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31 मार्च 2017

रुकिए जरा क्या आप अप्रैल फूल मनाने जा रहे है

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क्या आप हिन्दू धर्म को मानते है या फिर आप में भी ईसाइयत रच बस गई है क्या आप को पता है अप्रैल का माह हमारे विक्रमी सवंत के अनुसार हम हिन्दुओ का नया साल होता है जो हमारे लिए पावन दिन है फिर आप क्यों इसे "मुर्खता दिवस " के रूप में मनाते हो क्या यही हमारे पूर्वजो के संस्कार थे जिनको आज की पीढ़ी खोती जा रही है-

रुकिए जरा क्या आप अप्रैल फूल मनाने जा रहे है

आप क्यों अप्रैल माह के इस पावन महीने की शुरुआत को मूर्खता दिवस कह रहे हो और अगर आप दूसरो को मुर्ख बना रहे है तो शायद हो सकता है इस श्रेणी में कहीं आप तो नहीं है-क्या आपको पता भी है आखिर क्यों कहते है "अप्रैल फूल" -

जी हाँ #अप्रैल फुल(#April fool)का अर्थ है हिन्दुओ का मूर्खता दिवस और इसकी वास्तविकता क्या है ये नाम अंग्रेज ईसाईयों की देन क्यों है बहुत दिनों से ये #अप्रैल फूल बिना सोचे बिना जाने चलता चला आ रहा है इसलिए संस्कृत के साहित्य में कहा गया है "गतानुगति लोक :" इसका अर्थ है "नक़ल करने वाले लोग

यही हिन्दू करता चला आ रहा है और पाश्चात्य सभ्यता की ओर उन्मुक्त है अंग्रेजो की गुलामी से आजादी की लड़ाई लड़ कर देश को आजाद कराने वाले आज जिन्दा होते तो वे भी अपना सर पीट लेते कि देश तो आजाद करा लिया लेकिन आज की जनरेशन को कौन आजाद कराने आयेगा-

आखिर आप सब हिन्दू कैसे समझेंगें "अप्रैल फूल" का मतलब बड़े दिनों से बिना सोचे समझे चल रहा है ये अप्रैल फूल-अप्रैल फूल(April fool)

अप्रैल फूल(April fool)इसका मतलब क्या है-


बात दरअसल ये है कि जब ईसाइयत अंग्रेजो द्वारा हमे 1 जनवरी का नववर्ष थोपा गया तो उस समय हिन्दू लोग विक्रमी संवत के अनुसार 1 अप्रैल से अपना नया साल मनाते थे जो आज भी सच्चे हिन्दुओ द्वारा मनाया जाता है आज भी हमारे बही खाते और बैंक 31 मार्च को बंद होते है और 1 अप्रैल से शुरू होते है पर उस समय जब भारत गुलाम था तो ईसाइयत ने विक्रमी संवत का नाश करने के लिए साजिश करते हुए 1 अप्रैल को मूर्खता दिवस "अप्रैल फूल" का नाम दे दिया ताकि हमारी सभ्यता मूर्खता लगे अब आप ही सोचो अप्रैल फूल कहने वाले कितने सही हो आप और आज भी क्यों मना रहे हो-अब ये अंग्रेज तो है नहीं लेकिन आज आपकी सभ्यता भी वही है अपने ही लोगों को मुर्ख बनाने की-

कल फिर भी आने वाला है 1 अप्रैल इस साल भी नई जनरेशन बड़ी ख़ुशी से "अप्रैल फूल" मनायेगा और हम बेवकूफ है जो सभी को समझाने के बजाय अप्रैल फूल ही बनते रहेगें-

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30 मार्च 2017

धनियाँ के घरेलू उपयोग क्या हैं

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हमारे भारतीय रसोई में धनिया(Corriander)रसोई का अभिन्न हिस्सा है यह बतौर मसाला और व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए इसका खूब इस्तेमाल किया जाता है फिर चाहे धनिया की हरी ताजा पत्तियों की बात हो या इसके सूखे हुए बीज दोनों प्रकार से इनका इस्तेमाल घर-घर में किया जाता है-
धनियाँ के घरेलू उपयोग क्या हैं

आधुनिक विज्ञान ने धनिया के अनेक औषधीय गुणों को प्रमाणित किया है आइये आज हम आपको इससे जुड़े हुए कुछ परंपरिक ज्ञान के बताने का प्रयास करते हैं-

धनिया(Corriander)से घरेलू उपचार-


1- हरे ताजे धनिया की पत्तियां(Coriander leaves)लगभग 20 ग्राम और उसमें चुटकी भर कपूर मिला कर पीसकर रस छान लें अब इस रस की दो बूंदें नाक के छिद्रों में दोनों तरफ टपकाने से तथा रस को माथे पर लगा कर हल्का-हल्का मलने से नाक से निकलने वाला खून-जिसे नकसीर भी कहा जाता है तुरंत ही बंद हो जाता है-

2- थोड़ा-सा ताजा हरा धनिया(Corriander)कुचलकर कर पानी में उबाल कर ठंडा होने के बाद मोटे कपड़े से छान कर शीशी में भर लें तथा इसकी दो बूंदें आंखों में टपकाने से आंखों में जलन, दर्द तथा आंख से पानी गिरना जैसी समस्याएं दूर होती हैं-

3- धनिया महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी समस्याओं को भी दूर करता है यदि मासिक धर्म साधारण से ज्यादा हो तो आधा लीटर पानी में लगभग 6 ग्राम धनिया के बीज डालकर खौलाएं और इसमें शक्कर डालकर पिएं, फायदा होगा-

4- धनिया को मधुमेह नासी माना जाता है इसके सेवन से खून में इंसुलिन की मात्रा नियंत्रित रहती है धनिया त्वचा के लिए भी फायदेमंद है-

5- धनिया की पत्तियों के कुचलकर इसकी एक चम्मच मात्रा लेकर चुटकी भर हल्दी का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर दिन में कम से कम दो बार लगाएं-इससे मुंहासों की समस्या दूर होती है और यह ब्लैकहेड्स को भी हटाता है-

6- सौंफ, मिश्री व धनिया के बीजों की समान मात्रा लेकर चूर्ण बना कर 6-6 ग्राम प्रतिदिन भोजन के बाद खाने से हाथ-पैर की जलन, एसिडिटी, आंखों की जलन, पेशाब में जलन व सिरदर्द दूर होता है-

7- धनिया, जीरा और बच की बराबर मात्रा लेकर काढ़ा बनाते हैं ये सर्दी और खांसी से पीड़ित बच्चों को भोजन के बाद यह काढ़ा (10 मि.ली) दिया जाता है जिससे उन्हें आराम मिलता है-

8- राजस्थान के काफी हिस्सों में धनिया की चाय पी जाती है इससे स्वास्थ्य में सुधार होता है इसे बनाने के लिए लगभग 2 कप पानी में जीरा, धनिया, चाय पत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ डालकर करीब 2 मिनट तक खौलाया जाता है और आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरक डाल दिया जाता है-कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ट बनाया जाता है-गले की समस्याओं, अपच और गैस से परेशान लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है यह बहुत फायदेमंद होता है-


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29 मार्च 2017

जातिवाद और सम्प्रदायवाद की राजनीति कब तक होगी

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क्या कभी सोचा है कि भारत को हम सब मिल कर आखिर कैसा देश बनाना चाहते है?कभी सोचा है कब तक हम सब जातिवाद धर्म सम्प्रदाय की राजनीति करते रहेगें? कुछ छणिक लाभ के लिए हम आखिर अपने देश को को कहाँ लें जा रहे है? हो सकता है मेरी पोस्ट पढ़ कर कुछ निजी स्वार्थी लोगों को तकलीफ होगी लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्युकि यही वास्तविक सत्य है-


जातिवाद और सम्प्रदायवाद की राजनीति कब तक होगी

जब भी लैपटॉप खोलता हूँ तो कुछ लोगों के दिल में समर्थन और असमर्थन का धुंवा सा उठता देखता हूँ हर एक की अपनी-अपनी सोच और अपना-अपना विचार है ख़ास कर आज कल सोसल मीडिया पर फैलाई जाने वाली पोस्ट का धुंवा है जो लोगों के बीच जहर की तरह फैलता जा रहा है कुछ लोगों ने अपने-अपने समुदाय के मानने वालों ने सिर्फ ये जातिवाद ,सम्प्रदायवाद,एकतावाद,क्षेत्रवाद का जहर बोने का ठेका सा ले रक्खा है-

