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मन को स्थिर करने का तरीका क्या है

सच कहा जाये तो ये मन(Mind)बड़ा ही चंचल है वह कभी भी एक जगह स्थिर नहीं रहता है और इसकी गति का कोई आंकलन नहीं किया जा सकता है ये एक चंचल जिद्दी बच्चे की तरह है जितना रोकते हैं उतना ही उधर भागता है और ज़िद्दी बच्चे की तरह जो एक बार ज़िद पकड़ ले तो जब तक पूरी न हो जाए ये मन मानता नहीं है वह रोता है और चिल्लाता है फिर कभी गुस्सा भी करता है या फिर रुठ जाता है-

मन को स्थिर करने का तरीका क्या है

वैसे तो इस मन(Mind)को काबू करना बड़ा ही मुश्किल है लेकिन इस मन को स्थिर करने का एक तरीका है त्राटक-जी हाँ नि:संदेह मन(Mind)को सिर्फ त्राटक से ही एक जगह स्थिर किया जा सकता है अब आप पूछेगें कि त्राटक क्या है?तो आइये आपको त्राटक के बारे में थोडी जानकारी से आपको अवगत कराते है-

त्राटक(Trāṭaka)क्या है-


1- जब हम किसी भी वस्तु को जब हम एक बार देखते हैं तो यह देखने की क्रिया एकटक कहलाती है और जब उसी वस्तु को जब हम कुछ देर तक देखते हैं तो ये क्रिया द्वाटक कहलाती है किन्तु जब हम किसी वस्तु को निनिर्मेष दृष्टि से निरंतर दीर्घकाल तक देखते रहते हैं तो फिर यह क्रिया त्र्याटक या त्राटक कहलाती है-

2- यदि आप लंबे समय तक या कुछ महीनों के लिए आप प्रतिदिन एक घंटा ज्योति की लौ को अपलक देखते रहें तो आपकी तीसरी आंख पूरी तरह सक्रिय हो जाती है तब आप अधिक प्रकाशपूर्ण, अधिक सजग अनुभव करते हैं मगर इस क्रिया की की शुरुवात धीरे-धीरे करने का अभ्यास किया जाता है-

3- जी हाँ एकटक देखने की विधि दरअसल में किसी विषय से संबंधित नहीं है बस इसका संबंध देखने मात्र से ही है क्योंकि जब आप बिना पलक झपकाए एकटक देखते हैं तो आप" एकाग्र"  हो जाते है और आपका मन स्थिर हो जाता है यही कला मन को स्थिर करने की है योगी लोग भी अपनी मस्तिष्क के केंद्रबिंदु पे इसी का अभ्यास करते हुए एकाग्र साधना में लीन हो जाते है-

4- चूँकि मन का स्वभाव ही है भटकना और यदि आप बिलकुल एकटक देख रहे हैं जरा भी बिना हिले-डुले तो फिर आपका मन अवश्य ही बड़ा मुश्किल में पड़ जाएगा क्युकि मन का स्वभाव है एक विषय से दूसरे विषय पर भटकने का और निरंतर भटकते रहने का-यदि आप अंधेरे को, प्रकाश को या किसी भी चीज को एकटक देख रहे हैं तथा आप बिलकुल "एकाग्र" हैं तो आपके मन का यही भटकाव रुक जाता है लेकिन बस ये एक निरंतर अभ्यास की क्रिया है-

5- यदि आपका मन भटकेगा तो आपकी दृष्टि "एकाग्र"  नहीं रह पाएगी और आप मूल विषय को चूकते रहेंगे यानी जब आपका मन कहीं और चला जाएगा तो आप भूल जाएंगे, आप स्मरण नहीं रख पाएंगे कि आप क्या देख रहे थे आपका भौतिक रूप से विषय वहीं होगा लेकिन आपके लिए वह विलीन हो चुका होगा क्योंकि आप वहां नहीं हैं आप तो विचारों में भटक गए हैं-

6- अब तो आप समझ ही चुके होगे कि त्राटक का अर्थ है अपनी चेतना को भटकने न देना और जब आप मन को भटकने नहीं देते तो शुरू में वह बड़ा ही संघर्ष करता है मतलब आपका मन ही आपसे कड़ा संघर्ष करता है लेकिन यदि आप एकटक देखने का अभ्यास करते ही रहे तो धीरे-धीरे आपका यही मन संघर्ष करना छोड़ देता है शुरू-शुरू में कुछ क्षणों के लिए वह ठहर जाता है और जब मन ठहर जाता है तो फिर वहां अ-मन है क्योंकि मन का अस्तित्व केवल गति में ही बना रह सकता है विचार-प्रक्रिया केवल गति में ही बनी रह सकती है और जब कोई गति नहीं होती है तो विचार-प्रक्रिया खो जाती है आप सोच-विचार नहीं कर सकते है क्योंकि विचार का मतलब ही है गति-एक विचार से दूसरे विचार की ओर गति-यह एक निरंतर प्रक्रिया है-

7- क्या आप जानते है कि मन के अन्दर छुपी होती है अलौकिक दिव्य और चमत्कारिक शक्तियाँ-जी हाँ-आपको आश्चर्य होने की आवश्यकता नहीं है ये सच है कि हमारा शरीर ही अक्षय उर्जा और शक्तियों का भण्डार है असीम शक्तियों का स्वामी है लेकिन हम इसके बारे में सही रूप से नहीं जानते है और इधर-उधर भटकते रहते है जब किसी व्यक्ति को किसी पुण्य कर्म से सद्गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाता है तो वही गुरु आपके अंदर सुप्तावस्था में सोई हुई कुंडली को जाग्रत करके आपको अपने अंदर समाहित शक्तियों से साक्षात्कार करा देता है-

8- जब ये बाह्यमन जब सुप्तावस्था में होता है तब अंर्तमन सक्रिय होने लगता है और इसी अवस्था को ध्यान कहा जाता है-मन को बेलगाम घोड़े की संज्ञा दी गई है क्योंकि मन कभी एक जगह स्थिर  नही रहता तथा शरीर की समस्त इद्रियों को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करता है और मन में हर समय नई -नई इच्छओं को उत्पन्न करता है-यदि मन को किसी तरह अपने वश में कर एकाग्रचित कर लिया जाय तब मनुष्य की आत्मोन्नति  होने लगती है तथा समस्त प्रकार के विषय विकारों से उपर उठने लगता है और अंर्तमन में छुपे हुये उर्जा के भंडार को जागृत कर अलौकिक सिद्धियों का स्वामी बन सकता है-


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