धनतेरस को भगवान धन्वंतरी पूजा Dhanteras Ko Bhagvaan Dhanvantri Pooja

8:18 pm Leave a Comment
हम सभी लोग बहुत से त्यौहार मनाते है लेकिन कुछ त्यौहार को मानाने के पीछे की क्या वजह है ये नहीं जानते है धनतेरस(Dhanteras)कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी दीपावली से दो दिन ही पहले आता है इस दिन लोग अपने घर के दरवाजे के पास दीया जलाते है और नया बर्तन या चांदी खरीदते है तथा धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि(Bhagvaan Dhanvantri) की पूजा का विधान है-

Dhanvantri Pooja


भगवान धन्वंतरि(Bhagvaan Dhanvantri)आयुर्वेद के जनक हैं इस तिथि को भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे तथा उनके हाथ में अमृत कलश था भगवान धन्वंतरि समस्त रोग, शोक आैर संताप का निवारण कर देते है धनतेरस के दिन उनका पूजन करने से आरोग्य, सुख, समृद्घि आैर दीर्घायु की प्राप्ति होती है-

भगवान धन्वंतरि(Bhagvaan Dhanvantri)की पूजा विधि-

प्रात: काल दैनिक क्रियाआें से निवृत्त होने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा पूजन स्थल पर भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें तथा पूजन के समय आपका मुख पूर्व दिशा की आेर रहे तथा इसके पश्चात निम्न मंत्र के साथ भगवान धन्वंतरि(Bhagvaan Dhanvantri)का आह्वान करना चाहिए- 

     "सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं, अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य |
       गूढं निगूढं औषध्यरूपम्, धन्वन्तरिं च सततं प्रणमामि नित्यं ||"

भगवान धन्वंतरि को चावल, रोली, पुष्प, गंध, जल चढ़ाएं आैर भोग अर्पित करें तथा यदि संभव हो तो खीर का भोग भी अर्पित करें-

ध्यान मन्त्र-

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:। 
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय। 
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप। 
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

रोगनाशक प्रार्थना बीज मन्त्र-

          " ऊं रं रूद्र रोग नाशाय धनवंतर्ये फट् "

पूजन में फल, दक्षिणा आदि चढ़ाने के बाद धूप, दीप आैर कपूर प्रज्वलित कर भगवान की आरती करें-

भगवान धन्वंतरि का पवित्र स्तो‍त्र-

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
 सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥ 
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम। 
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

धनतेरस त्यौहार के पीछे की कथा-

धनतेरस से जुड़ी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण तथा देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए उस समय असुरों के गुरू शुक्राचार्य राजा बलि के यज्ञाचार्य थे-शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना क्युकि वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं जो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आए हैं-

लेकिन राजा बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी तथा वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे तब राजा बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गए-इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया- ये देखे कर वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गए और भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई तब शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आए-

इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया-तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को और तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया -बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा-   

इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई-इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है-
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