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5 मई 2017

दवा और पोटेन्सी क्या है

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रोगी में देखा जायें तो सिम्पटम(Symptoms)की तरह ही पोटेंसी(Potency)का प्रकरण भी बहुत गंभीर है यों तो सभी दवाइयाँ पोटेंसियो में ही कार्य करती है परन्तु कुछ सिम्पटम ऐसे भी विशिष्ठ होते है जो किसी ख़ास पोटेंसी में ही अच्छा कार्य करते है जैसे उदाहरण के रूप में मेरा निजी एक अनुभव है आइये आप इसे समझें-

दवा और पोटेन्सी क्या है

लक्षणों के अनुसार निर्देशित होने पर 'केल्केरिया कार्ब(Calcarea carb)' 200 शक्ति में देने पर वजन कम करती है तथा इसकी अन्य शक्तियां वजन बढाती है इसी प्रकार गुर्दे की पथरी में 'लायकोपोडियम(Laikopodiam)' की उच्च शक्ति का प्रयोग तभी करना चाहिए जब पथरी को बाहर निकालना हो इसलिए पोटेंसी का निर्णय करते समय यह देखना आवश्यक है कि रोग पुराना है अथवा नया मस्क्युलर या फिजिकल प्लेन पर है अथवा मेटल या वाइटल प्लेन पर-

आप शायद नहीं समझे है तो चलिए आपको एक और उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ मान लीजिये आप कुएं से पानी निकाल रहे है और यदि पानी बीस मीटर गहराई पर है तो आपको रस्सी कम से कम इक्कीस मीटर लम्बी होनी चाहिए तभी आपको पानी मिल सकेगा यदि रस्सी उन्नीस मीटर की है तो रस्सी,बाल्टी,पानी आदि सब कुछ होते हुए भी आपको पानी नहीं मिलेगा और यदि इसके विपरीत आप तीस-चालीस मीटर लम्बी रस्सी डाल दे तो पानी तो आपको मिलेगा पर आपकी बहुत सारी शक्ति और समय यों ही व्यर्थ चला जाएगा इसलिए पोटेंसी का चुनाव उपरोक्त बातो को ध्यान में रख कर ही करना चाहिए-

जीवनी शक्ति का पोटेंसी के साथ बहुत गहरा सम्बन्ध है जीवनी शक्ति दुर्बल हो पर कभी-कभी उच्च शक्ति में दी गई औषिधि प्राणों के लिए घातक भी हो सकती है-मै आपको यहाँ अपने जीवन का एक उदाहरण और देना चाहूँगा-

मेरे एक मित्र की श्वास रोग से पीड़ित पत्नी अत्यधिक बीमार थी वे उनका इलाज स्वयं ही कर रहे थे तो मैने उनसे पूछा कि क्या दवाइयां दे रहे हो तो उन्होंने बताया कि मै उन्हें सेनेगा,इपिकाक,आर्सेनिकम एल्वम आदि दे चूका हूँ इनके लक्षण कैप्सिकम से बहुत मिल रहे है इसलिए मै इन्हें इसकी हाई डोज देना चाहता हूँ मैने उनसे कहा कि इनकी जीवनी शक्ति बहुत कमजोर हो गई है इसलिए इन्हें भूल कर भी नहीं देना- दीपक की लों जहाँ मंद गति की वायु से अधिक चमकती है वही हवा के तेज झोके से बुझ भी जाती है इसे आप अवस्य ही ध्यान रक्खे-

कहावत है "जाको प्रभु दारुण दुःख देही ताकि मति पहिले हर लेहीं "-मेरी सलाह का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ और जैसे ही उन्होंने कैप्सिकम 1000 की खुराक दी और उनकी पत्नी का जीवन-दीप बुझ गया जब मै उनके यहाँ सहानुभूति दिखाने पंहुचा तो वे मुझसे लिपट कर रोने लगे और बोले मैने अपनी पत्नी की हत्या कर दी अब मै क्या कहता सिवाय इसके कि भगवान् को यही मंजूर था इसमें किसी का क्या दोष -

