नारी की सुंदरता का वैज्ञानिक कारण - Beauty Of Female Scientific Reason

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शायद आपको पता नहीं होगा स्त्री पुरुषों से ज्यादा सुंदर क्यों दिखाई पड़ती है शायद आपको खयाल न होगा स्त्री के व्यक्तित्व में एक राउन्डनेस एक सुडौलता क्यों दिखाई पड़ती है और ये पुरुष के व्यक्तित्व में क्यों नहीं दिखाई पड़ती-




शायद आपको खयाल में न होगा कि स्त्री के व्यक्तित्व में एक संगीत-एक नृत्य-एक इनर डांस-एक भीतरी नृत्य क्यों दिखाई पड़ता है जो पुरुष में नहीं दिखाई पड़ता-

इसका एक छोटा-सा कारण है एक छोटा सा इतना छोटा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते- इतने छोटे-से कारण पर व्यक्तित्व का इतना भेद पैदा हो जाता है-

मां के पेट में जो बच्चा निर्मित होता है उसके पहले अणु में तेईस जीवाणु पुरुष के होते है और तेईस जीवाणु स्त्री के होते हैं मानव गुणसूत्रों को 1 से 22 तक की संख्या का नाम दिया गया है जबकि 23 वां गुणसूत्र जिसे  लिंग गुणसूत्र sex  chromosme कहते हैं और वो दो तरह की होती हैं X  और Y 

इस जोड़े में अगर दो X  हुए तो आप मादा होते हैं और अगर X  Y  तो आप नर का जन्म होता है  बगैर  X  के जीवन संभव नहीं है-

हर जोड़ी की एक प्रति माता से और दूसरी पिता से हमें हासिल होती है.और इसलिए शुक्राणु कोशिका(स्पर्म सेल) और अंडाणु कोशिका (Ovum) में 46 की जगह 23 गुणसूत्र ही होते हैं और इनके संगम से बने नए  जीवन में फिर से सही संख्या  हो 46 जाती है-

अगर तेईस-तेईस के दोनों जीवाणु मिलते हैं तो छियालीस जीवाणुओं का पहला सेल(कोष्ठ)निर्मित होता है। छियालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है वह स्त्री का शरीर बन जाता है। उसके दोनों बाजू 23-23 सेल के संतुलित होते हैं-

पुरुष का जो जीवाणु होता है वह पैतालीस जीवाणुओं का होता है। एक तरफ तेईस होते हैं,एक तरफ बाईस  । बस यहीं संतुलन टूट गया और वहीं से व्यक्तित्व का भी। स्त्री के दोनों पलड़े व्यक्तित्व के बाबत संतुलन के हैं। उससे सारा स्त्री का सौंदर्य,उसकी सुड़ौलता,उसकी कला,उसके व्यक्तित्व का रस,उसके व्यक्तित्व का काव्य पैदा होता है और पुरुष के व्यक्तित्व में जरा सी कमी है। क्योंकि उसका तराजू संतुलित नहीं है,तराजू का एक पलड़ा तेईस जीवाणुओं से बना है तो दूसरा बाईस का। मां से जो जीवाणु मिलता है वह तेईस का बना हुआ है और पुरुष से जो मिलता है वह बाईस का बना हुआ है-


गुणसूत्र या क्रोमोज़ोम (Chromosome) सभी वनस्पतियों व प्राणियों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले तंतु रूपी पिंड होते हैं, जो कि सभी आनुवांशिक गुणों को निर्धारित व संचारित करते हैं। प्रत्येक प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित रहती हैं। मानव कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या 46 होती है जो 23 के जोड़े में होते है। इनमे से 22 गुणसूत्र नर और मादा मे समान और अपने-अपने जोड़े के समजात होते है। इन्हें सम्मिलित रूप से समजात गुणसूत्र (Autosomes) कहते है। 23वें जोड़े के गुणसूत्र स्त्री और पुरूष में समान नही होते जिन्हे विषमजात गुणसूत्र (heterosomes) कहते है-

पुरुष की जो बेचैनी है वह एक छोटी सी घटना से शुरु होती है और वह घटना है कि उसके एक पलड़े पर एक अणु कम है। उसके व्यक्तित्व का संतुलन कम है- 

स्त्री का संतुलन पूरा है,उसकी लयबद्धता पूरी है। इतनी सी घटना इतना फरक लाती है। इससे स्त्री सुंदर तो हो सकी लेकिन विकासमान नहीं हो सकी; क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता है वह विकास नहीं करता,वह ठहर जाता है।पुरुष का व्यक्तित्व विषम है। विषम होने के कारण वह दौड़ता है,विकास करता है। एवरेस्ट चढ़ता है,पहाड़ पार करता है,चांद पर जाएगा,तारों पर जाएगा,खोजबीन करेगा,सोचेगा,ग्रंथ लिखेगा,धर्म-निर्माण करेगा। स्त्री यह कुछ भी नहीं करेगी। न वह एवरेस्ट पर जाएगी,न वह चांद-तारों पर जाएगी,न वह धर्मों की खोज करेगी,न ग्रंथ लिखेगी,न विज्ञान की शोध करेगी। वह कुछ भी नहीं करेगी-

उसके व्यक्तित्व में एक संतुलन उसे पार होने के लिए तीव्रता से नहीं भरता है। पुरुष ने सारी सभ्यता विकसित की। इस एक छोटी सी जैविक परिघटना के कारण। उसमें एक अणु कम है। स्त्री ने सारी सभ्यताएं विकसित नहीं की। उसमें एक अणु पूरा है। इतनी सी जैविक परिघटना व्यक्तित्व का भेद ला देती है-

लेकिन अब शायद स्त्री की मानसिकता में पहले से बदलाव का एक नया अध्याय शुरू हो चुका है अब स्त्री सुन्दरता की मूर्ति के साथ -साथ हर वह अदम्य साहस का भी परिचय दे रही है जो पहले विकसित नहीं थी -

उपचार और प्रयोग -

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