Fistula Treatment-फिस्टुला या #भगंदर (Fistula) का इलाज

11:58 pm 2 comments

Fistula Treatment-फिस्टुला या #भगंदर (Fistula) का इलाज


भगंदर (Fistula) एक जटिल समस्या है और इसका इलाज और इसे जड़ से समाप्त करना चिकित्सकों के लिए कड़ी चुनौती साबित होती है इस रोग में गुदा मार्ग के बाहर एक या एक से अधिक पिंडिकाएं उत्पन्न हो जाती है इससे स्राव आता रहता है-

Neem


गुदा के भीतरी भाग में वेदनायुक्त पिंडिकाओ से बनने नासूर को भगंदर कहते है नाड़ीव्रण का ही एक प्रकार है  क्योंकि गुदा के चारों ओर का भाग अधिक पोला होता है  अतः पिंडिका के पककर फूटने पर मवाद पोलो स्थान की धातुओं की तरफ चला जाता है जिसका फिर ठीक प्रकार से निर्हरण नहीं हो पाता है इसमें रोगी को अत्यंत पीड़ा होती है और वह उठने बैठने एवं चलने फिरने में भी बहुत कष्ट महसूस करता है  ठीक प्रकार से उपचार न होने पर यह नासूर बढ़कर दूसरी तरफ भी अपना मुख बना लेता है  तब इसकी स्थिति दो मुखी नली के समान हो जाती है और कभी कभी तो इसका दूसरा मुख नितंब या जांघ तक पहुंचकर खुलता है  ऐसी स्थिति में भगंदर के नासूर से रक्त, लसिका और दुर्गन्धयुक्त मल रिसता है-

क्या है भगंदर-


भगंदर रोग में व्रण बहुत गहरे हो जाते हैं कई कार व्रण के अधिक गहरे हो जाने से मल भी उनसे लगता रहता है-ऐसे में कोष्ठबद्धता(Constipation)हो जाने पर रोगी को अधिक पीड़ा होती है भगंदर से हर समय रक्तमिश्रित पीब-स्त्राव होने से कपड़े खराब होते है- रोगी को चलने-फिरने में भी बहुत कठिनाई होती है भगंदर रोग से सूक्ष्म कीटाणु भी उत्पन्न होते है-

भगंदर(fistula) से पीड़ित रोगी न बिस्तर पर पीठ के बल लेट सकता है और न कुर्सी पर बैठकर कोई काम कर सकता है तथा सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में भी रोगी को बहुत पीड़ा होती है-

शौच के बाद स्वच्छ जल से मल-द्वार के आस-पास स्वच्छ नहीं करने से भी गंदगी के कारण व्रण की विकृति होती है अधिक समय तक कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले इस रोग से अधिक पीड़ित होते है साइकिल पर लम्बी दूरी तक यात्रा करने वाले-साइकिल पर अधिक सामान ढोने वाले- ऊंट, घोड़े की अधिक सवारी करने वाले भंगदर रोग से पीड़ित होते है-

आज लोगों का खान-पान पूरी तरह पश्चिमी सभ्यता पर आधारित हो गया है लोग तेल, मिर्च, मसाला, तली, भूनी चीजें, फास्ट फूड, अनियमित भोजन का अधिक सेवन करते हैं- खाने में हरी सब्जियां, सलाद, पौष्टिक आहार का सेवन कम कर रहे हैं- व्यायाम, परिश्रम आदि से लोग दूर भाग रहे हैं जिसके कारण लोग मोटापे का शिकार हो रहे हैं- उपरोक्त निदान अनियमित आहार-विहार सेवन के कारण लोग एक जटिल बीमारी भगंदर का शिकार हो रहे हैं-

कारण -


गुदामार्ग के अस्वच्छता रहना या  लगातार लम्बे समय तक कब्ज बने रहना -अत्यधिक साइकिल या घोड़े की सवारी करना या बहुत अधिक समय तक कठोर या ठंडे गीले स्थान पर बैठना-

गुदामैथुन की प्रवृत्ति - मलद्वार पास उपस्थित कृमियों के उपद्रव के कारण - गुदा में खुजली होने पर उसे नाखून आदि से खुरच देने के कारण बने घाव के फलस्वरूप -

गुदा में आघात लगने या कट - फट जाने पर - गुदा मार्ग पर फोड़ा-फुंसी हों जाने पर - गुदा मार्ग से किसी नुकीले वस्तु के प्रवेश कराने के उपरांत बने घाव से -

आयुर्वेदानुसार जब किसी भी कारण से वात और कफ प्रकुपित हो जाता है तो इस रोग के उत्पत्ति होती है-

भगंदर को दो प्रकार माने गए है (two types of fistula )-

अपूर्ण भगंदर -

जब नासूर का केवल एक सिरा ही खुला होता है और दूसरा बंद होता है जब नासूर का मुख मलाशय पर खुलता है तो इसे अंतर्मुख भगंदर एवं मुख वाहर की त्वचा पर खुले उसे बाहिमुख भगंदर कहते है -

पूर्ण भगंदर-

जब  नासूर का दूसरा सिरा भी दूसरी तरफ जाकर खुल जाता है तो उसे पूर्ण भगंदर कहते है-

