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25 सितंबर 2016

Brain-दिमाक को प्रदूषित न करें

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आप जब भी कुछ खाते है तो खाने का माध्यम आपका मुंह है और जब भी आप कुछ सोचते है तब सोच से आपका Brain-मस्तिष्क प्रभावित होता है जब भी आप कुछ पढ़ते है दिमाक(Brain)में स्थापित होता है तो यदि आप अपने दिमाक(Brain)को स्वस्थ ही रखना चाहते है तो फिर उसमे कचड़ा(Garbage)मत डाले-

Brain-दिमाक को प्रदूषित न करें


आइये आपको बताता हूँ कि कचड़ा(Garbage)क्या करता है जब आप कभी सड़क पर जाते है रास्ते भर लगे बैनर और पोस्टर आदि भी पढ़ते ही होगें कभी सोचा है कि आप बेमतलब में क्यों पढ़ते है-इससे क्या कोई लाभ मिलता है-सुबह से शाम तक पेपर से लेकर मैगजीन तक आप जानकारी के लिए तो कम पढ़ते है मगर टाइम-पास(time pass)के लिए पढ़े जा रहे है-किसने कहा है कि आप बेफालतू का कचड़ा(Garbage)अपने दिमाक(Brain)में डालो-लेकिन लोग डाल रहे है-न्यूज-पेपर लिया एक कोने से दुसरे कोने तक पढ़ डाला-फायदा क्या हुआ जानकारी तो कम मिली लेकिन कचड़ा दिमाक(Brain)में जादा गया-

भगवान् ने स्वस्थ दिमाक(Brain)दिया था आपने तो उसे कूड़ाघर(Leftovers home)जादा बना दिया-आज तभी आप देख रहे है लोगों की याददास्त कम होती जा रही है पहले के समय में स्वस्थ भोजन,शुद्ध वायु,शुद्ध जल तथा शुद्ध फल,सब्जी इत्यादि खाने को मिलता था-तब लोगों का मस्तिष्क(Brain)भी कुशाग्र हुआ करता था-लोग किसी भी बात को कंठाग्र कर लेते थे-आप जरा सोचे पुरातन काल में हमारे-ऋषि-मुनि अपने शिष्यों को कंठाग्र किया हुआ ज्ञान दिया करते थे और शिष्य भी सुनकर ही कंठाग्र कर लेते थे-आज रटने के बाद भी याद नहीं रहता है-कारण आप खुद समझ सकते है यदि अब भी नहीं समझे तो फिर आपको कोई नहीं समझा सकता है -

ये बेफालतू का कचड़ा क्या आपको क्या-क्या नुकसान देता है क्या कभी सोचा है-जिस तरह आप भोजन करते है उससे रक्त,मज्जा,वीर्य का निर्माण होता है यदि आप शुद्ध भोजन की जगह कंकड़-पत्थर आदि खाए तो क्या होगा आपका पेट तो भर सकता है लेकिन नुकसान क्या होगा इस बात को आप अच्छी तरह जानते है-उसी तरह आप मस्तिस्क(Brain)में जो भी बात सोचेगें या डालेगे-वो मना तो नहीं करेगा लेकिन आपके दिमाक को कमजोर ही करता जाएगा और फिर जब कोई बर्तन किसी भी वस्तु से पूर्ण-रूप से भर जाता है और अधिक डालने का प्रयास किया जाता है तो वो चीज बाहर आ जाती है-ठीक यही प्रक्रिया दिमाक की भी है अर्थात आप बातों को भूलने लगते है -

जो लोग रात-दिन सोचते रहते है इसी कारण डिप्रेशन(depression)का शिकार हो जाते है-आपका सोचना भी मस्तिष्क का सूक्ष्म आहार ही है आँखों से कुछ भी देखने की क्रिया से सूचना दिमाक को जाती है और एक जगह स्थाईत्व गृहण कर लेता है-मतलब आप खाली स्थान को भरते जा रहे है धीरे-धीरे ये खाली स्थान भरता ही जाएगा और फिर एक समय आएगा जब ये बेफालतू का कचड़ा(Garbage)आपके दिमाक को अधिक कमजोर बना देगा -

आज-कल जिसको देखो कान पे हेडफोन लगाए है-कोई गाना सुन रहा है,कोई बात कर रहा है आखिर तरंगे तो आपके दिमाक में ही जायेगी अभी तो आप स्मार्ट बन कर घूम रहे है-मगर भगवान् न करे कि कुछ समय बाद आपकी श्रवण-इन्द्रिय कमजोर हो जाए-आँखों को टी.वी. के सामने गडाये बैठे है उसकी तरंगों से आपकी आँखों के साथ-साथ आपका दिमाक भी कमजोर हो रहा है-इसलिए आजकल के बच्चों को द्रष्टि-दोष(visual impairments)असमय हो रहा है -

हमारे वैज्ञानिक अपने दिमाक को शांत रखते हुए सिर्फ अन्वेषण पे कार्य करते है इसलिए उनका दिमाक स्थाई रूप से कुशाग्र होता है और आज-कल के युवा शिक्षा से जादा फ़ालतू कचड़ा  दिमाक में देख कर सोच कर या पढ़ कर डालते है इसलिए डिग्री जैसी चीज तो हासिल किसी भी तरह मिल ही जाती है लेकिन जब कौशल उपयोग का समय आता है-उनके हाथों के तोते उड़ जाते है तब उनको लगता है हम अभी अधूरे है-

जिस तरह आयुर्वेद कहता है कि अत्यधिक भोजन कब्ज पैदा करता है उसी तरह अत्यधिक बेफालतू की सोच भी मस्तिष्क में कब्ज ही पैदा करेगा-

भोजन अधिक हो जाए तो परगेटिव्स उपलब्ध है लेकिन अभी तक मस्तिष्क के लिए परगेटिव्स(Prgetiv) उपलब्ध नहीं हैं इसलिए मस्तिष्क में कब्ज न पैदा हो जाए इसका विशेष रूप से ख्याल रक्खें-यदि दिमाक के अंदर कब्ज हो गया तो फिर दुनियां की कोई दवा आपके काम नहीं आएगी और अनेक रोग होगे जिनका इलाज सिर्फ ईश्वर की मर्जी है-

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