आजकल जातिवाद और एकता की बात करने में कुछ कतिपय लोग लगें है मै उनसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ आप आखिर ये जातिवाद की रोटी कब तक सेंकते रहेगें ब्राम्हणवाद, राजपूतवाद, जाटवाद, यादववाद, कायस्थवाद,गुर्जर और मीना और अंत में दलित और अल्पसमुदायवाद-क्यों देश को अनेक वाद में बदलने में लगे हो जब आप आपस में ही मनुष्यवाद को बांटना चाहते हो तो फिर आपका देश कभी महानता की ओर कैसे बढेगा फिर तो इसकी कल्पना करना सिर्फ एक बेमानी ही कहा जा सकता है-

पहले भी बँटवारे की राजनीति का परिणाम खतरनाक ही हुआ है और आज तक हम अपने देश के बँटवारे की वजह से परेशान है अपने ही घर को देखों शादी के बाद जब आपकी आने वाली बहूँ अपने पति को लेकर बँटवारे की बात करती है तो आपको कितना महान कष्ट होता है क्या आप अपने पुत्र का विवाह ये सोच कर करते है कि बंटवारा करना है शायद नहीं-लेकिन जब-जब बंटवारा होता है तो दुष्परिणाम ही देखने को मिलता है-

पहले के राजा महराजा अपने-अपने राज्य को बाँट चुके और परिणाम क्या मिला इसका इतिहास गवाह है की राजपूतो ने कभी एक-दूसरे राजपूत की मदद नहीं की बस सब अपनी ही मूंछ पर ही ताव खाते थे और जब मुग़ल एक किले पर हमला करते तो दूसरे किले के राजा तमाशा देखते थे बस राजपूत क्षत्रिय राजाओ में यही सबसे बड़ी कमजोरी थी जिसका फ़ायदा मुग़ल उठाते थे इसलिए मुगलो ने 800 साल तक हम पर राज किया ये एक कड़वी सच्चाई है जिसे जानकर भी हम सभी अनजान है और आज भी आजादी की लड़ाई के बाद यही प्रथा शुरू कर रहें है-

आज कायस्थ समाज कायस्थ एकता की बात कर रहा है उन सभी कायस्थ भाइयों से एक बात पूछना चाहता हूँ कि आप अपना एक अलग समाज क्यों बनाने की बात करते है क्या आपको भी बहती गंगा में हाथ धोना है या राजनीति की रोटियां सेंकनी है एक तरफ तो आप खुद को सर्वश्रेष्ठ बताते हो और दूसरी तरफ आप भी समाज में आरक्षण और एकता की बात करते हो आखिर इस एकता की राजनीति से आप भी पूरे समाज को वही देना चाहते हैं जो दूसरे जातिगत के लोगों ने आज तक किया है और परिणाम आप सब के सामने है आखिर हम मनुष्यवाद की ओर कब ध्यान देगें

आज के दौर में आतंकवाद को किस तरीके से परिभाषित किया जाए ये भी विवाद का एक मुद्दा है इस संवेदनशील मामले में प्रचलित विचारधारा यह है कि किसी एक के विचार में जो आतंकवादी है वह दूसरे के विचार में स्वतंत्रता सेनानी हो सकता है ऐसे में दोनों ही पक्षों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए लेकिन हिंसा इस समस्या का हल नहीं हो सकता है-

आज आतंकवादियों के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में दुनिया के सभी देश एक-जुट नज़र आ रहे हैं लेकिन इन सभी कोशिशों के बावजूद आतंकवाद की परिभाषा अभी तय नहीं हो पाई है हाँ अलबत्ता ब्रिटेन एक ऐसा देश है जहाँ आतंकवादी हरकतों को कानूनी तौर पर परिभाषित किया गया है ब्रिटेन सरकार के मुताबिक ऐसी कोई भी हरकत आतंकवाद है जिसमें किसी सरकार पर किसी काम को करवाने के लिए ग़ैरकानूनी तरीके से जबरन दबाव डाला जाए-

कुछ वर्षो पहले भी कुछ जातिगत लोगों ने अपना वर्चस्व रख कर दूसरे जातिगत लोगों पर अत्याचार किया है ब्राह्मणों ने कभी किसी दूसरी जाती वालों का सम्मान नहीं किया और यहाँ तक कि दलितों को तो मंदिर भी नहीं जाने देते थे ब्राह्मणों की छुआछूत के भेदभाव के कारण विश्व और देश में हिन्दुत्व को बदनामी मिली और ईसाईयो और मुसलमानों को दलित हिन्दुओं को धर्मपरिवर्तन करने में सफलता मिली है हिन्दुत्व का जो नुकसान हुआ उसमें ब्राह्मणों की भी एक बहुत बड़ी भुमिका है चाहे वो मानें या ना मानें इससे समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता है-आज का युवा समझदार हो गया है इन सब चीजों से बाहर निकल कर विकास के रास्ते पर बढ़ना चाहता है लेकिन आज भी कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थवश समाज में अनेक भ्रांतियाँ फैलाने में अपना योगदान करते नजर आ रहे है-

अब भी समय है संभल सकते है खुद को सारे बेकार के "वाद-विवाद" निकाल कर मनुष्यवाद की ओर अग्रसर हों-जब भी सोचों तो अपनी और अपने देश की उन्नति के बारे में सोचो-बाकी राजनीति तो उन लोगों के लिए है जो सिर्फ सत्ता ,पदलाभ के लिए राजनीति में कदम रखते है हमें तो इनमें से कुछ अच्छे लोगों का साथ देना या चुनाव करना है जो राष्टहित में कार्य कर सकें और सबको साथ लेकर देश का और समाज का विकास कर सकें-

28 मार्च 2017

अरंडी के तेल में ये अदभुत गुण पायें जाते हैं

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अरंडी का पौधा आपको सर्वत्र ही देखने को मिल जाता होगा इसके चौड़े पत्ते होते है इसके बीज से तेल निकाला जाता है इस तेल को कास्टर आयल(Castor oil)भी पुकारते हैं इसका तेल दूसरे तेलों की तुलना में थोडा चिपचिपा होता है-

अरंडी के तेल में ये अदभुत गुण पायें जाते हैं

अरंडी के तेल में बहुत गुण होते है जिनसे आप अभी तक अनजान है इसके फायदे जानकार आप इसका प्रयोग अवश्य ही करना चाहेगें अरंडी का तेल आपके बालो और आपकी त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद है आज इस पोस्ट में हम इसके गुणों की चर्चा करते है-

अरंडी के तेल(Castor oil)के उपयोग-


1- यदि आपकी एडियाँ बहुत अधिक फटती हैं तो आप रात को सोते समय अरंडी के तेल को हल्का सा गर्म करके अपनी एडियों पर लगायें तथा रात भर लगा रहने के बाद सुबह आप अपनी एडियों को धो ले बस इसका लगातार रोज रात को लगाने से आपकी एडियाँ मुलायम होने के साथ-साथ फटी और दर्द करने से शीघ्र ही छुटकारा दिला देगा-अरंडी का तेल आपको पंसारी या मेडिकल स्टोर से भी मिल जाएगा मेडिकल स्टोर में इसे कास्टर आयल के नाम से लिया जा सकता है-

2- यदि आप अपने चेहरे को चमक देना चाहती है तो अरंडी के तेल की कुछ बुँदे हाथ में लेकर अपने फेस पर थोड़ी देर लगायें और लगभग एक घंटे बाद आप साफ़ पानी से चेहरे को धो लें कुछ दिन रोज करने से आप अपनी चेहरे की त्वचा चमक से भरपूर होता देखेगी-

3- क्या आप बालों की समस्या से परेशान है तो आप अपने बालों को अरंडी के तेल से मसाज करें ये आपके बालों के लिए एक अच्छे कंडीशनर का काम करता है इसके प्रयोग से आपके बाल काले और घने बनते है-