अब आप एक दूसरा उदाहरण देखिये मेरे एक मित्र की पत्नी को हार्ट अटैक हुआ तत्काल एलोपेथिक चिकित्सा सुविधाए मिल जाने के कारण उनके जीवन की रक्षा हो गई इसके बाद उन्होंने अपनी होम्योपैथिक चिकित्सा प्रारंभ कर दी एक दिन उनने मुझसे कहा कि मेरा ब्लड प्रेशर नापने का यन्त्र खराब हो गया है आप क्लिनिक से लौटते हुए जरा मैडम का ब्लड-प्रेशर देख लेना-मैने क्लिनिक से लौटते समय मैने उनका बी.पी. चेक किया जो लगभग ठीक था मैने उनसे पूछा आप इन्हें क्या दवाई दे रहे है-जो दवाइयाँ उन्होंने मुझे बताई उन्हें डिजीटेलिस 1000 भी थी तब मैने उनसे कहा कि डिजीटेलिस इतनी ऊँची पोटेंसी में देना उचित नहीं है तो वे बोले कि मुझे बहुत लाभ दिख रहा है-तीसरे दिन उनकी पत्नी के ह्रदय की विध्युत प्रणाली गड़बड़ा गई तथा गंभीर दशा में देहली ले जाकर पेसमेकर लगवाना पड़ा-इस बीच उन्होंने कई पुस्तको का अध्ययन किया और ग्वालियर आते ही उनने मझसे कहा कि आप ठीक कहते थे-डिजीटेलिस 12 पोटेंसी से अधिक में नहीं देना चाहिए -

जीवन में दो एक बार इस प्रक्रिया का उल्टा प्रयोग करने का भी अवसर आया अब आप एक उदाहरण और भी देखिये-नगर के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर साहब के बुजुर्ग पिताजी दमा रोग से पीड़ित थे रोग चिकित्सा द्वारा आरोग्य होने की सीमा से बाहर जा चुका था- वे कई बार जीवन की अंतिम सीमा को छू-छू कर वापिस आ जाते-घर वाले सभी असमंजस्य में -रिश्तेदार आ-आ कर चले जाते-मेरे विभाग के चीफ इंजीनियर साहब जो,उन डॉक्टर साहब के अच्छे मित्र थे,के साथ उनके घर जाना हुआ-मेरा परिचय भी एक डॉक्टर की तरह ही करवाया गया-डॉक्टर साहब व् उनकी पत्नी ने भी बड़ी डबडबाई आँखों से मुझसे कहा कि-डॉक्टर साहब ! अब पिताजी का कष्ट अब देखा नहीं जाता है क्या आपकी पैथी में कोई ऐसी दवा है जो इन्हें इस यातना से मुक्ति दिला सके-

इनकी इस बात ने मुझे असमंजस में डाल दिया हमारे चीफ इंजीनियर साहब को विश्वाश था कि ऐसी दवा जरुर जानता होऊंगा इसलिए वे भी मुझसे आग्रह करने लगे-अपने यहाँ कहावत है "जब तक सांस तब तक आस " दुसरे कोई भी चिकित्सक ये नहीं चाहेगा कि उसका मरीज जिए नहीं-कौन ऐसा चिकित्सक होगा जिसका हाथ ऐसा प्रिक्रिप्शन लिखते समय कपेंगा नहीं-यहाँ तो लगभग वही स्थिति बन जाती है जैसे कि जब कोई जज किसी को फांसी की सजा लिखता है-चीफ इंजीनियर साहब मेरे मन की उलझन को समझ गए थे परन्तु उनने फिर भी मुझे दवा बताने के लिए आग्रह किया कि कोई दवा हो तो बताओ-मैने साहस करके उनसे कहा कि इनके लिए आर्सेनिकम एल्वम 1000 ही एक ऐसी दवा है जिससे ये इस पार लौट आयेगे या उस पार जा सकते है उन्होंने अपने पेन से फ़ौरन दवा लिखी और ड्राइवर को भेज कर मंगवा ली और एक खुराक दिलवा भी दी-आधे घंटे बाद दूसरी खुराक देने की बात कह कर हम लोग चले आये-कुछ और काम निपटा कर जब बंगले पर पहुंचे तो  मैने घडी देखी और ठिठक कर वरामदे की सीढियों पर खड़ा रह गया-चीफ इंजीनियर साहब आओ सक्सेना वहां क्यों खड़े हो-मैने कहा आधा घंटा हो गया है-जैसे ही उन्होंने कमरे में प्रवेश किया,फोने की घंटी बजी डॉक्टर साहब कह रहे थे ' डॉक्टर साहब पिताजी चले गए-

