This website about Treatment and use for General Problems and Beauty Tips ,Sexual Related Problems and his solution for Male and Females. Home treatment,Ayurveda treatment ,Homeopathic Remedies. Ayurveda treatment tips in Hindi and also you can read about health Related problems and treatment for male and female

8 दिसंबर 2015

ज्ञान हमारी दस दिशाए कौन सी है

By
आज कल कुछ लोगो ने शिक्षा का ज्ञान तो प्राप्त कर लिया है लेकिन बहुत सी छोटी-छोटी जानकारियों से दूर होते चले गए है कारण जो भी हो लेकिन मुझे लगता है इसका वास्तविक कारण ये है कि शायद पढ़े लिखे लोगो के पास अपने बुजुर्गो के पास बैठने का समय अभाव है इसलिए छोटी -छोटी जानकारियों से वंचित होते जा रहे है -




आइये हमारे ब्लॉग में पूछे गए कुछ लोगो को दिशाओं का ज्ञान उपलब्ध कराते है -हमारी दस दिशाए कौन-कौन सी होती है -सबसे पहले आप सूर्य उदय के समय सामने उगने वाली दिशा पूर्व,पीठ की तरफ पच्छिम,बाये हाथ की तरफ उत्तर और सीधे हाथ यानी दाए हाथ की तरफ पड़ने वाली दिशा दक्षिण कहलाती है अब इन दिशाओं के आपस में मिलने वाले कोण की चार दिशा क्रमश: ईशान ,अग्नेय,नैऋत्य कोण,वायव्य कोण कहलाती है शेष दो आकास और पाताल दिशाए है इस प्रकार ये दस दिशाए है -अब जाने इनका महत्व -



पूर्व दिशा (East)-

पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं। आत्मा के कारक और रासृष्टि प्रकाश सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है। इस दिशा में कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। पूर्व दिशा में खुला स्थान परिवार के मुखिया की लम्बी उम्र का प्रतीक है-

पश्चिम (West direction)-

वरूण पश्चिम दिशा के देवता है और ज्योतिष के अनुसार शनिदेव पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धि , भाग्य और ख्याति का प्रतीक है-

उत्तर दिशा (North)-

उत्तर दिशा के अधिष्ठित देवता कुबेर हैं जो धन और समृद्धि के द्योतक हैं। ज्योतिष के अनुसार बुद्ध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है। इस दिशा में स्थान खाली रखना या कच्ची भूमि छोड़ना धन और समृद्धि कारक है-

दक्षिण दिशा (South)

यम दक्षिण दिशा के अधिष्ठित देव हैं। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख , सम्पन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है-

ईशान कोण (Northeast )-

पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान कोण की संज्ञा दी गई है। यह दो दिशाओं का सर्वोतम मिलन स्थान है। यह स्थान भगवान शिव और जल का स्थान भी माना गया है। ईशान को सदैव स्वच्छ और शुद्ध रखना चाहिए। इस स्थान पर जलीय स्रोतों जैसे कुंआ , बोरिंग वगैरह की व्यवस्था सर्वोतम परिणाम देती है- पूजा स्थान के लिए ईशान कोण को विशेष महत्व दिया जाता है। इस स्थान पर कूड़ा करकट रखना , स्टोर , टॉयलट वगैरह बनाना वर्जित है-

आग्नेय कोण (Lgneous angle)-

दक्षिण और पूर्व के मध्य का कोणीय स्थान आग्नेय कोण के नाम से जाना जाता है। नाम से ही साफ हो जाता है कि यह स्थान अग्नि देवता का प्रमुख स्थान है इसलिए रसोई या अग्नि संबंधी (इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। आग्नेय का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है-

नैऋत्य कोण (Nahrity angle)-

दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा पर निरूति या पूतना का आधिपत्य है। ज्योतिष के अनुसार राहू और केतु इस दिशा के स्वामी हैं। इस क्षेत्र का मुख्य तत्व पृथ्वी है। पृथ्वी तत्व की प्रमुखता के कारण इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे , बोरिंग , कुंए इत्यादि नहीं होने चाहिए-

वायव्य कोण (Aerial angle)-

उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य के कोणीय स्थान को वायव्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा का मुख्य तत्व वायु है। इस स्थान का प्रभाव पड़ोसियों , मित्रों और संबंधियों से अच्छे या बुरे संबंधों का कारण बनता है। वास्तु के सही उपयोग से इसे सदोपयोगी बनाया जा सकता है-

आकाश और पाताल (Sky Earth )- 

ये दिशा हमारे द्वारा कि गई आहुति का अवशोषण करता है -

उपचार और प्रयोग-

2 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यँत उपयोगी जानकारी प्रेषित करने के लिए शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अत्यँत उपयोगी जानकारी।

    उत्तर देंहटाएं