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3 नवंबर 2016

क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है

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हिन्दू धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन(Annprasan)संस्कार सप्तम संस्कार है इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है अभी तक तो आपका शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त हो रहा था लेकिन अब आगे से स्वयं शिशु को अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होता है यही प्रकृति का नियम है इसलिए अन्नप्रासन(Annprasan)संस्कार का विधान बनाया गया है-

Annprasan


क्या है अन्नप्राशन-

  1. Annprasan(अन्नप्रासन) संस्कार लगभग पांच माह की आयु होने पर शिशु को अन्न ग्रहण कराकर उसके शारीरिक विकास को प्रशस्त करना ही एक मात्र उद्देश्य होता है इस कार्य को शुभ दिन तथा नक्षत्र चौघडि़यां आदि देखकर मुहुर्त के अनुसार किया जाता है-
  2. माता के गर्भ में मलिन भोजन के जो दोष शिशु में आ जाते हैं उनके निवारण और शिशु को शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन-संस्कार कहा जाता है-
  3. अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है जब शिशु के दाँत उगने लगे तब हमें जानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है तब बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है तब इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है-
  4. बालक को उबटन स्नान के बाद नए-नए वस्त्र पहनाकर शुद्ध साफ बर्तन में खीर बनाकर चांदी की चम्मच कटोरी में रखकर सर्वप्रथम घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य के द्वारा बालक को खीर खिलानी चाहिये इसके पश्चात सभी सदस्य शिशु को खीर चटाते है-
  5. सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार अन्न के संस्कार का प्रभाव व्यक्ति के मानस पर स्वभाव पर भी पड़ता है आहार स्वास्थ्यप्रद होने के साथ पवित्र, संस्कार युक्त हो इसके लिए भी अभिभावकों, परिजनों को जागरूक करना जरूरी होता है अन्न को व्यसन के रूप में नहीं औषधि और प्रसाद के रूप में लिया जाय-इस संकल्प के साथ अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है-
  6. अन्नप्राशन के लिए प्रयुक्त होने वाली कटोरी तथा चम्मच और चाटने के लिए चाँदी का उपकरण हो सके तो अति उत्तम है-तथा अलग पात्र में बनी हुई चावल या सूजी (रवा) की खीर, शहद, घी, तुलसीदल तथा गंगाजल-  ये पाँच वस्तुएँ अन्नप्राशन तैयार रखनी चाहिए-शुद्ध आहार से शरीर में सत्व गुण बढाता है-
  7. अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता है बल्कि मन, बुद्धि, तेज़ व आत्मा का भी पोषण होता है इसी कारण अन्नप्राशन को संस्कार रुप में स्वीकार करके शुद्ध, सात्त्विक व पौष्टिक अन्न को ही जीवन में लेने का व्रत करने हेतु अन्नप्राशन-संस्कार संपन्न किया जाता है-
  8. अन्नप्राशन का उद्देश्य बालक को तेजस्वी, बलशाली एवं मेधावी बनाना है, इसलिए बालक को धृतयुक्त भात या दही, शहद और धृत तीनों को मिलाकर अन्नप्राशन करने का का विधान है-

  9. बालक को ऐसा अन्न दिया जाना चाहिए जो पचाने में आसान व बल प्रदान करने वाला हो-
  10. छ से सात माह के शिशु के दांत निकलने लगते हैं और शिशु की पाचन क्रिया प्रबल होने लगती है ऐसे में जैसा शिशु अन्न खाना वह प्रारंभ करता है उसी के अनुरुप उसका तन-मन बनता है-
  11. मनुष्य के विचार, भावना, आकांक्षा एवं अंतरात्मा बहुत कुछ अन्न पर ही निर्भर रहती है और अन्न से ही जीवन तत्व प्राप्त होते हैं जिससे रक्त, मांस आदि बनकर जीवन धारण किए रहने की क्षमता उत्पन्न होती है अन्न ही मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है उसे भगवान् का कृपा-प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए-

अन्न के प्रभाव की रोचक एक कथा-

महाभारत में एक रोचक कथा आती है जब शरशय्या पर पडे भीष्म पितामह पांडवों को कोई उपदेश दे रहे थे कि अचानक द्रौपदी को हंसी आ गई-द्रौपदी के इस व्यवहार से पितामह को बड़ा‌ आश्चर्य हुआ तब उन्होंने द्रौपदी से हंसने का कारण पूछा ?

द्रौपदी ने विनम्रता से कहा-आपके उपदेशों में धर्म का मर्म छिपा है पितामह! आप हमें कितनी अच्छी-अच्छी ज्ञान की बातें बता रहे हैं लेकिन यह सब सुनकर मुझे कौरवों की उस सभा की याद हो आई है जिसमें वे मेरे वस्त्र उतारने का प्रयास कर रहे थे और तब मैं चीख-चीखकर न्याय की भीख मांग रही थी लेकिन आप वहां पर होने के बाद भी मौन रहकर उन अधर्मियों का प्रतिवाद नहीं कर रहे थे-आप जैसे धर्मात्मा उस समय क्यों चुप रहें? आपने दुर्योधन को क्यों नहीं समझाया था यहीं सोचकर मुझे हंसी आ गई-

इस पर भीष्म पितामह गंभीर होकर बोले-बेटी ! उस समय मैं दुर्योधन का अन्न खाता था उसी से मेरा रक्त बनता था और जैसा कुत्सित स्वभाव दुर्योधन का है वही असर उसका दिया अन्न खाने से मेरे मन और बुद्धि पर पडा-किंतु अब अर्जुन के बाणों ने पाप के अन्न से बने रक्त को मेरे तन से बाहर निकाल दिया है और मेरी भावनाएं शुद्ध हो गई हैं इसलिए अब मैं वहीं कह रहा हूं जो धर्म के अनुकूल और न्यायोचित है-

Upcharऔर प्रयोग-

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