रिपीटीशन(Repetition)-


औषिधि और पोटेंसी के चुनाव के बाद तीसरा महत्वपूर्ण विषय है दवा के रिपीटीशन का-जहाँ एक्यूट कंडीशन में कम पोटेंसी की दवा जल्दी-जल्दी देने से शीघ्र लाभ हो सकता है वही क्रोनिक केसेज में जल्दी-जल्दी रिपीटीशन और बार-बार दवा बदलने से शीघ्र लाभ होने की आशा नहीं करना चाहिए-जब एक से अधिक दवाये पर्याय क्रम से देना हो तो ये देखना भी आवश्यक है कि प्रत्येक दवा को कार्य करने के लिए पर्याप्त अवकाश मिल सके-सबसे अच्छा नियम तो ये है कि जब तक दवा लाभ कर रही हो तब तक अनावश्यक रूप से दवाईयों को रिपीट किया जाए-अनावश्यक रूप से बार-बार दवा को रिपीट करने में एक खतरा ये भी है कि दवा अपना प्रूविंग करना शुरू कर दे- यदि दवा का चुनाव सही हो तो नए-नए सिम्पटम भी सामने आ सकते है-ऐसे में कई बार रोग एक नया मोड़ ले सकता है-

पथ्य और परहेज(Avoiding Dietary)-


रोग होने में तो देर नहीं लगती परन्तु ठीक होने में समय लगता है-औषिधियो के अतिरिक्त कुछ खाध्य प्रदार्थ ऐसे है जो औषिधियो के कार्य में बाधा उत्पन्न कर सकते है अथवा हानि भी पंहुचा सकते है-हमारे आग्रिम लेखो में इसके बारे में विस्तार से दिया जाएगा-जिसे ध्यान में रखना चाहिए-मैने देखा है कि यदि रोगी को थूजा दिया गया है उसे कच्चे प्याज का उपयोग करने के लिए मना कर देना चाहिए-प्याज से एलियम सीपा नाम की दवा बनती है जो थूजा के विपरीत है-अन्य औषिधियो के बारे में इसी प्रकार विचार करना चाहिए -

कई छोटे-मोटे रोग तो संयमित जीवन ,उचित आहार व्यवहार,तथा परहेज बिना औषिधि के ही ठीक हो जाते है या औषिधियो के प्रभाव को बढ़ा कर शीघ्र आरोग्य प्रदान करते है-

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मेरा सम्पर्क पता-


कृपया रोगी ही फोन करे ताकि उसके लक्षण(Symptoms)को जाना जा सके केवल सिर्फ जानकारी मात्र के लिए डिस्टर्व न करे-आप यहाँ फोन कर सकते है-

KAAYAKALP

Homoeopathic Clinic & Research Centre

23,Mayur Market, Thatipur, Gwalior(M.P.)-474011

Director & Chief Physician:

Dr.Satish Saxena D.H.B.

Regd.N.o.7407 (M.P.)

Mob :  09977423220(फोन करने का समय-दिन में 12 P.M से शाम 6 P.M)(WHATSUP भी  यही नम्बर है)

Dr. Manish Saxena

Mob :- 09826392827(फोन करने का समय-सुबह 10A.M से शाम4 P.M.)(WHATSUP भी  यही नम्बर है )

Clinic-Phone- 0751-2344259 (C)

Residence Phone- 0751-2342827 (R)

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