पेशाब में रुकावट-Obstruction In Urine

पेशाब में रुकावट-Obstruction In Urine

पेशाब में रुकावट-Obstruction In Urine-

मेरे चिकित्सक जीवन का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण केस है मनुष्य के शरीर तथा मन-मस्तिष्क पर होम्योपैथिक औषिधियां(Homeopathic drugs) किस प्रकार और किस गहराई तक काम करती है उसका एक अद्रितीय उदाहरण प्रस्तुत है -

ये बात सन 1976 की है हमने अपना एक क्लिनिक मुरार(ग्वालियर) में ठंडी सड़क पर ठीक कोतवाली के सामने खोल रक्खा था सबह-शाम डॉक्टरी करता था दिन भर अपने कार्यालय के काम को निपटाता था हमारा कार्यालय मोती-महल के पिछले हिस्से में था- सामने चौक था  जहाँ से उपर की मंजिल पर लगने वाले एकाउंटेंट जरनल के कार्यालय के लिए रास्ता जाता था - ए.जी.आफिस में ही एक आडिटर थे शर्मा जी जो कि हमारे यहाँ इलाज कराने आते थे -

एक दिन जब शर्मा जी मिले तो उनके साथ उनके एकाउन्ट्स आफिसर श्री मिश्रा जी भी थे -शर्मा जी ने मेरा परिचय मिश्रा जी से कराया - मैने देखा कि मिश्रा जी एक एयरबैग बगल में दबाये हुए है आखिर कौतुहलवश हमने उनसे पूछ ही लिया कि कही से आप आ रहे है? -वे बोले नहीं - फिर कही जा रहे है? -वे बोले नहीं -फिर ये एयरबैग किस लिए?

तब उन्होंने बताया कि ये बड़े दुःख -दर्द की कहानी है -मैने पूछा कि वह क्या है?वे बोले मुझे पेशाब नहीं होती है सभी प्रकार की जांचे और इलाज करा लिए लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ-जांच के लिए मद्रास के अपोलो अस्पताल में एक महीने भर्ती रहा किन्तु कुछ भी परिणाम नहीं निकला-न प्रोस्टेट बढ़ा हुआ है नही किसी नली में सुकड़ाव आदि है-डॉक्टर हर नारायण दुबे जी से भी होम्योपैथिक इलाज करवाया - डॉक्टर दुबे  एम्.बी.बी.एस. तथा मिलिट्री  सर्विसेज से रिटायर्ड डॉक्टर और उस समय ग्वालियर के सिविल सर्जन थे - वे होम्योपैथी के बहुत प्रसिद्ध चिकित्सक भी थे -उनके पास देश-विदेश में छपी दुर्लभ पुस्तको का बहुत बड़ा संग्रह था - उनकी दवाईयों से तो कोई लाभ नहीं हुआ पर उन्होंने मुझे बताया कि तुम सिर के बल खड़े होकर पेशाब किया करो- इससे पेशाब तो हो जाती है पर कई बार कपडे खराब हो जाते है इस लिए कपडे लेकर चलना पड़ता है-स्वीपर को अलग से पैसे देकर बाथरूम की सफाई करवाता हूँ- इसी कारण कही आ जा नहीं सकता हूँ न लम्बा सफर कर सकता हूँ - हर तरफ से निराश हो चुका हूँ कि क्या करूँ - अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया 'आप , मेरे पास आ जाना ,मै आपको ठीक कर दूंगा '-

अगले दिन रविवार था -सुबह क्लिनिक खोलते-खोलते ही मिश्रा जी आ खड़े हुए - बोले लो जी मै आ गया हूँ अब आप मुझे ठीक कर दीजिये ?

अब तो मेरे चौकने की बारी थी - यों तो मै यह कभी भी किसी से भी नहीं कहता हूँ कि मै ठीक कर दूंगा पर उस दिन का कहना मुझे भारी पड़ गया - डा0 हैनीमन साहब ने भी कहा है "मै इलाज करता हूँ ,वह ठीक करता है " यही पूर्ण सत्य भी है - लेकिन अब हो भी क्या सकता था -मन ही मन भगवान् से प्रार्थना की कि "प्रभु ! गलती हो गई क्षमा करो,"-इस बार तो मेरी इज्जत रख लो ,आगे से मेरी तोबा-

इसके पश्चात कुछ संयत होकर विचार करना शुरू किया जांचो में कही कोई रुकावट नहीं पाई गई है-दूसरे होम्योपैथी सहित सभी प्रकार की चिकित्सा हो चुकी है तथा पेशाब सम्बन्धी सभी दवाइयाँ भारी मात्रा में पाहिले ही दी जा चुकी है -जहाँ तक सिर के बल खड़े होकर पेशाब करने का सवाल है सोचा कि भगवान् ने उन इन्द्रियों को येसी जगह बनाया है कि उनकी उंचाई में किसी भी स्थिति में कोई अंतर नहीं आता -गंभीरतापूर्वक सोचने पर एक ही संभावना नजर आई कि हो न हो रिफ्लेक्सेज के पलटने के कारण हो सकता है -

फिर ध्यान में मेडिसिन आई 'इग्निशीया' - यह एक ऐसी दवा है जिसमे सामान्य से उल्टा प्रभाव पाया जाता है जैसे किसी से कहा आइये ,बैठिये , सामने वाला कहता है ,नहीं मै तो जा रहा हूँ - पूँछा चाय पियोगे ? सामने वाला कहता है ,नहीं मुझे नहीं पीना - यदि आपने नहीं पूँछा तो कहेगा,क्या बात है ,आज नाराज हो क्या,चाय तक को भी नहीं पूंछ रहे हो - वैसे भी मै गणित का विध्यार्थी रहा हूँ - गणित में दो ऋणात्मक संख्याये मिलने पर वे धनात्मक हो जाती है - सोचा कि यदि यह सही है तो उल्टे का उल्टा सीधा हो जाना चाहिए - भगवान् का नाम लेकर इग्निशीया 1000 की दो ख़ुराके और कुछ प्लेन गोलियां देकर अगले सप्ताह मिलने के लिए कह दिया -

अगले दिन क्लिनिक खोलने के पहले ही मिश्रा जी खड़े थे - सोचा आज तो दिन बेकार जाने वाला है अब ये कहेगे कि मुझे कोई फायदा नहीं है -सुबह-सुबह ही आशंका मन में आने लगी - लेकिन मिश्रा जी तो बहुत खुश थे -बोले- डॉक्टर साहब,आज तो मै जैसे ही लेट्रिन के लिए बैठा वैसे ही मुझे खुलकर पेशाब हो गई-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद - मैने कहा अभी तो आपके पास छ: दिन की दवा और है उसे तो ले लीजिये फिर बताना- कहना न होगा इसके बाद तो उन्हें दवा की आवश्यकता ही नहीं हुई -

यदि यहाँ  केवल शरीरिक लक्षणों को ले कर बात समाप्त कर दी जाए तो बात अधूरी ही रहेगी- हुआ यों कि इंजीनियर-इन-चीफ,लोक निर्माण विभाग कार्यालय ,भोपाल में मेरे एक मित्र कार्यरत थे जिन्हें मै अपने बड़े भाई की तरह सम्मान देता था-उनका पत्र मेरे पास आया जिसमे उन्होंने लिखा था कि मैने सुपीरियर क्लर्कशिप की परीक्षा दी है-उसमे मेरा एक पेपर खराब हो गया है- उसकी कापी ग्वालियर के एक एकाउन्ट्स आफिसर मिश्रा साहब के पास गई है- मिश्रा साहब एक बहुत ही ईमानदार और सख्त अधिकारी है- यदि कोई उनसे सिफारिस आदि करता है तो वे पास को भी फेल कर देते है- इसलिए यदि तुम्हारे पास कोई अच्छा सा सोर्स हो तो ही कोशिश करना- यह मेरा तीसरा और आखिरी चांस है - यदि इसमें पास नहीं हुआ तो मै कभी भी सुपरिंटेडेन्ट नहीं बन सकूंगा -

मन में सोचा क्या किया जाए-वैसे तो मुझसे अच्छा कोई सोर्स हो ही नहीं सकता था - वैसे भी यदि फेल को कोई फेल कर भी देता है तो हानि क्या होगी- फिर एक बात और मन में आई कि देखा जाय कि "इग्निशिया" से मिश्रा जी के मानसिक लक्षणों में क्या परिवर्तन आया-अत: मैने मिश्रा जी के घर जाना ही उचित समझा -दूसरे दिन सुबह मै उनके घर जा पंहुचा -

मुझे अपने घर आया देख कर मिश्रा जी बहुत प्रसन्न हो गए- कभी ठंडा तो कभी गरम तो कभी कुछ मेरे स्वागत में रखते- इतना तो वे समझ ही गए कि डॉक्टर साहब के किसी केन्डीडेट की कापी शायद आई है-चाय नाश्ते के बाद हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बोले-मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताइये-मैने औपचारिकता का ध्यान रखते हुए कहा कि आप कहते रहते है कि मै आता नहीं हूँ ,आज मै इधर से निकल रहा था सोचा आप से मिलता चलूँ - वे बोले आपने मुझ पर बड़ी कृपा की किन्तु मै जानता हूँ कि आपको मरने की फुरसत नहीं होती है इसलिए यदि मेरे लायक कोई सेवा हो तो निसंकोच कहिये-मैने उनसे कहा कि आप एक सिंद्धांत वाले आदमी है और मै भी एक सिंद्धांत वाला आदमी हूँ और एक सिद्धांतवाला आदमी किसी दूसरे सिद्धांतवाले आदमी का सिद्धांत नहीं तुड़वाता है-उन्होंने मुझे बड़ा प्यारा सा उत्तर दिया-सिद्धान्त तो जिन्दगी से लगे है और आपने मुझे एक नई जिन्दगी दी है -यदि कोई सेवा हो तो नि:संकोच बता दीजिये- मैने वह पत्र जेब से निकालकर उनके हाथ में दे दिया - वे पढ़ते जाएँ और मुस्कराते जायं क्युकि उसमे उनकी ईमानदारी और चरित्र की प्रसंशा भी थी-उन्होंने उसमे से रोल नम्बर नोट कर लिया-फिर बोले एक कापी ग्वालियर में और आई है ,मै उसको भी भी देख लूँगा -

वे दूसरे परीक्षक के पास भी गए और रोल नम्बर देते हुए उससे निवेदन किया कि आप इसे अवस्य देख लीजिये अब उस परीक्षक के चौंकने की बारी थी- उसे अपार आश्चर्य हुआ कि जिस व्यक्ति ने कभी किसी की सिफारिश न मानी हो वह आज किसी दूसरे के लिए हाथ जोड़ रहा है -उन्होंने यही कहा कि मिश्रा जी यह व्यक्ति तो समझो पास हो गया- यदि इसने कुछ भी नहीं लिखा होगा तो मै अपने हाथ से लिख कर इसे पास कर दूंगा पर मुझे यह बताइये कि यह भाग्यशाली व्यक्ति है कौन ? उन्होंने कहा कि मै इसे नहीं जानता -यह हमारे डॉक्टर साहब का केन्डीडेट है ,इसलिए मै आपसे फिर निवेदन कर रहा हूँ -

रिजल्ट आने के बाद भोपाल से मेरे पास भाई साहब का फोन आया -बोले भईया मै पास हो गया आपको बधाई -मैने कहा भाई साहब आप ये कौन सी भाषा बोल रहे है ,पास आप हुए है -आपको बहुत-बहुत बधाई - वे बोले मै तो केवल कागज में पास हुआ हूँ- वास्तव में पास तो तुम हुए हो जिसने असम्भव को संभव करके बता दिया - मैने उनसे कहा कि पास तो मै भी नहीं हुआ हूँ , पास तो होम्योपैथी हुई है इसलिए होम्योपैथी को बधाई !!

आप हमारी सभी पोस्ट होम्योपैथी के केस की एक साथ इस लिंक पे जाके देख सकते है -

लिंक- Disease-Homeopathy

  • मेरा पता-
  • KAAYAKALP
  • Homoeopathic Clinic & Research Centre
  • 23,Mayur Market, Thatipur, Gwalior(M.P.)-474011
  • Director & Chief Physician:

  • Dr.Satish Saxena D.H.B.
  • Regd.N.o.7407 (M.P.)
  • Ph :    0751-2344259 (C) 0751-2342827 (R)
  • Mo:    09977423220
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