आप अपने Luck-भाग्य के निर्णायक स्वयं है

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बहुत से लोगों को हमने ये कहते सुना है मेरा भाग्य(luck)ही खोटा है या परमात्मा की मर्जी नहीं है या फिर किस्मत को कोसते रहते है -क्या आप कभी भी ये नहीं सोचते है कि आप का luck-भाग्य अच्छा नहीं होता तो आपको ये मनुष्य जन्म न मिलकर भेड़,बकरी,पक्षी आदि की योनी प्राप्त भी हो सकती थी -जन्म देने वाला परमात्मा आपको जन्म देकर ये नहीं कहता है कि बस आप भाग्य(luck)के उपर निर्भर होकर बैठ जाए परमात्मा कभी भी ये नहीं कहता है कि हम तुम्हारा भाग्य बिगाड़ेगें या बनायेगे-ये तो स्वयं ही आप बनाते और बिगाड़ते हो-

Your Luck Is Turning Itself

परमात्मा के लिए तो बस आप सिर्फ दिखावा मात्र ही करते हो-समर्पण करने वाली वस्तु तो आप उसे कभी भी नहीं देना चाहते हो या समझ लो कभी अंतरात्मा से इक्षा ही नहीं की है लेकिन फिर भी दोष अपना न देते हुए सारा दोष भाग्य या परमात्मा पे ही मढ़ देते हो-क्युकी अपनी असफलता का श्रेय दूसरों पे डाल देना आपकी आदत में शुमार है-

आप बंद करिये ज्योतिषियों और तांत्रिको के पीछे भागना-ये लोग अपना खुद का भाग्य ही नहीं बदल सके तो आपका भाग्य कैसे बदल सकते है ये तो उनका खुद का व्यापार फलता-फूलता है यदि वो आपको शांति-धन प्रदान कर सकते तो फिर खुद क्यों दूकान सजा कर बैठे होते- ये तो केवल आपके भीतर भाग्य, भविष्य, ऊपरी हवा, ग्रहों एवं ईश्वर की नाराजगी का भय पैदा कर आपको पंगु और लाचार बनाते हैं-

अरे इनको अपनी ही कुंडली नहीं मालूम है-जो खुद अपने और अपने परिवार का भविष्य नहीं जानते-उन भटके, लालची, अंधे लोगों के हाथ आप अपने जीवन की लगाम क्यों सौप देते हो ? 

कोई शनि, मंगल, कोई ग्रह इस संसार में आपका भाग्य बनाने या बिगाड़ने के लिये नही घूमता है आप खुद ही अपने भय या विश्वास पैदा कर खुद ही उसके जाल में जकड़ कर लाभ या हानि उठाते हैं-

ईश्वर ने क्या माँगा था उसने तो आपको दिया ही है -हवा,पानी,ताप,प्रकृति की सभी चीजे -वो जिनका कोई मूल्य भी नहीं लेता है ये तो आप ही हो जो मक्कार और धूर्त लोगों को लुटाने के लिए बैठे है फिर दोष कहाँ से परमात्मा का है-

जीवन मिलना भाग्य की बात है और मृत्यु का समय निश्चित है लेकिन आप मृत्यु के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहे ये आपके कर्म की बात है-

खड़े-खड़े भाग्य के दरवाजे पे सिर मत पटको आप-कर्मो का तूफ़ान खड़ा कर दो सारे दरवाजे अपने आप खुल जाते है- ये जरुरी नहीं कि आप रोज मंदिर जाए आपके कर्म ऐसे हो कि आप जहाँ जाए वहीं मंदिर बन जाए-

सोचो समझो और अच्छा लगे तो ग्रहण करो -कर्म करो एक न एक दिन भाग्य जिसे आप मानते हो आपके दरवाजे पे खुद खड़ा होगा ...!


