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29 दिसंबर 2016

इन्द्रायण के आयुर्वेदिक प्रयोग

इन्द्रायण(Indrayan)एक लता होती है जो पूरे भारत के बलुई क्षेत्रों में पायी जाती है यह खेतों में उगाई जाती है इन्द्रायण तीन प्रकार की होती है पहली छोटी इन्द्रायण, दूसरी बड़ी इन्द्रायण और तीसरी लाल इन्द्रायण होती है तीनों प्रकार की इन्द्रायण में लगभग पचास से लेकर सौ फल आते हैं-

इन्द्रायण के आयुर्वेदिक प्रयोग


यह दस्त लाने वाली तथा कफ-पित्तनाशक है तथा यह कामला(पीलिया),प्लीहा (तिल्ली),पेट के रोग,श्वांस (दमा), खांसी, सफेद दाग, गैस, गांठ, व्रण (जख्म), प्रमेह (वीर्य विकार), गण्डमाला (गले में गिल्टी का हो जाना) तथा विष को नष्ट करता है ये गुण छोटी और बड़ी दोनों इन्द्रायण में होते हैं-

इन्द्रायण का सेवन बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए क्योंकि इसके ज्यादा और अकेले सेवन करने से पेट में मरोड़ पैदा होता है और शरीर में जहर के जैसे लक्षण पैदा होते हैं-

विभिन्न रोगों में इन्द्रायण से उपचार-


1- इन्द्रायण के बीजों का तेल नारियल के तेल के साथ बराबर मात्रा में लेकर बालों पर लगाने से बाल काले हो जाते हैं तथा इन्द्रायण की जड़ के 3 से 5 ग्राम चूर्ण को गाय के दूध के साथ सेवन करने से बाल काले हो जाते हैं परन्तु इसके परहेज में केवल सिर्फ दूध ही पीना चाहिए-

2- सिर के बाल पूरी तरह से साफ कराके इन्द्रायण के बीजों का तेल निकालकर लगाने से सिर में काले बाल उगते हैं तथा इन्द्रायण के बीजों का तेल लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं-

3- इन्द्रायण के पके हुए फल को या उसके छिलके को तेल में उबालकर और छानकर पीने से बहरापन दूर होता है-

4- इसके पके हुए फल की धूनी दांतों में देने से दांत के कीड़े मर जाते हैं-

5- इन्द्रायण की जड़ के चूर्ण को नस्य(नाक में डालने से)दिन में 3 बार लेने से अपस्मार(मिर्गी)रोग दूर हो जाता है-

6- इन्द्रायण के फल में छेद करके उसमें कालीमिर्च भरकर छेद को बंद करके धूप में सूखने के लिए रख दें या गर्म राख में कुछ देर तक पड़ा रहने दें फिर काली मिर्च के दानों को रोजाना शहद तथा पीपल के साथ एक सप्ताह तक सेवन करने से कास (खांसी) के रोग में लाभ होता है-

7- स्त्रियों के स्तन में सूजन आ जाने पर इन्द्रायण की जड़ को घिसकर लेप करने से लाभ होता है-

8- इन्द्रायण का मुरब्बा खाने से पेट के रोग दूर होते हैं तथा इन्द्रायण के फल में काला नमक और अजवायन भरकर धूप में सुखा लें अब इस अजवायन की गर्म पानी के साथ फंकी लेने से दस्त के समय होने वाला दर्द दूर हो जाता है-

9- विसूचिका(हैजा)के रोगी को इन्द्रायण के ताजे फल के 5 ग्राम गूदे को गर्म पानी के साथ या इसके 2 से 5 ग्राम सूखे गूदे को अजवायन के साथ देना चाहिए-

10- इन्द्रायण की जड़ को पानी के साथ पीसकर और छानकर 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से पेशाब करते समय का दर्द और जलन दूर हो जाती है-

11- दस से बीस ग्राम लाल इन्द्रायण की जड़, हल्दी, हरड़ की छाल, बहेड़ा और आंवला को 160 मिलीलीटर पानी में उबालकर इसका चौथाई हिस्सा बाकी रह जाने पर काढ़ा बनाकर उसे शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से मूत्रकृच्छ (पेशाब में दर्द और जलन) का रोग समाप्त हो जाता है-

12- मासिक-धर्म के रुक जाने पर 3 ग्राम इन्द्रवारूणी के बीज और 5 दाने कालीमिर्च को एक साथ पीसकर 200 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें इस काढ़े को छानकर रोगी को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म दुबारा शुरू हो जाता है-

13- इन्दायण की जड़ को योनि में रखने से योनि का दर्द और पुष्पावरोध(मासिक-धर्म का रुकना)दूर होता है-

14- इन्द्रायण के फल के गूदे को गर्म करके पेट में बांधने से आंतों के सभी प्रकार के कीड़े मर जाते हैं-

15- इन्द्रायण की फल मज्जा को पानी में उबालकर और छानकर गाढ़ा करके छोटी-2 चने के आकार की गोलियां गोलियां बना लेते हैं इसकी 1-2 गोली ठण्डे दूध से लेने से सुबह साफ दस्त शुरू हो जाते हैं-

16- इन्द्रायण के फल का गूदा तथा बीजों से खाली करके इसके छिलके की प्याली में बकरी का दूध भरकर पूरी रात भर के लिए रख दें सुबह होने पर इस दूध में थोड़ी-सी चीनी मिलाकर रोगी को कुछ दिनों तक पिलाने से जलोदर मिट जाता है इन्द्रायण की जड़ का काढ़ा और फल का गूदा खिलाना भी लाभदायक है परन्तु ये तेज औषधि है इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम ग्राम को सोंठ और गुड़ के साथ सुबह और शाम देने से लाभ होता है ध्यान रहें की अधिक मात्रा में सेवन करने से विशाक्त(जहर)बन जाता है और हानि पहुंचाता है किसी वैध्य की देखरेख में लें-

17- इन्द्रायण की जड़ की छाल के चूर्ण में सांभर नमक मिलाकर खाने से जलोदर समाप्त हो जाता है-

18- 100 ग्राम इन्द्रायण की जड़ को 500 मिलीलीटर एरण्ड के तेल में डालकर पकाने के लिए रख दें पकने पर जब तेल थोड़ा बाकी रह जाये तो इस 15 मिलीलीटर तेल को गाय के दूध के साथ सुबह-शाम पीने से उपदंश समाप्त हो जाता है-

19- इन्द्रायण की जड़ों के टुकड़े को 5 गुना पानी में उबाल लें जब उबलने पर तीन हिस्से पानी बाकी रह जाए तो इसे छानकर उसमें बराबर मात्रा में बूरा मिलाकर शर्बत बनाकर पीने से उपदंश और वात पीड़ा मिटती है-

20- इन्द्रायण की जड़ को पीसकर गाय के घी में मिलाकर भग(योनि)पर मलने से प्रसव आसानी से हो जाता है इन्द्रायण के फल के रस में रूई का फाया भिगोकर योनि में रखने से बच्चा आसानी से हो जाता है या इन्द्रायण की जड़ को बारीक पीसकर देशी घी में मिलाकर स्त्री की योनि में रखने से बच्चे का जन्म आसानी से होता है-

21- इन्द्रायण की जड़ों को सिरके में पीसकर गर्म करके शोथयुक्त(सूजन वाली जगह)स्थान पर लगाने से सूजन मिट जाती है अथवा शरीर में सूजन होने पर इन्द्रायण की जड़ को सिरके में पीसकर लेप की तरह से शरीर पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है-

22- इन्द्रायण को बारीक पीसकर इसका चूर्ण बना लें फिर 200 मिलीलीटर पानी में 50 ग्राम धनिये को मिलाकर काढ़ा बना लें इसके बाद इन्द्रायण के चूर्ण को इस काढ़े में मिलाकर शरीर पर लेप की तरह लगाने से सूजन खत्म हो जाती है-

23- इन्द्रायण की जड़ और पीपल के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर गुड़ में मिलाकर 10 ग्राम की मात्रा में रोजाना सेवन करने से संधिगत वायु दूर होती है-

24- 500 मिलीलीटर इन्द्रायण के गूदे के रस में 10 ग्राम हल्दी, काला नमक, बड़े हुत्लीना की छाल डालकर बारीक पीस लें, जब पानी सूख जाए तो चौथाई-चौथाई ग्राम की गोलियां बना लें एक-एक गोली सुबह-शाम दूध के साथ देने से सूजन तथा दर्द थोड़े ही दिनों में अच्छा हो जाता है-

25- इन्द्रायण की जड़ों को बेल पत्रों के साथ पीसकर 10-20 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम पिलाने से स्त्री गर्भधारण करती है-

26-  इन्द्रायण के फल का 6 ग्राम गूदा खाने से बिच्छू का (विष) जहर उतरता है तथा 3 ग्राम बड़ी इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण पान के पत्ते में रखकर खाने से सर्पदंश में लाभ मिलता है-

27- बच्चों के डिब्बा रोग(पसली चलना)में इसकी जड़ के 1 ग्राम चूर्ण में 250 मिलीग्राम सेंधानमक मिलाकर गर्म पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से लाभ मिलता है-

28- लाल इन्द्रायण के फल को पीसकर नारियल के तेल के साथ गर्म करके कान के अन्दर के जख्म पर लगाने से जख्म साफ होकर भर जाता है-

29- इन्द्रायण के फल के रस या जड़ की छाल को तिल के तेल में उबालकर तेल को मस्तक (माथे) पर लेप करने से मस्तक पीड़ा या बार-बार होने वाली मस्तक पीड़ा मिटती है-

30- इन्द्रायण के फलों का रस या जड़ की छाल के काढ़े के तेल को पकाकर, छानकर 20 मिलीलीटर सुबह-शाम उपयोग करने से आधाशीशी (आधे सिर का दर्द), सिर दर्द, पीनस (पुराना जुकाम), कान दर्द और अर्धांगशूल दूर हो जाते हैं-

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