This website about Treatment and use for General Problems and Beauty Tips ,Sexual Related Problems and his solution for Male and Females. Home treatment,Ayurveda treatment ,Homeopathic Remedies. Ayurveda treatment tips in Hindi and also you can read about health Related problems and treatment for male and female

loading...

25 मार्च 2017

क्या हम आज भी उल्लू है

By
                  "हर डाल पे उल्लू बैठा हो तो अंजामे गुलिस्ता क्या होगा"

जिसने भी कहा यथार्थ सत्य ही कहा है हमारा देश जिसे कभी सोने की चिड़ियाँ कहा जाता था लोगों की बुरी नजर लग गई है पहले मुगलों ने लुटा फिर अंग्रेजो ने लुटा और जब थोडा बहुत बच गया था तो फिर इन राजनीति करने वालों उल्लुओं ने लूटा ये आखिर क्यों हुआ जिसका जवाब हमें ही अपने दिल पे हाथ रख कर पूछना होगा आज कल तो हर गाँव में शहर में चौक और गलियारों में राजनीति(Politics)के इन उल्लुओं(Owls)का ही गुणगान होता दिखता है कारण ये है कि हम सब उल्लू राजनीति के उल्लुओं(Owls)का गुणगान में लगे है-

क्या हम आज भी उल्लू है

आज हमारा संविधान(Constitution)भी इन्ही उल्लुओं(Owls)की जेब में है आम आदमी का भी कसूर है जो पहले इन्हें वोट देकर जिताता है फिर खुद-ब-खुद उल्लू(owl) बन जाता है जब जनमत(Public opinion)हम ही इन उल्लुओं को देते है तो कसूर किस उल्लू का है-
सत्ता के लोलुप की जेब में जब जनमत(Public opinion)आ जाता है तो हमारा संविधान(Constitution)भी इनकी जेब में होता है और हम सिर्फ एक उल्लू बन खुद को सविंधान से आशा करते है कि हमें इंशाफ मिलेगा-

परिणाम आज से वर्षो पहले भी यही था जब हमारे यहाँ राजे-रजवाड़े हुआ करते थे वो तो बस एशो-आराम-नाच गाने और झूठी शान में ही अपना समय गवां देते थे और लोग व्यापार और पनाह के नाम पर अपने हाथ-पाँव फैला कर हमें ही गुलाम बना लेते थे और प्रजा सिर्फ उल्लुओं(Owls)की भाँती अपने राजा को देखता रह जाता था और विवश हो जाता था उल्लुओं की तरह जीने में-

आज भी हम नए युग के उल्लुओं के गुलाम है एक सुप्रीमो या हाईकमान अपना ही वर्चस्व(Domination)रखना चाहता है और उसके नीचे तमाम उल्लू उसकी आज्ञा मानने को विवश है क्युकि हमारे संस्कार ही हो गए है उल्लुओं की तरह जीने के -

आज से पहले जो बलिदान हुए शहीद थे उनकी आत्मा भी कही न कही से हम सभी उल्लुओं को देख कर धिक्कारती ही होगी और ये सोचती होगी कि काश क्या इसी लिए आजादी की जंग लड़ी थी जो आज भी ये गुलाम होकर जीने को विवश है वैसे भी देशभक्तों को इन उल्लुओं(Owls)ने हमेशा उल्लू माना जो कि राष्ट्राभिमान के कारण अंग्रेज सरकार के आगे टेढ़े हो जाने के कारण अपना उल्लू सीधा नहीं कर सके-हमारे शहीद दर-दर जान लेकर भटकते रहे और वंदेमातरम कहकर फांसी के फंदों पर लटकते रहे और जो आजादी के बाद बचे रहे गए-तो वे सपरिवार अपमान और उपेक्षा का जहर गटकते रहे है जबकि अंग्रेजियत से ओत-प्रोत कुछ उल्लू भी समझदार निकले उनको पता था बलिदान देकर क्या मिलेगा सत्ता का सुख तो कोई और लेगा इसलिए उन्होंने अपनी समझदारी से अपना उल्लू सीधा किया-

खुद-ब-खुद जो आदमी उल्लू बना रहना चाहता है उसका तो भगवान् भी कुछ नहीं कर सकते है इसमें भी दो तरह के लोग पाए जाते है एक जो दूसरों को उल्लू बनाती है और दूसरी वो है जो खुद ही उल्लू बनती है