लक्षण (Symptoms )-

  1. भगंदर होने से पूर्व गुदा में छोटी छोटी फुंसिया का बार बार होना जिन्हें पिंडिकायें कहते है  कुछ समय पश्चात ये फुंसियां ठीक न होकर लाल रंग की हो जाती है और फूटकर व्रण का निर्माण करती है  गुदा प्रवेश में खुजली व पीड़ा जो कि मल त्याग के समय बढ़ जाती है-
  2. गुदा से रक्त एवं मवाद आने लगता है व्रण में बहुत तेज़ दर्द होता है जिससे रोगी को उठने बैठने, चलने फिरने में कष्ट होता है  ठीक से चिकित्सा न होने पर फुंसियां मुनक्के एवं छुआरे जितने बड़ी होकर रोगी के अत्यधिक कष्ट देती है-

  3. कमर के पास सुई चुभने जैसा दर्द, जलन, खुजली व वेदना के अनुभूती होती है  यदि भगंदर वातिक है तो तीव्र वेदना, पिंडिका के फूटने पर रक्त वर्ण का फेनयुक्त स्राव व अनेक मुख वाले वृणों से मल एवं मूत्र निकलता है-
  4. पैत्तिक भगंदर में पिंडिका शीघ्रता से पकती है और उसमे से दुर्गन्ध, ऊष्ण स्राव होने लगता है पिंडिका का आकार ऊंट की गर्दन के समान होता है-
  5. कफज भगंदर में गुदामार्ग में खुजली के साथ लगातार गाढ़ा स्राव होता है इसमें सफेद कठिन पिंडिका होती है | इस प्रकार के भगंदर में पीड़ा कम होती है-
  6. यदि अन्दर सन्निपारज प्रकृति का है तो पिंडिका का रंग विविध प्रकार होता है  इस प्रकार का भगंदर पीड़ादायक एवं स्रावयुक्त होता है  इसकी आकृति गाय के थान के समान होती है -
  7. आगंतुज भगंदर शल्यकर्म के दौरान क्षत उत्पन्न होने से बनता है  कालांतर में इससमे कृमि पड़ जाते है, जो कि गुदामार्ग के विदीर्ण करके नाड़ी में अनेक मुख बना देते है जिनसे पूय, मूत्र, पुरिष आदि का क्षरण होता है-
  8. भगंदर से बचाव के लिए गुदामार्ग को स्वच्छ रखना चाहिए- पेट में यदि कृमि हो तो उनको बाहर निकालने के लिए औषधि लेनी चाहिए, अन्यथा वे गुदामार्ग को क्षतिग्रस्त कर सकते है-
  9. आयुर्वेद में भगंदर के लिए अग्निकर्म, शस्त्रकर्म, क्षारकर्म एवं औषधि चिकित्सा का विधान है-

घरेलू उपचार (Home remedies )-

  1. 25 ग्राम अनार के ताजे, कोमल पत्ते 300 ग्राम पानी में देर तक उबालें और जब आधा जल शेष रह जाए तो उस जल को छानकर भगंदर को धोने से बहुत लाभ होता है-
  2. नीम के पत्तों को जल में उबालकर, छानकर भगंदर को दिन में दो बार अवष्य साफ करेंतथा नीम की पत्तियों को पीसकर भगंदर पर लेप करने से बहुत लाभ होता है-
  3. काली मिर्च और खदिर (लाजवंती) को जल के छींटे मारकर पीसकर भगंदर पर लेप करें-
  4. लहसुन को पीसकर, घी में भूनकर भंगदर पर बांधने से जीवाणु नष्ट होते हैं-
  5. आक के दूध में रुई भिगोकर सुखाकर रखें इस रुई को सरसों के तेल के साथ भिगोकर काजल बनाएं काजल मिट्टी के पात्र पर बनाएं तथा इस काजल को भगंदर पर लगाने से बहुत लाभ होता है या आक का दूध और हल्दी मिलाकर उसको पीसकर शुष्क होने पर बत्ती बना लें इस बत्ती को भगंदर के व्रण पर लगाने से बहुत लाभ होता है-
  6. चमेली के पत्ते, गिलोय, सोंठ और सेंधा नमक को कूट-पीसकर तक्र (मट्ठा) मिलाकर भंगदर पर लेप करें-
  7. त्रिफला क्वाथ से नियमित भगंदर के व्रण को धोकर बिल्ली अथवा कुत्ते की हड्डी के महीन चूर्ण का लेप कर देने से भगंदर ठीक हो जाता है -
  8. रोगी को किशोर गूगल, कांचनार गूगल एवं आरोग्यवर्द्धिनी वटी की दो दो गोली दिन में तीन बार गर्म पानी के साथ करने पर उत्तम लाभ होता है नियमित दो माह तक इसका प्रयोग करने से भगंदर ठीक हो जाता है -
  9. भगंदर के रोगी को भोजन के बाद विंडगारिष्ट, अभयारिस्ट एवं खादिरारिष्ट 20-20 मिली. की मात्रा में सामान जल मिलाकर सेवन करना चाहिए-

परहेज (Avoiding )-

  1. घी, तेल से बने पकवानों का सेवन न करें-उष्ण मिर्च-मसाले व अम्लीय रसों से निर्मित खाद्य पदार्थो का सेवन न करें- ऊंट, घोडे, व स्कूटर, साईकिल पर लम्बी यात्रा न करें-
  2. अधिक समय कुर्सी पर बैठकर काम न करें-दूषित जल से स्नान न करें-
  3. भंगदर रोग के चलते समलेंगिक सहवास से अलग रहे-
  4. बाजार  के चटपटे-स्वादिष्ट छोले-भठूरे-समोसे-कचौड़ी-चाट-पकौड़ी आदि का सेवन न करें-

Upcharऔर प्रयोग-

2 टिप्‍पणियां :

  1. Kya Fistula Bhagandar aur bawaseer ek hi bimari hai.

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    1. भगंदर को ही फिस्टुला कहा जाता है जबकि बवासीर अलग है

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