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15 जून 2016

जो व्यक्ति गिरता है वही सफल होता है

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कहावत सच है कि इन्शान अगर मन में ठान ही ले तो फिर वो क्या नहीं कर सकता है इसका मेरे जीवन में सिर्फ एक ही उदाहरण से परिवर्तन हुआ है एक बार खाली बैठा था और कुछ सोच रहा था तभी मेरी नजर मेरे किचन में पड़े हुए पके चावल के टुकड़े पर गई एक चींटी उस चावल को मुंह में दबा कर ले जाने का प्रयास बार-बार करती रही लेकिन चावल का वजन चींटी के वजन से शायद भारी था इसलिए असफल हो रही थी लेकिन वह अपना प्रयास छोड़ने को भी कतई भी राजी नहीं थी और तब तक एक दूसरी चींटी  भी आ गई और एक आगे और एक पीछे मिल कर प्रयास करने लगी और फिर सफल हो गई उस चावल को अपने बिल तक ले जाने में-

जो व्यक्ति गिरता है वही सफल होता है


बस यही देख कर हमें एक सीख मिली कि जीवन में प्रयास कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए जो प्रयास करता रहता है भले ही असफल होता रहे लेकिन एक दिन वही सफल हो जाता है यही जीवन की सफलता का राज है उपरोक्त उदाहरण में दो चीज है एक है निरंतर प्रयास और दूसरी बात है सहयोग-अगर एकता से काम सहयोगात्मक रूप से किया जाए तो कार्य आसान हो जाता है-लेकिन आजकल लोग अपने दुःख से नहीं बल्कि दूसरों की ख़ुशी से दुखी है-इसलिए सहयोग कि भावना कुछ वर्षो बाद सिर्फ इतिहास में ही पढने को मिलेगी आज मनुष्य स्वयं-स्वार्थ सिद्ध के बारे में सोचता है-

हमने जब ये ब्लॉग लिखना शुरू किया था मुसकिल से 20-25 लोग ही पढ़ते थे दो माह लिखते हो गए थे लेकिन मुझे असफल ही कहा जाएगा तब एक बार तो मेरे मन में भी आया कि छोडो क्यों लोगो को ज्ञान-और जानकारी से अवगत कराये अपना समय खराब करो पोस्ट लिखो-और चंद लोग देख कर निकल जाते है ये बात अक्तूबर 2014 की है लेकिन मन को ये समझा कर लिखता रहा कोई पढ़ेगा नहीं तब भी ये मेरा कलेक्शन तो रहेगा ही और एक तरफ अंतर-मन ये कहता था- करते रहो-कभी-न-कभी तो सफल होगा ही-मेरा मकसद सिर्फ ऋषि-मुनियों की परम्परा को जीवंत रखने का था और आज की दवाईयों के साइड-इफेक्ट से बचा कर घरेलू दवा से छोटी-छोटी चीजो से इलाज से अवगत कराना था -

वैसे ये काम हमारा पुरातन और वंशावली का था-मगर हमने देखा है कि दो जून की रोटी भी चलना भारी होता था-हमारे बुजुर्ग लोगों की सेवा में अपना भी धन खर्च करते थे और फ्री की लेने वालों का तांता खत्म होने का नाम नहीं लेता था-बस धन के नाम पर आता कुछ नहीं था-हाँ-दुआए अवश्य मिलती थी-लेकिन दुआओं से घर तो नहीं चल सकता था-

इसलिए हमने जब औषिधियों को बनाने का काम शुरू किया तो पहली बात औषिधियों का संकलन करना-ढूढ़ कर या खरीद का इकट्ठा करना-फिर उनको कूट-पीस कर तैयार करना और जब किसी को उसकी कीमत बताया जाता तो मुझे इस तरह शक की निगाहों से देखता था जैसे हम उसके कपडे उतार रहे है-जबकि एलोपैथी में इसका उल्टा है डॉक्टर ने घसीटी भाषा का प्रयोग करके दवा लिखी परचा आपको थमा दिया और बिना तर्क-कुतर्क के आपने उसकी फीस दी और मेडिकल से दवा लाये- मेडिकल से भी कमीशन डॉक्टर को आना तय सा है अब ये बिजनेस पूरी इमानदारी से एग्रीमेंट पे चल रहा है-

मुख्य कारण है डॉक्टर की पढाई में धन अधिक खर्च होना और आपको अपनी फ़ीस एक-दो हजार बता के ले नहीं पाता है सौ या दो सौ आप से फीस के लिए ले सकता है वर्ना आप कही और चले जायेगें तो जादा इनकम हो तो मेडिकल स्टोर से भी डॉक्टर को आपकी दवा का कमीशन आता है और अगर जाँच आदि लिख दी-तो पैथालाजी से भी हिस्सेदारी आ जाती है -तब जा के उसका घर का मेंटिनेंस चलता है-

इसलिए जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक था हम इसे सिर्फ सलाह के रूप में लोगों को बताये और अपने जीविकोपार्जन के लिए कोई और संसाधन को अपनाए-

अंत में हमने इसे सिर्फ लोगों में ज्ञान रूप से ही प्रवाहित करने का संकल्प लिया है न हम कोई दवा का निर्माण करते है न ही किसी प्रकार के धन की लालसा है हम जहाँ कार्य करते है प्रतिष्ठित जगह है और उच्च-पद पर हूँ इसलिए इतना मिलता है कि ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ -

लेकिन आज मुझे कहने में कोई संकोच नहीं होता है कि ये ब्लॉग आज आपके सहयोग और प्यार से काफी सफल है अब तक इसके व्यूवर की संख्या नब्बे लाख (900000)तक पहुच गई है और प्रतिदिन अभी 20000(बीस हजार)लोग ब्लॉग को पढ़ रहे है आप सभी का आभारी हूँ दिल से-अपना प्यार देते रहे-और हमें हौसला प्रदान करते रहे-

Upcharऔर प्रयोग-

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