4- अगर आप काली घनी पलके पाना चाहती है तो कास्टर ऑइल का इस्तेमाल करें आप सोने से पहले रुई के फाहे को अरंडी के तेल में डुबोकर अपनी पलकों पर लगाए कुछ ऐसा करने से आप नेचुरल तरीके से घनी पलके पा सकती हैं-

5- एक चमच्च बादाम के तेल में एक चमच्च कास्टर आयल मिलाए और इस मिश्रण को स्ट्रेच मार्क्स पर लगाए आप देखेगें कि कुछ ही दिनों में स्ट्रेच मार्क्स के निशाँन हलके हो जाएंगे-

6- यदि आप नाख़ून टूटने की समस्या से परेशान है तो कुछ दिनों तक सोने से पहले अपने नाखुनो पर कास्टर ऑइल से मसाज करें-इससे आपके नाख़ून मजबूत होंगे और जल्दी नही टूटेंगे-

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27 मार्च 2017

नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व क्या है

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हमारे देश में साल भर अलग-अलग प्रकार के उत्सव मनाने की हमेशा से एक परम्परा रही है जैसे कि दिवाली, दशहरा, होली, शिवरात्री और नवरात्रि(Navratri)आदि लेकिन इनमे से कुछ उत्सव को हम रात्रि में ही मनाते है-इनका अगर कोई विशेष कारण न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता है नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार क्या है दरअसल नवरात्र शब्द से “नव अहोरात्रों(विशेषरात्रियों)का बोध” होता है और इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि “रात्रि”शब्द सिद्धि का प्रतीकमाना जाता है-

नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व क्या है

नवरात्रि(Navratri)के दिन नवदिन नहीं कहे जाते हैं लेकिन नवरात्रि के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम थोडा नवरात्रि को समझे-हमारे मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों(Navratri)का विधान बनाया है मतलब कि विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा(पहली तिथि)से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्रि(Navratri)मनाया जाता है-लेकिन फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है और इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम,यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं-

जो व्यक्ति मंत्रो का सिद्ध करना चाहता है वो साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं-

नवरात्रों(Navratri)में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं-

अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं यहाँ तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों(Navratri) में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है-

वैज्ञानिक रहस्य-

आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति,मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया और अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं और हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे-

एक वैज्ञानिक रहस्य ये भी है कि अगर दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाती है किंतु यदि रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं-रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है जहाँ आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है-

इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है यही रात्रि साधना का वैज्ञानिक रहस्य है जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है-

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियाँ हैं जिनमे से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है और ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम है"नवरात्रि"-

क्या नवरात्रि(Navratri)में नौ दिन या नौ रात को गिना जाना चाहिए-तो मैं यहाँ बता दूँ कि अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी ‘नवरात्रि’ नाम सार्थक है चूँकि यहाँ रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्रि यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है-

इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन,स्वच्छ्ता,तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में-शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है और इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं-

हालाँकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन,सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमे सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि,साफ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म,कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है-

जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-


1.शैलपुत्री
2.ब्रह्मचारिणी
3. चंद्रघंटा
4. कूष्माण्डा
5. स्कन्दमाता
6. कात्यायनी
7. कालरात्रि
8. महागौरी
9. सिध्दीदात्री

इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीजों से भी सम्बंध है जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-

1. कुट्टू (शैलान्न)
2. दूध-दही(ब्रह्मचारिणी)
3. चौलाई (चंद्रघंटा)
4. पेठा (कूष्माण्डा)
5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
6. हरी तरकारी (कात्यायनी)
7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
8. साबूदाना (महागौरी)
9. आंवला(सिध्दीदात्री)

ये नौ प्राकृतिक व्रत के खाद्य पदार्थ हैं लेकिन बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना रखने वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए-

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नवरात्रि में आप कलश स्थापना कैसे करें

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हम हर वर्ष नवरात्रि का आगमन होता है और हम सभी माता की पूजा अर्चना करते है आप सभी जानते है कि मां की पूजा आरम्भ करने से पहले नवरात्र पूजा की सफलता हेतु कलश-स्थापन(Pitcher-Sthapan)का किया जाता है और ये घटस्थापन हमेशा ही शुभ मुहूर्त में किया जाता है-

नवरात्रि में आप कलश स्थापना कैसे करें

कैसे करें घटस्थापना(Kalash Installation)-

जहां घट स्‍थापना करनी हो आप उस स्‍थान को शुद्ध जल से साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें फिर अष्टदल बनाएं तथा उसके ऊपर एक लकड़ी का पाटा रखें और उस पर लाल रंग का वस्‍त्र बिछाएं इन पर आप पांच स्थान बना कर क्रमशः गणेशजी, मातृका, लोकपाल, नवग्रह तथा वरुण देव को स्‍थान दें फिर सर्वप्रथम थोड़े चावल रखकर श्रीगणेजी का स्मरण करते हुए स्‍थान ग्रहण करने का आग्रह करें-

इसके बाद मातृका, लोकपाल, नवग्रह और वरुण देव को स्‍थापित करें और स्‍थान लेने का आह्वान करें फिर गंगाजल से सभी को स्नान(छिडकाव)कराएं-स्नान के बाद तीन बार कलावा लपेटकर प्रत्येक देव को वस्‍त्र के रूप में अर्पित करें-अब हाथ जोड़कर देवों का आह्वान करें फिर आप सभी देवों को स्‍थान देने के बाद अब आप अपने कलश के अनुसार जौ मिली मिट्टी बिछाएं तथा कलश में जल भरें इसके उपरान्त कलश में थोड़ा और जल-गंगाजल डालते हुए 'ॐ वरुणाय नमः' मंत्र पढ़ें और कलश को पूर्ण रूप से भर दें-

इसके बाद आम की टहनी(पल्लव) डालें तथा जौ या कच्चा चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर रखें-फिर लाल कपड़े से लिपटा हुआ कच्‍चा नारियल कलश पर रख कलश को माथे के समीप लाएं और वरुण देवता को प्रणाम करते हुए कलश पर स्थापित करें और आप कलश के ऊपर रोली से या स्वास्तिक लिखें फिर मां भगवती का ध्यान करते हुए अब आप मां भगवती की तस्वीर या मूर्ति को भी स्‍थान दें तथा थोड़े से चावल डालें फिर आप मां की षोडशोपचार विधि से पूजा करें-अब यदि सामान्य द्वीप अर्पित करना चाहते हैं तो आप दीपक को प्रज्‍ज्वलित करें-लेकिन यदि आप अखंड दीप अर्पित करना चाहते हैं तो फिर सूर्य देव का ध्यान करते हुए उन्हें अखंड ज्योति का गवाह रहने का निवेदन करते हुए जोत को प्रज्‍ज्वलित करें-यह ज्योति पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए-इसके बाद पुष्प लेकर मन में ही संकल्प लें कि मां मैं आज नवरात्र की प्रतिपदा से आपकी आराधना अमुक कार्य के लिए कर रहा/रही हूं आप मेरी पूजा स्वीकार करके इष्ट कार्य को सिद्ध करो-

पूजा के समय यदि आप को कोई भी मंत्र नहीं आता हो तो चिंता की कोई बात नहीं है आप केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' से सभी पूजन सामग्री चढ़ाएं चूँकि ये "मां शक्ति" का यह मंत्र अमोघ है तथा आपके पास जो भी यथा संभव सामग्री हो उसी से आराधना करें यदि किसी कारण आपको कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो आप अक्षत का भी उपयोग कर सकते हैं तथा संभव हो तो श्रृंगार का सामान और नारियल-चुन्नी जरूर चढ़ाएं-

यदि आप दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं तो संकल्प लेकर पाठ आरंभ करें लेकिन सिर्फ कवच आदि का पाठ कर व्रत रखना चाहते हैं तो माता के नौ रूपों का ध्यान करके कवच और स्तोत्र का पाठ करें तथा इसके बाद आरती करें और दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ एक दिन में नहीं करना चाहते हैं तो दुर्गा सप्तशती में दिए श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी का 11 बार पाठ करके अंतिम दिन 108 आहुति देकर नवरात्र में श्री नवचंडी जपकर माता का पूर्ण आशीर्वाद भी प्राप्त कर सकते हैं-

माता की पूजा में सिर्फ मन की श्रधा का विशेष प्रभाव भी है इस कलियुग में इसलिए जो लोग विधान पूर्वक न कर सके वो श्रधा से भी मन्त्र जप कर सकते है-ईश्वर का ही दिया सब कुछ है इसलिए आप को ईश्वर को जादा से जादा अपनी श्रद्धा अर्पित करना चाहिए-

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हिन्दू नववर्ष की शुरुवात कैसे करें

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में नित्यकर्म से निवृत्त होकर अभ्यंग स्नान अथवा तीर्थ, नदी, सरोवर में स्नान करके शुद्ध पवित्र होंना चाहिए तथा स्नान के पश्चात् सूर्योदय के समय हिन्दू नववर्ष(Hindu New Year)के शुभारंभ के अवसर पर सूर्य की प्रथम रश्मि(किरण)के दर्शन के साथ नववर्ष का प्रारम्भ करें-

हिन्दू नववर्ष की शुरुवात कैसे करें

हिन्दू धर्म अनुसार पूर्व दिशा में मुख करके नीचे लिखे मंत्र से सूर्य को जल-पुष्प सहित अर्ध्य प्रदान करें-

'आकृष्णेन रजसा व्वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्त्यञ्च ।
हिरण्ययेन सविता रधेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।'

आप सूर्यदेव के सन्मुख ही मानसिक रूप से प्रार्थना करें कि हे सूर्यदेव आप हमारे सभी दुखों को दूर करो जिससे हमारा भला हो आप हमें ज्ञानियों का हित करने वाला ज्ञान प्रदान करें हमारे नेत्रों की रक्षा करें और द्रष्टि को प्रखर करें मुझे सौ वर्षों तक नेत्रों से दिखाई देवे तथा सौ वर्षों का जीवन प्राप्त हो- सौ वर्षों तक श्रवण करें-सौ वर्षों तक अच्छी तरह से संभाषण करें-सौ वर्षों तक किसी के अधीन न रहे और सौ वर्षों से अधिक समय तक भी आनन्दपूर्वक रहें-

आज के दिन क्या सेवन करना है-


1- नववर्ष के पहले दिन आप नीम के कोमल पत्ते, पुष्प, काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिश्री और अजवाइन मिलाकर चूर्ण बना कर आज के दिन सेवन करने से संपूर्ण वर्ष रोग से मुक्त रहते हैं

2- आज आप अपने गुरु और इष्ट की आरती पूजन करके मंत्र पुष्पांजली और प्रसाद वितरण करें-

3- सभी बंधू-बांधव,मित्रों को नववर्ष का अभिनन्दन और परस्पर शुभकामना, मंगलकामना, नववर्ष मधुर मिलन आदि का कार्यक्रम आयोजित करें-

4- नवसंवत्सर आरंभ के दिन नूतन वर्ष के पंचांग की पूजन, पंचांग का फल श्रवण, पंचांग वाचन और पंचांग का दान करने का उल्लेख धर्मशास्त्र में लिखा है कई जगह यह परंपरा आज भी गाँव-गाँव में प्रचलित है गांव में गुरु, पुरोहित आदि गांवों में पंचांग वाचन करते है-

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स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता का घरेलू प्रयोग

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हमारे समाज में आज भी निसंतान(Childless)होना एक अभिशाप माना जाता रहा है जिसमें नपुंसकता(Impotence)के कारण निःसंतान होना भी एक सामान्य कारण होता है कुछ अधिक एलोपैथिक दवाओं के सेवन से भी नपुंसकता उत्पन्न कर संतान उत्पन्न करने में व्याधा उत्पन्न कर सकती हैं-
स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता का घरेलू प्रयोग

इनमें उच्चरक्तचाप की औषधियां एवं मधुमेह जैसे रोग भी शामिल हैं कई बार नपुंसकता(Impotence)का कारण शारीरिक न होकर मानसिक होता है ऐसे में केवल चिकित्सकीय काऊंसीलिंग ही काफी होती है-

कुछ आयुर्वेदिक नुस्खे स्त्री एवं पुरुषों में नपुंसकता-जन्य निःसंतानता के साथ ही शुक्राणुजन्य समस्याओं को दूर करने में कारगर सिद्ध होती हैं जो निम्नलिखित हैं 

निसंतानता(Childless)के घरेलू प्रयोग-

1- आप आयुर्वेद दवा बेचने वाले पंसारी से-श्वेत कंटकारी लाकर उसके  पंचांग को सुखाकर पाउडर बना लें तथा स्त्री को मासिक धर्म के पाचवें दिन से लगातार तीन दिन तक प्रातः एक बार दूध से दें तथा पुरुष को-अश्वगंधा 10 ग्राम, शतावरी 10 ग्राम, विधारा 10 ग्राम, तालमखाना 5 ग्राम, तालमिश्री 5 ग्राम सब मिलाकर 2 चम्मच दूध के साथ प्रातः सायं लेने पर निश्चित लाभ होता है-

2- स्त्री में "फलघृत" नामक आयुर्वेदिक औषधि भी इनफरटीलीटी को दूर करता है-

3- पलाश के पेड़ की एक लम्बी जड़ में लगभग 250 एम.एल. की एक शीशी खुले मुंह की लगाकर आप इसे जमीन में दबा दें तथा एक सप्ताह बाद आप इसे निकाल लें-अब इसमें इकठ्ठा होने वाला निर्यास द्रव प्रातः पुरुष को एक चम्मच शहद से दें-यह शुक्रानुजनित कमजोरी(ओलिगोस्पर्मीया)को दूर करने में मददगार होता है-

4- अश्वगंधा 1.5 ग्राम. शतावरी 1.5 ग्राम, सफ़ेद मुसली 1.5 ग्राम एवं कौंच बीज चूर्ण को 75 मिलीग्राम की मात्रा में गाय के दूध से सेवन करने से भी नपुंसकता दूर होकर कामशक्ति बढ़ जाती है-

5- शिलाजीत का 250 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम की मात्रा में दूध के साथ नियमित सेवन भी मधुमेह आदि के कारण आयी नपुंसकता को दूर करता है-

6- नपुंसकता(Impotence)को दूर करने के लिए उचित चिकित्सकीय परामर्श एवं समय पर कुछ आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग कर इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है-

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26 मार्च 2017

वेरीकोज वेन्स(Varicose Veins)क्या है

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रक्त में हिमोग्लोबिन(Hemoglobin)नामक लाल पदार्थ होता है इसकी विशेषता यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड एवं ऑक्सीजन दोनों के साथ प्रति वतर्यता (Reversibly)से जुड़ सकता है-हिमोग्लोबिन जब शरीर के ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करता है वह कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन कहलाता है कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन वाला रक्त अशुद्ध होता है जो शिराओं से होकर फेफड़ों में श्वांस लेने की प्रक्रिया में हीमोग्लोबिन कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़कर शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है-

वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)क्या है

क्या होता है वेरीकोज  वेन्स(Varicose Veins)-


1- यह शुद्ध रक्त धमनियों द्वारा कोशिकाओं तक पहुंचता है तथा अशुद्ध रक्त का रंग नील लोहित या बैंगनी होता है-शिराओं की भित्तियां पतली होती हैं और ये त्वचा के ठीक नीचे होती हैं-इसीलिए ऊपर से शिराओं को देखना आसान होता है अशुद्ध नील लोहित रंग के रक्त के कारण शिराएं(Veins)हमें नीले रंग की दिखाई देती हैं-शिराओं की तुलना में धमनियों की भित्ति अधिक मोटी होती है और काफी गहराई में स्थित होती है-इस कारण लाल रक्त प्रवाहित होने वाली धमनी हमें दिखाई नहीं देती है-

2- हमारे शरीर में रक्त को वापस ह्रदय तक ले जाने वाली शिराए जब मोटी होकर उभर कर दिखाई देने लगती है तथा सुजन आ जाती है तब व्यक्ति को टांगो में थकान और दर्द महसूस होता है अधिक उभरी शिराओ के होने का मुख्य कारण  हृदय की तरफ रक्त ले जाने वाली शिराओं में वाल्व लगे होते हैं जिसके कारण ही रक्त का प्रवाह एक दिशा की ओर होता है-

3- कई प्रकार की बीमरियों(कब्ज, खानपान सम्बन्धी विकृतियां, गर्भावस्था से सम्बन्धित रोग) के कारण शिराओं के रक्त संचार में बाधा उत्पन्न हो जाती है जिसकी वजह से ये शिरायें फैल जाती हैं और रक्त शिराओं में रुककर जमा होने लगता है और सूजन हो जाती हैं और अन्य प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-व्यायाम की कमी, बहुत समय तक खड़ा रहना, अधिक तंग वस्त्र, अधिक मोटापा के कारण भी यह रोग हो जाता है यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक होता है क्योंकि आजकल रसोईघर में खड़े होकर ही भोजन बनाया जाता है-

4- इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के टांगों में दर्द होता है तथा रोगी व्यक्ति को थकान और भारीपन महसूस होता है इसमें रोगी के टखने सूज जाते हैं और रात के समय टांगों  में ऐंठन होने लगती है तथा त्वचा का रंग बदल जाता है और उसके निचले अंगों में त्वचा के रोग भी हो जाते हैं-

प्राकतिक उपचार(Natural Treatments)करे-


1- रोगी व्यक्ति को नारियल  का पानी, जौ का पानी, हरे धनिये का पानी, खीरे का पानी, गाजर का रस, पत्तागोभी, पालक का रस आदि के रस को पी कर उपवास रखना चाहिए तथा हरी सब्जियों का सूप भी पीना चाहिए-

2- कुछ दिनों तक रोगी व्यक्ति को फल, सलाद तथा अंकुरित दालों को भोजन के रूप में सेवन करना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को वे चीजें अधिक खानी चाहिए जिनमें विटामिन सी तथा ई की मात्रा अधिक हो और उसे नमक, मिर्च मसाला, तली-भुनी मिठाइयां तथा मैदा नहीं खाना चाहिए-

3- पीड़ित रोगी को गरम पानी का एनिमा भी लेना चाहिए तथा इसके बाद रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए और फिर पैरों पर मिट्टी का लेप करना चाहिए तथा यदि रोगी व्यक्ति का वजन कम हो जाता है तो मिट्टी का लेप कम ही करें-

4- जब रोगी व्यक्ति को ऐंठन तथा दर्द अधिक तेज हो रहो हो तो गर्म तथा इसके बाद ठण्डे पानी से स्नान करना चाहिए-रोगी व्यक्ति को गहरे पानी में खड़ा करने से उसे बहुत लाभ मिलता है-

5- इस रोग से पीड़ित रोगी को सोते समय पैरों को ऊपर उठाकर सोना चाहिए-इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है-

6- यदि इस रोग में कुछ ये आसन का उपयोग करे तो इसमें निश्चित ही लाभ  होता है जैसे-सूर्यनमस्कार,शीर्षासन,सर्वागासन,विपरीतकरणी,पवनमुक्तासन,उत्तानपादासन,योगमुद्रासन आदि ये किसी अच्छे योगाचार्य से सीख सकते है इसमें समय अवश्य लग सकता है मगर धीरे-धीरे ये रोग चला जाता है-

अधिक जानकारी के लिए देखें-

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25 मार्च 2017

क्या हम आज भी उल्लू है

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"हर डाल पे उल्लू बैठा हो तो अंजामे गुलिस्ता क्या होगा"

जिसने भी कहा यथार्थ सत्य ही कहा है हमारा देश जिसे कभी सोने की चिड़ियाँ कहा जाता था लोगों की बुरी नजर लग गई है पहले मुगलों ने लुटा फिर अंग्रेजो ने लुटा और जब थोडा बहुत बच गया था तो फिर इन राजनीति करने वालों उल्लुओं ने लूटा ये आखिर क्यों हुआ जिसका जवाब हमें ही अपने दिल पे हाथ रख कर पूछना होगा आज कल तो हर गाँव में शहर में चौक और गलियारों में सभी जगह देखो तो राजनीति(Politics)के इन उल्लुओं(Owls)का ही गुणगान होता दिखता है कारण ये है कि हम सभी उल्लू मिलकर राजनीति के उल्लुओं(Owls)का गुणगान में लगे है-

क्या हम आज भी उल्लू है

आज हमारा संविधान(Constitution)भी इन्ही उल्लुओं(Owls)की जेब में है आम आदमी का भी कसूर है जो पहले इन्हें वोट देकर जिताता है फिर खुद-ब-खुद उल्लू(owl) बन जाता है जब जनमत(Public opinion)हम ही इन उल्लुओं को देते है तो कसूर किस उल्लू का है-

सत्ता के लोलुप की जेब में जब जनमत(Public opinion)आ जाता है तो हमारा संविधान(Constitution)भी इनकी जेब में होता है और हम सिर्फ एक उल्लू बन खुद को सविंधान से आशा करते है कि हमें इंशाफ मिलेगा-

परिणाम आज से वर्षो पहले भी यही था जब हमारे यहाँ राजे-रजवाड़े हुआ करते थे वो तो बस एशो-आराम-नाच गाने और झूठी शान में ही अपना समय गवां देते थे और लोग व्यापार और पनाह के नाम पर अपने हाथ-पाँव फैला कर हमें ही गुलाम बना लेते थे और प्रजा सिर्फ उल्लुओं(Owls)की भाँती अपने राजा को देखता रह जाता था और विवश हो जाता था उल्लुओं की तरह जीने में-

आज भी हम नए युग के उल्लुओं के गुलाम है एक सुप्रीमो या हाईकमान अपना ही वर्चस्व(Domination)रखना चाहता है और उसके नीचे तमाम उल्लू उसकी आज्ञा मानने को विवश है क्युकि हमारे संस्कार ही हो गए है उल्लुओं की तरह जीने के -

आज से पहले जो बलिदान हुए शहीद थे उनकी आत्मा भी कही न कही से हम सभी उल्लुओं को देख कर धिक्कारती ही होगी और ये सोचती होगी कि काश क्या इसी लिए आजादी की जंग लड़ी थी जो आज भी ये गुलाम होकर जीने को विवश है वैसे भी देशभक्तों को इन उल्लुओं(Owls)ने हमेशा उल्लू माना जो कि राष्ट्राभिमान के कारण अंग्रेज सरकार के आगे टेढ़े हो जाने के कारण अपना उल्लू सीधा नहीं कर सके-हमारे शहीद दर-दर जान लेकर भटकते रहे और वंदेमातरम कहकर फांसी के फंदों पर लटकते रहे और जो आजादी के बाद बचे रहे गए-तो वे सपरिवार अपमान और उपेक्षा का जहर गटकते रहे है जबकि अंग्रेजियत से ओत-प्रोत कुछ उल्लू भी समझदार निकले उनको पता था बलिदान देकर क्या मिलेगा सत्ता का सुख तो कोई और लेगा इसलिए उन्होंने अपनी समझदारी से अपना उल्लू सीधा किया-

खुद-ब-खुद जो आदमी उल्लू बना रहना चाहता है उसका तो भगवान् भी कुछ नहीं कर सकते है इसमें भी दो तरह के लोग पाए जाते है एक जो दूसरों को उल्लू बनाती है और दूसरी वो है जो खुद ही उल्लू बनती है

एक विशेष वर्ग जो पहले से ही उल्लू है उसे तो दूसरा कोई भला कैसे उल्लू बना सकता है जब आजादी मिली तो अपने घोसले से चालाक उल्लू बाहर आये चूँकि अब वातावरण उनके अनुकूल हो चुका था तो घोंसले के चालाक उल्लुओं से खुद के पूर्वजों की ख्याति के गुणगान गाने शुरू किये उनके नाम पे जगह-जगह पत्थर से लेकर चिकित्सालय और विध्यालय से लेकर कई तरह की इमारतों पे भी पूर्वज उल्लुओं का नामकरण किया जाने लगा ताकि आने वाले वर्षो में नए जन्मे उल्लुओं(Owls)को सिर्फ यही लगे कि अगर कुछ किया है तो सिर्फ एक विशेष समुदाय वर्ग के उल्लुओं ने ही देश के लिए कुछ किया है -बाकी तो सब निम्नकोटि के उल्लू ही थे -

अमर शहीदों के बलिदानों को इनके दिव्य और भव्य कारनामों के आगे ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे सूरज के आगे सिगरेट लाइटर और फिर शुरू हुआ एक महत्वपूर्ण कार्य और वो कार्य था दूसरे लोगो को उल्लू बनाओ और अपनी सत्ता की लोलुपता को-जांत-पांत-अमीरी-गरीबी में बाँट कर रक्खो -

भविष्य का नया अध्याय शुरू हो चुका था आदर्श और बलिदान खो चुका था बस भ्रष्टाचार के ही उल्लू बोल रहे थे अपने उल्लेखनीय उल्लुत्व के साथ- भारतीय जनमानस में विराट उल्लाप करते हुए ये अपना समुदाय बढ़ाने के लिए उल्लू चहुं ओर सक्रिय हो गए थे-देश के अलग-अलग राज्यों से महान उल्लुओं को ढूढू-कर मन्त्र-दीक्षा दी गई अपना समुदाय डेवलप करो और राज करो बस हम आपके राजा है इसलिए आप बस हमारा समर्थन करते रहे आप मजे ले और हमे भी लेने दे

अब क्या था-काठ के उल्लुओं(Owls)के कंधे पे अपना समुदाय बढाने का भार आ गया था और फिर शुरू हुआ तेजी से उल्लू बनाने का कार्यक्रम जो आज तक विद्यमान है बस सभी अपने-अपने स्वार्थवश एक दूसरे को उल्लू बनाए जा रहे है ये सिलसिला चल रहा है और अनवरत प्रगतिशील है -

भ्रष्टाचार कैसे बढे और उल्लू-संस्कृति का वर्चस्व बढे-इसके लिए तरह-तरह के प्रयोग किये जाने लगे बहुत कुछ परिवर्तन किये गए ताकि गरीब -गरीबी के स्तर से उपर न आये-जाति-बिभाजन तेजी से प्रखर हुआ ताकि कहीं फिर से कोई एकता का बिगुल न बजा सके-समुदायों में बंटवारा हुआ-देश का बंटवारा तो पहले भी हुआ आज भी कुछ उल्लू इसी फिराक में लगे है -

'तमसोमाज्योतिर्गमय' को पलटकर 'ज्योतिर्मातमासोगमय' कर दिया गया-यानी कि उजाले से अंधेरे की ओर-उल्लुओं को उजाला पसंद नहीं होता है वे हमेशा अन्धकार को ही पसंद करते है और अगर कोई एक उजाले की तरफ ले जाने के लिए हंस रूपी मानव आ जाए तो फिर पेट में दर्द होना तो इन उल्लुओं को स्वाभाविक है -

आप सभी जानते ही है उल्लू लक्ष्मी का वाहन है इसलिए उल्लू शब्द बुरा नहीं-लक्ष्मी माता की सवारी को भला आप हेय द्रष्टि से कैसे देख सकते है आपको ये भी पता होगा तंत्र में भी उल्लू का बहुत महत्व है लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी लोग उल्लू तंत्र साधना में लगे रहते है वही हाल प्रजातंत्र में है आपको शोहरत और धन पाना है तो राजनीति के उल्लुओं को सिद्ध किये कुछ नहीं मिलेगा यदि ये नहीं कर पाए तो फिर रह जायेगे सिर्फ-

  'काठ के उल्लू '

जिसे सिर्फ शो केस में ही सजाया जा सकता है-

ये लेख एक कटुब्यंग है- 

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24 मार्च 2017

भोजन का संस्कार या तडका क्या है

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सभी महिलाए जब घर में सब्जी या दाल बनाती है तो बघार(Twist)या तडका लगाती है यानी इसका मतलब है कि खाने को वो एक प्रकार संस्कारित करती है जिस तरह बिना संस्कार(Sanskar)के इंसान जंगली होता है उसी तरह भोजन भी बिना संस्कार के शरीर में उथल पुथल कर देता है और वात-पित्त-कफ का संतुलन बिगाड़ कर बीमार कर देता है-
भोजन का संस्कार या तडका क्या है

क्या आप जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के मसालों से तडका लगाने से उनके गुण उस भोजन को संतुलित बना देते है इसलिए भारतीय भोजन बनाने की पद्धति सबसे वैज्ञानिक और स्वास्थकर है हमारे यहाँ परम्परा रही है कि दोपहर के भोजन में अजवाइन और हींग का तडका लगाया जाता है और रात में नहीं लगाते है यह भी एक बहुत बड़ा विज्ञान है जिसे गृहिणियां हमेशा से संजोती आई है-

भोजन संस्कार(Sanskar)के फायदे-


आपने देखा ही होगा कि किसी भी चाइनीज़ और इटेलियन या अंग्रेजी खाने में तडका या छौंक(Twist)नहीं लगता है ज़्यादातर तडके(Twist)में हम राइ जीरे का तडका लगते है पर इसमे मेथी दाने की पावडर, सौंफ, कलौंजी भी डाली जा सकती है-

पंचफोरन में जीरा, राई, कलौंजी, मेथी दाना और सौंफ होता है मेथी दाना से वात-रोगों का शमन होता है इसलिए यह रात के भोजन के लिए उत्तम है हींग, अजवाइन से पित्त-रोग का शमन होता है इसलिए यह दोपहर के भोजन के लिए उत्तम है-

हम लोग स्वाद के चक्कर में खाना पकाने में वैदिक और आयुर्वेदिक सिद्धांतों की पूरी तरह से अवहेलना कर देते हैं जिसकी वजह से आज स्वास्थ्य सम्बन्धी कई समस्याएँ आ रही है अगर कोई ऐसी बीमारी है जो वर्षों से ठीक नहीं हो रही तो खाने में आप ये आजमा कर देखे-

क्या करे और क्या नहीं करे-


1- सूप बनाते समय उसमे दूध नहीं डाले-

2- दही खट्टा हो तो उसमे दूध नहीं डाले-

3- ओट्स पकाते समय उसमे दूध दही साथ साथ न डाले-

4- चाय कॉफ़ी में शहद ना डाले-

5- पूरी,भटूरे,मिठाइयां डालडा घी में ना बना कर शुद्ध घी में बनाए-

6- नमकीन चावलों में तथा सब्जी की करी में दूध न डाले-

7- खट्टे फलों के साथ,फ्रूट सलाद में क्रीम या दूध न डाले-

8- दही बड़ा विरुद्ध आहार है-

9- शाम को 4 बजे के बाद केले,दही,शरबत,आइसक्रीम आदि का सेवन ना करे-

10- आटा लगाने के लिए दूध का इस्तेमाल ना करे-

11- गर्मियों में हरी मिर्च और सर्दियों में लाल मिर्च का  सेवन करे
-
12- सुबह ठंडी तासीर की और शाम के बाद गर्म तासीर के खाने का सेवन करे-

13- पकौड़ों के साथ चाय या मिल्क शेक नहीं गरम कढ़ी ले-

14- फलों को सुबह नाश्ते के पहले खाए किसी अन्य खाने के साथ मिलाकर ना ले और कच्चा सलाद भी खाने के पहले खाना चाहिए-

15- दही वाले रायते को हिंग जीरे का तडका अवश्य लगाएं-

16- दाल में एक चम्मच घी अवश्य डाले-

17- खाली पेट पान का सेवन ना करे-

18- खाने के साथ पानी नहीं न पिए बल्कि ज़्यादा पानी डाला छाछ या ज्यूस या सूप पियें-

19- अत्याधिक नमक और खट्टे पदार्थ सेहत के लिए ठीक नहीं-

20- बघार लगाने में खूब हिंग,जीरा,सौंफ,मेथीदाना,धनिया पावडर,अजवाइन आदि का प्रयोग करें-

21- जो अन्न द्विदलीय है(दो भागों में टूटा हुआ)के साथ दही का प्रयोग वर्जित है उससे नुकसान होगा-अगर खाना ही है तो पहले उससे मेथी और अजवायन से बघार लें-


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सुवर्णप्राशन संस्कार क्या है और कैसे किया जाता है

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सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)बच्चों में किया जाने वाला सोलह संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है इसे स्वर्ण-बिंदु-प्राशन भी कहा जाता है सुवर्ण यानि की सोना चटाना ही इसका मूल उद्देश्य है कुछ सुवर्ण के साथ आयुर्वेदिक औषिधि गाय का घी और शहद के मिश्रण को तैयार करके पिलाया जाता है जिस प्रकार रोग-प्रतिकार की शक्ति बढाने के लिए वैक्सीन का प्रयोग किया जाता है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद में सुवर्णप्राशन का विधान है-

सुवर्णप्राशन संस्कार क्या है और कैसे किया जाता है

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)कैसे किया जाता है-


नियम है जन्म से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक बच्चों में सुवर्णप्राशन किया जाता है बच्चों में बुधि का विकास पांच वर्ष की आयु तक हो जाता है इसलिए बचपन से ही बालक का सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn) किया जाता है -

इसका उचित समय सूर्योदय से पहले खाली पेट ही करना उचित है शुरू में एक महीने से तीन माह तक रोजाना कराये और इसके उपरान्त प्रत्येक माह के पुष्य नक्षत्र के दिन ही एक बार अवश्य कराये-पुष्य नक्षत्र हर माह सताईसवें दिन आता है जादा जानकारी आप पंचांग से प्राप्त कर सकते है -

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)में प्रयोग किया जाने वाला मूल शहद है इसे फ्रिज आदि में न रक्खे न ही गर्म तापमान पर रक्खे इसका ख्याल रखना आवश्यक है सुवर्णप्राशन के बाद एवं पहले आधा घंटा कुछ भी खाने को न दे-

यदि किसी कारण से बालक बीमार है तो उस समय सुवर्णप्राशन न कराये-सुवर्णप्राशन के अंतर्गत सुवर्णभस्म , बच, ब्रम्ही, शंखपुष्पी, आमला, यष्टिमधु , गुडूची, बेहडा, शहद और गाय का घी इस्तेमाल होता है -

मात्रा-

1- जन्म से लेकर दो माह तक पुष्य नक्षत्र को दो बूंद तथा वैसे रोजाना एक बूंद ही पर्याप्त है -

2- दो माह से छ:माह तक पुष्य नक्षत्र को तीन बूंद तथा वैसे रोजाना दो बूंद दिया जाता है-

3- छ:माह से लेकर बारह माह की अवधि में पुष्य नक्षत्र को चार बूंद एवं रोजाना दो बूंद पर्याप्त है-

4- एक वर्ष की अवस्था से पांच वर्ष तक पुष्य नक्षत्र को छ: बूंद एवं रोजाना तीन बूंद काफी है -

5- पांच वर्ष से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक पुष्य नक्षत्र को सात बूंद वैसे रोजाना चार बूंद पर्याप्त है-

6- सही परिणाम के लिए शास्त्रोक्त विधि द्वारा तैयार सुवर्णप्राशन ही उत्तम है-

सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)के लाभ और महत्व-


1- बालक के लिए सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn)मेधा बुधि बल एवं पाचन शक्ति को विकसित करने वाला है यदि कोई भी अपने बालक को जन्म से यह सुवर्णप्राशन को उपर बताये नियम से कर लेता है तो कोई शक नहीं है कि उस बालक के अंदर अद्रितीय मेधा शक्ति और शरीरिक प्रतिरोधक छमता(Physical resistance capabilities)का सम्पूर्ण विकाश होगा और आगे चल कर आपका बालक सभी प्रतियोगिताओं में पूर्ण सफल होगा -

2- सुवर्णप्राशन करने वाले बच्चों में रोग-प्रतिकार शक्ति इतनी सक्षम हो जाती है कि बालक बीमार नहीं होता है और अगर किसी कारण से हो भी गया तो सिर्फ अल्प समय में ही स्वस्थ हो जाता है-

3- सुवर्ण प्राशन से बालक स्ट्रांग हो जाता है तथा उसका स्टेमिना(Stamina) भी अन्य बच्चों से मजबूत होता है-

4- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक स्मरण शक्ति में अन्य बालको से जादा होता है ये हर बात को आसानी से समझ लेते है अर्थात तीव्र बुधि के होते है-

5- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक की पाचन शक्ति विशेष रूप से ठीक होती है अच्छी भूख लगती है तथा चाव से खाना खाते है-

6- सुवर्णप्राशन(Suvarnprasn) करने वाले बालक का रंग और रूप दोनों में निखार आता है तथा त्वचा कांतिवान होती है -

7- सुवर्णप्राशन करने वाला बालक कफ विकार खांसी ,दमा,खुजली,एलर्जी आदि समस्याओं से हमेशा दूर रहता है -

8- ये  एक  अपने बालक के लिए किया जाने वाला उत्तम संस्कार है प्रत्येक माता-पिता को ये आयुर्वेदिक सुवर्ण प्राशन अवश्य अपनाना चाहिए ताकि उसका बालक निरोगी-कांतिवान-आयुष्मान रह सके -आप इसे करने से पहले किसी आयुर्वेद डॉक्टर से अवस्य ही सलाह ले ले-

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कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

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बालक में अन्य संस्कारो की तरह कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)को भी आवश्यक माना ग़या है आज अब धीरे-धीरे आधुनिक युग में लोग इस संस्कार से विमुख होते जा रहे है प्राचीन काल मे कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)की इतनी महत्ता मानीं गयीं है कि जिस व्यक्ति ने कान नहीं छिदवाये उसे शास्त्रोनुसार श्राद् का अधिकारी ही नहीं माना गया है इसके अंतर्गत बालक या बालिका के कान छिदवाये जाते थे जिससे पुरुष को पूर्ण पुरुषत्व और स्त्रीं को पुर्ण स्त्रीत्व प्राप्ति हो इसके लिये कान छिदवाये जाते थे-

कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

बालक के जन्म के छः मास से लेकर सोलह मास अथवा तीन-पांच-सात विषम वर्षो में या अपने कुल के रीति रिवाजों अनुसार कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)करवाना आवयशक माना गया है लेकिन कान क्यो छेदा जाता था ? आखिर यह प्रथा क्यो थी ?सभी जानते है कि जब भी कोई प्रथा जन्म लेती है उसके पीछे कोई ना कोई मूल कारण अवश्य ही होता है फिर चाहे वह आस्था हो धर्म हो या फ़िर विज्ञान हो इस विषय पर लोगो के विचार भी अलग-अलग होते है बस इसमें अपना-अपना विश्वास निहित होता है-

कारण(Reason)और मत-


1- प्राचीन काल मे हमारी चिकित्सा पद्धति इतनी विकसित नही थीं जिस्के काऱण बच्चोँ को बहुत से रोग हुआ करते थे तथा इन रोगों से असमय बालकों की अकाल मृत्यु हो जाया करती थी और तब शिक्षा का विकसित अभाव था अशिक्षित लोग अकाल मृत्यु को लोग दानवीय शक्ति समझते थे उनका मानना था कि धातु से दानवीय शक्ति दूर रहतीं है अतः वे अपने बच्चो के कान छिदवाकर धातु से बनीं कोई वस्तु पहना देते थे आज भी देखने मे आता है कि छोटे बच्चो के पास लोहे का छोटा चाकू रख दिया जाता है या फिर उनके गले मे पहना दिया जाता है मान्यता ये है कि इससें बुरी नज़र से उनकी बच्चो कि रक्षा होती है-

2- कुछ लोगों के मतानुसार सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड से प्रकृति और प्रकृति से मानव का जन्म हुआ था परन्तु उसका मस्तिष्क आज की तरह इतना विकसित नहीं था वह प्राक़ृतिक आपदाओं को अपने कुल देवताओं का प्रकोप मानता था और उन्हे प्रसन्न करने के लिये नर बलि दिया करता था और अबोध् बालक इसके शिकार हुआ करते थे परन्तु शर्त यह होती थी की जिसकी बलि दी जानी है उसका अंग भंग नहीं होना चाहिये और ना न ही कोई कट का निशान होना चहिये ये भी परम-आवश्यक था अंत: माता-पिता अपने बच्चों को नर बलि से बचाने के लिये उनके कान छिदवा देते थे जिससे उन्हे बलि के अपात्र माना जाये और उनकी बलि न दी जा सके-