एक विशेष वर्ग जो पहले से ही उल्लू है उसे तो दूसरा कोई भला कैसे उल्लू बना सकता है जब आजादी मिली तो अपने घोसले से चालाक उल्लू बाहर आये चूँकि अब वातावरण उनके अनुकूल हो चुका था तो घोंसले के चालाक उल्लुओं से खुद के पूर्वजों की ख्याति के गुणगान गाने शुरू किये उनके नाम पे जगह-जगह पत्थर से लेकर चिकित्सालय और विध्यालय से लेकर कई तरह की इमारतों पे भी पूर्वज उल्लुओं का नामकरण किया जाने लगा ताकि आने वाले वर्षो में नए जन्मे उल्लुओं(Owls)को सिर्फ यही लगे कि अगर कुछ किया है तो सिर्फ एक विशेष समुदाय वर्ग के उल्लुओं ने ही देश के लिए कुछ किया है -बाकी तो सब निम्नकोटि के उल्लू ही थे -

अमर शहीदों के बलिदानों को इनके दिव्य और भव्य कारनामों के आगे ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे सूरज के आगे सिगरेट लाइटर और फिर शुरू हुआ एक महत्वपूर्ण कार्य और वो कार्य था दूसरे लोगो को उल्लू बनाओ और अपनी सत्ता की लोलुपता को-जांत-पांत-अमीरी-गरीबी में बाँट कर रक्खो -

भविष्य का नया अध्याय शुरू हो चुका था आदर्श और बलिदान खो चुका था बस भ्रष्टाचार के ही उल्लू बोल रहे थे अपने उल्लेखनीय उल्लुत्व के साथ- भारतीय जनमानस में विराट उल्लाप करते हुए ये अपना समुदाय बढ़ाने के लिए उल्लू चहुं ओर सक्रिय हो गए थे-देश के अलग-अलग राज्यों से महान उल्लुओं को ढूढू-कर मन्त्र-दीक्षा दी गई अपना समुदाय डेवलप करो और राज करो बस हम आपके राजा है इसलिए आप बस हमारा समर्थन करते रहे आप मजे ले और हमे भी लेने दे

अब क्या था-काठ के उल्लुओं(Owls)के कंधे पे अपना समुदाय बढाने का भार आ गया था और फिर शुरू हुआ तेजी से उल्लू बनाने का कार्यक्रम जो आज तक विद्यमान है बस सभी अपने-अपने स्वार्थवश एक दूसरे को उल्लू बनाए जा रहे है ये सिलसिला चल रहा है और अनवरत प्रगतिशील है -

भ्रष्टाचार कैसे बढे और उल्लू-संस्कृति का वर्चस्व बढे-इसके लिए तरह-तरह के प्रयोग किये जाने लगे बहुत कुछ परिवर्तन किये गए ताकि गरीब -गरीबी के स्तर से उपर न आये-जाति-बिभाजन तेजी से प्रखर हुआ ताकि कहीं फिर से कोई एकता का बिगुल न बजा सके-समुदायों में बंटवारा हुआ-देश का बंटवारा तो पहले भी हुआ आज भी कुछ उल्लू इसी फिराक में लगे है -

'तमसोमाज्योतिर्गमय' को पलटकर 'ज्योतिर्मातमासोगमय' कर दिया गया-यानी कि उजाले से अंधेरे की ओर-उल्लुओं को उजाला पसंद नहीं होता है वे हमेशा अन्धकार को ही पसंद करते है और अगर कोई एक उजाले की तरफ ले जाने के लिए हंस रूपी मानव आ जाए तो फिर पेट में दर्द होना तो इन उल्लुओं को स्वाभाविक है -

आप सभी जानते ही है उल्लू लक्ष्मी का वाहन है इसलिए उल्लू शब्द बुरा नहीं-लक्ष्मी माता की सवारी को भला आप हेय द्रष्टि से कैसे देख सकते है आपको ये भी पता होगा तंत्र में भी उल्लू का बहुत महत्व है लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी लोग उल्लू तंत्र साधना में लगे रहते है वही हाल प्रजातंत्र में है आपको शोहरत और धन पाना है तो राजनीति के उल्लुओं को सिद्ध किये कुछ नहीं मिलेगा यदि ये नहीं कर पाए तो फिर रह जायेगे सिर्फ-

      'काठ के उल्लू '

जिसे सिर्फ शो केस में ही सजाया जा सकता है-

ये लेख एक कटुब्यंग है- 

Upcharऔर प्रयोग-

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें