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सुवर्णप्राशन संस्कार क्या है और कैसे किया जाता है

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)बच्चों में किया जाने वाला सोलह संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है इसे स्वर्ण-बिंदु-प्राशन भी कहा जाता है सुवर्ण यानि की सोना चटाना ही इसका मूल उद्देश्य है कुछ सुवर्ण के साथ आयुर्वेदिक औषिधि गाय का घी और शहद के मिश्रण को तैयार करके पिलाया जाता है जिस प्रकार रोग-प्रतिकार की शक्ति बढाने के लिए वैक्सीन का प्रयोग किया जाता है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद में सुवर्णप्राशन का विधान है-

सुवर्णप्राशन संस्कार क्या है और कैसे किया जाता है

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)कैसे किया जाता है-


नियम है जन्म से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक बच्चों में सुवर्णप्राशन किया जाता है बच्चों में बुधि का विकास पांच वर्ष की आयु तक हो जाता है इसलिए बचपन से ही बालक का सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn) किया जाता है -

इसका उचित समय सूर्योदय से पहले खाली पेट ही करना उचित है शुरू में एक महीने से तीन माह तक रोजाना कराये और इसके उपरान्त प्रत्येक माह के पुष्य नक्षत्र के दिन ही एक बार अवश्य कराये-पुष्य नक्षत्र हर माह सताईसवें दिन आता है जादा जानकारी आप पंचांग से प्राप्त कर सकते है -

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)में प्रयोग किया जाने वाला मूल शहद है इसे फ्रिज आदि में न रक्खे न ही गर्म तापमान पर रक्खे इसका ख्याल रखना आवश्यक है सुवर्णप्राशन के बाद एवं पहले आधा घंटा कुछ भी खाने को न दे-

यदि किसी कारण से बालक बीमार है तो उस समय सुवर्णप्राशन न कराये-सुवर्णप्राशन के अंतर्गत सुवर्णभस्म , बच, ब्रम्ही, शंखपुष्पी, आमला, यष्टिमधु , गुडूची, बेहडा, शहद और गाय का घी इस्तेमाल होता है -

मात्रा-

1- जन्म से लेकर दो माह तक पुष्य नक्षत्र को दो बूंद तथा वैसे रोजाना एक बूंद ही पर्याप्त है -

2- दो माह से छ:माह तक पुष्य नक्षत्र को तीन बूंद तथा वैसे रोजाना दो बूंद दिया जाता है-

3- छ:माह से लेकर बारह माह की अवधि में पुष्य नक्षत्र को चार बूंद एवं रोजाना दो बूंद पर्याप्त है-

4- एक वर्ष की अवस्था से पांच वर्ष तक पुष्य नक्षत्र को छ: बूंद एवं रोजाना तीन बूंद काफी है -

5- पांच वर्ष से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक पुष्य नक्षत्र को सात बूंद वैसे रोजाना चार बूंद पर्याप्त है-

6- सही परिणाम के लिए शास्त्रोक्त विधि द्वारा तैयार सुवर्णप्राशन ही उत्तम है-

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)के लाभ और महत्व-


1- बालक के लिए सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)मेधा बुधि बल एवं पाचन शक्ति को विकसित करने वाला है यदि कोई भी अपने बालक को जन्म से यह सुवर्णप्राशन को उपर बताये नियम से कर लेता है तो कोई शक नहीं है कि उस बालक के अंदर अद्रितीय मेधा शक्ति और शरीरिक प्रतिरोधक छमता(Physical resistance capabilities)का सम्पूर्ण विकाश होगा और आगे चल कर आपका बालक सभी प्रतियोगिताओं में पूर्ण सफल होगा -

2- सुवर्णप्राशन करने वाले बच्चों में रोग-प्रतिकार शक्ति इतनी सक्षम हो जाती है कि बालक बीमार नहीं होता है और अगर किसी कारण से हो भी गया तो सिर्फ अल्प समय में ही स्वस्थ हो जाता है-

3- सुवर्ण प्राशन से बालक स्ट्रांग हो जाता है तथा उसका स्टेमिना(Stamina) भी अन्य बच्चों से मजबूत होता है-

4- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक स्मरण शक्ति में अन्य बालको से जादा होता है ये हर बात को आसानी से समझ लेते है अर्थात तीव्र बुधि के होते है-

5- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक की पाचन शक्ति विशेष रूप से ठीक होती है अच्छी भूख लगती है तथा चाव से खाना खाते है-

6- सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn) करने वाले बालक का रंग और रूप दोनों में निखार आता है तथा त्वचा कांतिवान होती है -

7- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक कफ विकार खांसी ,दमा,खुजली,एलर्जी आदि समस्याओं से हमेशा दूर रहता है -

8- ये  एक  अपने बालक के लिए किया जाने वाला उत्तम संस्कार है प्रत्येक माता-पिता को ये आयुर्वेदिक सुवर्ण प्राशन अवश्य अपनाना चाहिए ताकि उसका बालक निरोगी-कांतिवान-आयुष्मान रह सके -आप इसे करने से पहले किसी आयुर्वेद डॉक्टर से अवस्य ही सलाह ले ले-

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