श्वासनली का जहरीला फोड़ा-Vertebrate Trachea Poisonous Boil

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श्वासनली का जहरीला फोड़ा-Vertebrate Trachea Poisonous Boil

श्वासनली का जहरीला फोड़ा-Vertebrate Trachea Poisonous Boil

डबरा(ग्वालियर) में एक होम्योपैथ एक डॉक्टर चतुर्वेदी जी थे मुझे समय मिलने पर कभी-कभी उनके पास बैठ जाया करता था -एक बार उन्होंने मुझ से कहा कि सालवई ग्राम में एक केस देखने जाना है लेकिन साइकिल से दस किलोमीटर जाना और आना पड़ेगा यो भी उस समय दस बीस किलोमीटर साइकिल तो मुझे रोज चलानी ही पड़ती थी क्युकि सब-इंजीनियर की नौकरी ही येसी है दूसरे अगले दिन रविवार भी था इसलिए मै चलने के लिए तैयार हो गया-

सर्दियों के दिन थे फिर भी हम सुबह-सुबह हम वहां जा पहुंचे -रोगी संम्पन्न घर का,शादी-शुदा,अपने माँ-बाप का इकलौता 18-20 वर्ष का युवक था-उसके गले में श्वासनली में एक जहरीला फोड़ा था जिसका मुंह श्वासनली के भीतर ही खुलता था किन्तु लाली,सूजन,गर्मी तथा आकार देख कर समझा जा सकता था कि वह काफी बड़ा भी था -उसका मुख्य लक्षण नींद का था -गहरी नींद आते ही वह घबड़ाकर जाग जाता था -उसे येसा लगता था जैसे कोई उसका गला दबा रहा है और साथ ही छाती पर भारी वजन मालुम होता था -बेचैनी ,गर्म पसीना,गले में दर्द और निगलने में भी बहुत कष्ट था जिसके कारण रोगी कुछ खा-पी भी नहीं पा रहा था -

उस समय डबरा में तो क्या ग्वालियर में भी गले के आपरेशन की सुविधा नहीं थी अत:इसके लिए उसे दिल्ली ले जाने की सलाह दी गई थी -डॉक्टर साहब तो केस देख कर घबडा गए और मुझ से अंग्रेजी में बोले कि यह केस बचने वाला नहीं है क्युकि जैसे ही फोड़ा फूटेगा मवाद सीधा फेफड़ों में जाएगा और मरीज की मृत्यु हो जायेगी -इसलिए मै ये केस नहीं ले सकता-सच भी है प्राइवेट प्रेक्टिस में रोगी की मृत्यु बदनामी का बहुत बड़ा कारण होता है जिससे सभी डॉक्टर बचना चाहते है -लक्षणों के अनुसार होम्योपैथी में यह केस "लेकेसिस" का था  यह मेरी समझ में भली भाँती आ गया था -

मैने डॉक्टर साहब से कहा कि हम दस किलोमीटर साइकिल चला कर आये है और अभी इतनी ही दूर जाना है बिना दवा दिए वापिस जाना मुझे ठीक नहीं लग रहा है -उन्होंने मुझसे कहा तुम अपनी जिम्मेदारी पर दवा देना चाहो तो दे सकते हो मै तो इस केस में हाथ नहीं डालूँगा -मैने उनकी दवाईयों की पेटी देखी तो उसमे मुझे 'लेकेसिस' केवल 200 पोटेन्सी में मिली -मैने एक कांच के गिलास में लगभग 100 मि.ली. पानी में 10-12 गोलियां घोलकर उन्हें दे दी और कहा इसमें से 2-2 चम्मच पानी इसे दो-दो घंटे से पिलाते रहना -

मैने उन्हें यह भी बता दिया कि यह सोयेगा -बहुत दिनों से इसकी नींद नहीं लगी है ,यह जितना भी सोये सोने देना ,घबराना नहीं-दवा देने के लिए भी इसे जगाना नहीं,जब भी नींद खुले तभी देना -इसे भूंख लगेगी-खाने को मांगे तो शुद्ध घी का पतला सा गुनगुना हलुआ इसे खिला देना -फोड़ा फूट जाए तो सादे पानी से इसको कुल्ला कराते रहना और कल सुबह डॉक्टर साहब को सारा हाल बताना-यह सब बताने के बाद हम वापस आ गए -

हम लोगो के आने के बाद जैसे ही उन्होंने दो खुराक दी होगी कि उसे नींद आ गई और वह सो गया-उन्होंने खाट धूप में से उठाकर छाया में डाल दी -शाम होने को हुई तो कुछ ठंडक होने लगी तो खाट भीतर डाल दी -सोते-सोते उसे लगभग दस घंटे हो गए तो घरवालो के मन में चिन्ता होने-बार-बार उसकी नब्ज टटोलते-फिर भी उन्होंने उसे जगाया नहीं -रात को करीब 9 बजे वह उठ कर बैठ गया और अपनी माँ से बोला अम्मा बहुत भूंख लगी है ,कुछ खाने को दो -माँ की आँखों में आंसूं आ गए-बहुत दिनों के बाद आज उसके बेटे ने खाने को माँगा था-उसकी पत्नी ने जल्दी से पाहिले एक गिलास हल्का  गुनगुना दूध दे दिया-जल्दी-जल्दी हलुआ बनाकर उसे खिलाया-खाते-खाते वह फिर सो गया-

रात को 2 बजे के करीब उसको बहुत जोर की खांसी उठी-फोड़ा फूट गया और खांसी के द्वारा सात मवाद बाहर निकल गया -अब उसने रट लगाना चालू कर दिया कि मै बच गया,मुझे इसी समय डॉक्टर के पास ले चलो-बार-बार यही कहता मुझे जल्दी ले चलो ,जल्दी ले चलो-सर्दी की रात,जंगल का रास्ता और फिर डाकुओ का भय- जैसे-तैसे 4 बजते-बजते गाडी आ गई और सुबह होते-होते डॉक्टर साहब की दूकान पर पंहुच गए-पाहिले तो डॉक्टर साहब बहुत घबडाए पर जब पता चला कि मरीज ठीक-ठाक है तो वे उसे देखने के लिए कहने लगे-मरीज के पिता ने कहा हमे आपको नहीं आपके साथ जो डॉक्टर गए थे उन्हें दिखाना है -हम गाँव के आदमी है जरुर पर आपने तो अंग्रेजी में कह दिया था कि मरीज बचेगा नहीं- हम तो उन्ही डॉक्टर को दिखायेगे जिन्होंने दवा दी थी-उन्होंने कहा वे डॉक्टर थोड़े ही है वे तो मेरा बैग उठाकर मेरे पीछे-पीछे चलते है-वे तो डलिया डलवाने वाले ओवरसियर है-उन्होंने कहा वे जो भी हो हमारे लिए परमात्मा है-

अब हम उनको ढूढ लेगे क्युकि डबरा में कोई दस-बीस ओवरसियर तो है नहीं-मरीज हाथ से जाते देख उन्होंने मुझे बुलवाया -पाहिले तो मुझे भी डर लगा-सोचा डॉक्टर साहब डांटेगे-कहेगे बड़े डॉक्टर बनने चले थे,मैने तुम से मना किया था -जब मै वहां पंहुचा तो द्रश्य कुछ और ही था-मरीज के सारे घरवाले मेरे पेरो में गिर पड़े -मैने कहा आप लोग डॉक्टर साहब के पैर पड़िए मेरे नहीं-वे बोले डॉक्टर साहब हम तो क्या हमारी आने वाली पीढियां भी आपका एहसान मानेगी-आपने हमें निरवंश होने से बचा लिया है-इस केस के बाद इतना अवस्य हुआ है कि तबसे हमने डॉक्टर साहब की दी हुई उपाधि को स्वीकार कर अपना नाम "डालियाँ डालानेवाला डॉक्टर" रख लिया है जो मुझे किसी पदमश्री से अधिक प्रिय है-

आप हमारी सभी पोस्ट होम्योपैथी के केस की एक साथ इस लिंक पे जाके देख सकते है -

लिंक- Disease-Homeopathy
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