्ताह से पहले ही करवा लिया जाए तो परिणाम हां या नहीं में मिल जाता है- यह वीकली पजिटिव कहलाता है-

कुछ स्त्रियां माहवारी के न आने पर दवाइयों का सेवन करना शुरू कर देती है इस प्रकार की दवा का सेवन महिलाओं के लिए हानिकारक होता है इसलिए जैसे ही यह मालूम चले कि आपने गर्भाधारण(Pregnancies) कर लिया है तो अपने रहन-सहन और खानपान पर ध्यान देना शुरू कर देना चाहिए-

गर्भधारण करने के बाद महिलाओं को किसी भी प्रकार की दवा के सेवन से पूर्ण डाक्टरों की राय लेना अनिवार्य होता है ताकि आप कोई ऐसी दवा का सेवन न करें जो आपके और होने वाले बच्चे के लिए हानिकारक होता है-

यदि महिलाओं को शूगर का रोग हो तो इसकी चिकित्सा गर्भधारण से पहले ही करनी चाहिए- यदि मिर्गी, सांस की शिकायत या फिर टीबी का रोग हो तो भी इसके लिए भी डाक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए-

आपके विचार और आपके कार्य भी गर्भाधारण के समय ठीक और अच्छे होने चाहिए ताकि होने वाले बच्चे पर अच्छा प्रभाव पड़े-

जैसे ही पुष्टि हो जाती है कि आप गर्भवती हैं उसके बाद से प्रसव होने तक आप किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ की निगरानी मे रहें तथा नियमित रुप से अपनी चिकित्सीय जाँच कराती रहें-

गर्भधारण के समय आपको अपने रक्त वर्ग (ब्ल्ड ग्रुप), विशेषकर आर. एच. फ़ैक्टर की जांच करनी चाहिए- इस के अलावा रूधिरवर्णिका (Hemoglobin) की भी जांच करनी चाहिए-

यदि आप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, थाइराइड आदि किसी, रोग से पीड़ित हैं तो गर्भावस्था के दौरान नियमित रुप से दवाईयां लेकर इन रोगों को नियंत्रण में रखें-

गर्भावस्था के प्रारंभिक कुछ दिनों तक जी घबराना, उल्टियां होना या थोड़ा रक्त चाप बढ़ जाना स्वाभाविक है लेकिन यह समस्याएं उग्र रुप धारण करें तो चिकित्सक से सम्पर्क करें-

गर्भावस्था के दौरान पेट मे तीव्र दर्द और योनि से रक्त स्राव होने लगे तो इसे गंभीरता से लें तथा चिकित्सक को तत्काल बताएं-

गर्भावस्था मे कोई भी दवा-गोली बिना चिकित्सीय परामर्श के न लें और न ही पेट मे मालिश कराएं- बीमारी कितना भी साधारण क्यों न हो, चिकित्सक की सलाह के बगैर कोई औषधि न लें-

यदि किसी नए चिकित्सक के पास जाएं तो उसे इस बात से अवगत कराएं कि आप गर्भवती हैं क्योकि कुछ दवाएं गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव छोडती है-

चिकित्सक की सलाह पर गर्भावस्था के आवश्यक टीके लगवाएं व लोहतत्व (Iron) की गोलियों का सेवन करें-

गर्भावस्था मे मलेरिया को गंभीरता से लें, तथा चिकित्सक को तत्काल बताएं-

गंभीरता से चेहरे या हाथ-पैर मे असामान्य सूजन, तीव्र सिर दर्द, आखों मे धुंधला दिखना और मूत्र त्याग मे कठिनाई की अनदेखी न करें, ये खतरे के लक्षण हो सकते हैं-

गर्भ की अवधि के अनुसार गर्भस्थ शिशु की हलचल जारी रहनी चाहिए यदि बहुत कम हो या नही हो तो सतर्क हो जाएं तथा चिकित्सक से संपर्क करें-

आप एक स्वस्थ शिशु को जन्म दें, इस के लिए आवश्यक है कि गर्भधारण और प्रसव के बीच आप के वजन मे कम से कम 10 कि.ग्रा. की वृद्धि अवश्य हो-

गर्भावस्था में अत्यंत तंग कपडे न पहनें और न ही अत्याधिक ढीले- इस अवस्था में ऊची एड़ी के सैंडल न पहने- जरा सी असावधानी से आप गिर सकती है

इस नाजुक दौर मे भारी श्रम वाला कार्य नही करने चाहिए, न ही अधिक वजन उठाना चाहिए- सामान्य घरेलू कार्य करने मे कोई हर्ज नही है-

इस अवधि मे बस के बजाए ट्रेन या कार के सफ़र को प्राथमिकता दें- आठवें और नौवे महीने के दौरान सफ़र न ही करें तो अच्छा है- गर्भावस्था मे सुबह-शाम थोड़ा पैदल टहलें- चौबीस घंटे मे आठ घंटे की नींद अवश्य लें- प्रसव घर पर कराने के बजाए अस्पताल, प्रसूति गृह या नर्सिगं होम में किसी कुशल स्त्री रोग विशेषज्ञ से कराना सुरक्षित रहता है-

गर्भावस्था मे सदैव प्रसन्न रहें- अपने शयनकक्ष मे अच्छी तस्वीर लगाए हिंसा प्रधान या डरावनी फ़िल्में या धारावाहिक न देखें-

देखे-  गर्भावस्था में क्या खाए-What to Eat During Pregnancy

देखे- Upcharऔर प्रयोग-
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