जरा आप सोचो कि परमात्मा को क्यों आपके भाग्य में रूचि है ये तो आपकी खुद की सोच,मान्यताये,आपके कर्म ही है जो प्रतिपल आपके भाग्य का निर्माण करते है -मान लो आप करोडपति हो या निर्धन हो तो भला परमात्मा को क्या फर्क पड़ता है -आप उपहार स्वरूप यदि परमात्मा को कुछ भेंट भी करो तो भी वो तुम्हारे ही पास है और न भी करो तो भी तुम्हारे पास है आप केवल समाज में अपने नाम के लिए ही करते हो -


खुद समाज में रह कर इर्ष्या ,द्वेष्य,दूसरों के प्रति आप रखते हो तो कर्म फल भी वैसा ही मिलेगा-तो फिर रोना क्यों रोते हो-आप ही कर्म से खुद को बनाते या बिगाड़ते हो-आपके जीवन या भाग्य का कोई यहाँ निर्णायक नहीं है किसी को आपके जीवन की बर्बादी या विकास में रूचि नहीं है-इस संसार में सब कुछ कर्म-फल  नियम के अनुसार हीं घटित होता है-

तोड़ दो अपनी पुरानी मान्यताओं को, भाग्यवादिता को, बंद करिए आप परमात्मा से सारे दिन मांगना- तुम सागर से चम्मच भरो या बाल्टी- क्या परमात्मा आपको रोक रहा है

फेंक दीजिए अपनी सारी नगों से भरी हुई अंगूठियाँ- ये घरों में लटके हुए तंत्र मंत्र और यंत्र, जो आपकी लाचारगी, कमजोरीयों, आपके डर और आत्मविश्वास की कमी को दर्शाते हैं- जो यह साबित करते हैं कि आपका स्वयं और परमात्मा पर बिल्कुल श्रधा नहीं है- बंद कीजिए परमात्मा को रिझाना, उसकी चापलूसी करना, वह तो हर फूल को पूर्णरूप से खिलने के लिए पैदा करता है- अमीरी परमात्मा की देन है, गरीबी आपका अपना चुनाव है जो आपकी अपनी अज्ञानता है-

हमने हस्त रेखा पर रिसर्च की और तीन वर्ष की रिसर्च के बाद ही मुझे ये पता चला की ये रेखाएँ तो सिर्फ मानसिक सोच के साथ बदलती रहती हैं तो फिर भविष्य का निर्धारण कैसे करें- फिर ज्योतिष का अध्यन किया- तो उसमे मैंने देखा की अच्छे-बुरे कर्म को करके भविष्य को बनाया और बिगाड़ा जा सकता हैं- इससे भी संतुष्ट नही हुआ फिर दर्शन- शास्त्र का अध्ययन किया इसमें पाया कि हमारे जीवन में जो कुछ भी अच्छा बुरा हो रहा हैं वो तो हमारे भावों का ही परिणाम हैं-

आप दान करने का कर्म करते हो तो उसके पीछे आपका विश्वास रूपी भाव जुड़ता हैं- स्टोन पहनते हो तो उसके पीछे भी भाव जुड़ता है की इसके पहनने से ये फल मिलेगा- तो जब सब-कुछ आपके मन के विश्वास से घटित हो रहा हैं तो ये आडम्बर क्यों अपना रहे है हम लोग- 

मूर्ती में कोई परमात्मा नही बसता बल्कि परमात्मा तो आपके विश्वास में बसता हैं- मूर्ती तो मात्र आधार बनती हैं-वास्तविक परमात्मा तो आपके अंदर ही है जो आप बाहर भटक-भटक कर ढूढ़ रहे हो - ईश्वर ने एक दिन 24 घंटे का बना कर आपको सौंप दिया ये सोच कर कि कुछ चंद मिनट उसे भी दोगे लेकिन मनुष्य की यही प्रवर्ती है मिलने के बाद अपने में से किसी को कुछ नहीं देना चाहता है सारा समय सिर्फ अपने लिए उपयोग करता है और परमात्मा को ढूंढ़ता फिरता है अघोरी,तांत्रिक,मान्त्रिक,ढोगियों के पास -

Upcharऔर प्रयोग-

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