3- एक अन्य मत के अनुसार इसे स्वास्थ्य कि द्रष्टि से भी उपयोगी माना गया है इस मत के अनुसार कान छेदने से स्वस्थ्य की रक्षा होती है समुंदर किनारे बसीं अनेक प्रजातिया ऐसा मानती थी कि कान छेदने से उनके देख़ने की शक्ति बढ़ जाती है इसलीये मछुआरे अपनें बच्चो के कान छेद दिया करते थे ताकि उनके देखने की शक्ति तीव्र हो जाये और दूर तक देख सके-

4- एक मत के अनुसार एक्यूपंक्चर विद्या पांच हज़ार साल से भी पुरानी है इस पद्धति मे शरीर के विभिन्न अंगो पर सुई चुभोकर रोग उपचार तथा स्वास्थ के अन्य रोगों का उपचार किया जाता था  उस समय जड़ी बूटियो का प्रयोग सीमित था तथा महिलाओं मे गर्भ के समय और प्रसव के बाद की जागरुकता न होने के कारण बच्चों मे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती थी तथा वो जल्दी बीमार हो  जाते थे तब कान छेदन से उनक़ी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती थी तथा वो अकाल मृत्यू से बच जाते थे-

5- आज कई देशो मे तथा अनेक जन-जातियों मे एव कई वर्गो मे कान छिदवाने कि परंम्परा है कई लोग तो फैशन या सून्दर दिखने के लिये भी कान छिदवाते है और आजकल तो लोग कान के साथ साथ नाक जीभ होठ नाभि आदि भीं छिदवाते  है इस बारे मे आम आदमी कि यह जिज्ञासा रहती है कि आखिर कान ही क्यो छिदवाते है चूँकि कान की त्वचा अति मुलायाम होती है और ये हमारी पंच ज्ञानेन्द्रियों मे से एक है इसके छेदन से एकाग्रता तथा मानसिक एव आध्यात्मिक विकास होता है तथा स्मरण शक्ति भी तीव्र होती है और बच्चोँ मे ये गुण परिपूर्ण रहे इसलिए कान के लोर मे छेद कियां जाता है ये भी सत्य है कि कान छेदन से फेफडे,हृदय,सिर,मत्था,गलां,हाँथ पैर अंगुलियां आदि का ऊपचार अति प्रभावी पाया ग़या है-

6- कान के चारो और तेल से या सूखे मालिश करना कान को मरोड़ना खीचना,नहाते समय कान के चारोँ तरफ रगड़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और देखने कि क्षमता बढ़ती है तथा निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है और दिमाग शक्तिशाली बनता है नींद न आना आदि में कर्ण छेदन अति उपयोगी है-

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Upcharऔर प्रयोग-

23 मार्च 2017

क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है

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हिन्दू धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन(Annprasan)संस्कार सप्तम संस्कार है इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है अभी तक तो आपका शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त हो रहा था लेकिन अब आगे से स्वयं शिशु को अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होता है यही प्रकृति का नियम है इसलिए अन्नप्रासन(Annprasan)संस्कार का विधान बनाया गया है-

क्या आप जानते है कि अन्नप्राशन क्या है


क्या है अन्नप्राशन-



1- अन्नप्रासन(Annprasan)संस्कार लगभग पांच माह की आयु होने पर शिशु को अन्न ग्रहण कराकर उसके शारीरिक विकास को प्रशस्त करना ही एक मात्र उद्देश्य होता है इस कार्य को शुभ दिन तथा नक्षत्र चौघडि़यां आदि देखकर मुहुर्त के अनुसार किया जाता है-

2- माता के गर्भ में मलिन भोजन के जो दोष शिशु में आ जाते हैं उनके निवारण और शिशु को शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन-संस्कार कहा जाता है-

3- अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है जब शिशु के दाँत उगने लगे तब हमें जानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है तब बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है तब इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है-

4- बालक को उबटन स्नान के बाद नए-नए वस्त्र पहनाकर शुद्ध साफ बर्तन में खीर बनाकर चांदी की चम्मच कटोरी में रखकर सर्वप्रथम घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य के द्वारा बालक को खीर खिलानी चाहिये इसके पश्चात सभी सदस्य शिशु को खीर चटाते है-

5- सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार अन्न के संस्कार का प्रभाव व्यक्ति के मानस पर स्वभाव पर भी पड़ता है आहार स्वास्थ्यप्रद होने के साथ पवित्र, संस्कार युक्त हो इसके लिए भी अभिभावकों, परिजनों को जागरूक करना जरूरी होता है अन्न को व्यसन के रूप में नहीं औषधि और प्रसाद के रूप में लिया जाय-इस संकल्प के साथ अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है-

6- अन्नप्राशन के लिए प्रयुक्त होने वाली कटोरी तथा चम्मच और चाटने के लिए चाँदी का उपकरण हो सके तो अति उत्तम है-तथा अलग पात्र में बनी हुई चावल या सूजी (रवा) की खीर, शहद, घी, तुलसीदल तथा गंगाजल-  ये पाँच वस्तुएँ अन्नप्राशन तैयार रखनी चाहिए-शुद्ध आहार से शरीर में सत्व गुण बढाता है-

7- अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता है बल्कि मन, बुद्धि, तेज़ व आत्मा का भी पोषण होता है इसी कारण अन्नप्राशन को संस्कार रुप में स्वीकार करके शुद्ध, सात्त्विक व पौष्टिक अन्न को ही जीवन में लेने का व्रत करने हेतु अन्नप्राशन-संस्कार संपन्न किया जाता है-

8- अन्नप्राशन का उद्देश्य बालक को तेजस्वी, बलशाली एवं मेधावी बनाना है इसलिए बालक को धृतयुक्त भात या दही, शहद और धृत तीनों को मिलाकर अन्नप्राशन करने का का विधान है-

9- बालक को ऐसा अन्न दिया जाना चाहिए जो पचाने में आसान व बल प्रदान करने वाला हो-

10- छ से सात माह के शिशु के दांत निकलने लगते हैं और शिशु की पाचन क्रिया प्रबल होने लगती है ऐसे में जैसा शिशु अन्न खाना वह प्रारंभ करता है उसी के अनुरुप उसका तन-मन बनता है-

11- मनुष्य के विचार, भावना, आकांक्षा एवं अंतरात्मा बहुत कुछ अन्न पर ही निर्भर रहती है और अन्न से ही जीवन तत्व प्राप्त होते हैं जिससे रक्त, मांस आदि बनकर जीवन धारण किए रहने की क्षमता उत्पन्न होती है अन्न ही मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है उसे भगवान् का कृपा-प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए-

अन्न के प्रभाव की रोचक एक कथा-


महाभारत में एक रोचक कथा आती है जब शरशय्या पर पडे भीष्म पितामह पांडवों को कोई उपदेश दे रहे थे कि अचानक द्रौपदी को हंसी आ गई-द्रौपदी के इस व्यवहार से पितामह को बड़ा‌ आश्चर्य हुआ तब उन्होंने द्रौपदी से हंसने का कारण पूछा ?

द्रौपदी ने विनम्रता से कहा-आपके उपदेशों में धर्म का मर्म छिपा है पितामह! आप हमें कितनी अच्छी-अच्छी ज्ञान की बातें बता रहे हैं लेकिन यह सब सुनकर मुझे कौरवों की उस सभा की याद हो आई है जिसमें वे मेरे वस्त्र उतारने का प्रयास कर रहे थे और तब मैं चीख-चीखकर न्याय की भीख मांग रही थी लेकिन आप वहां पर होने के बाद भी मौन रहकर उन अधर्मियों का प्रतिवाद नहीं कर रहे थे-आप जैसे धर्मात्मा उस समय क्यों चुप रहें? आपने दुर्योधन को क्यों नहीं समझाया था यहीं सोचकर मुझे हंसी आ गई-

इस पर भीष्म पितामह गंभीर होकर बोले-बेटी ! उस समय मैं दुर्योधन का अन्न खाता था उसी से मेरा रक्त बनता था और जैसा कुत्सित स्वभाव दुर्योधन का है वही असर उसका दिया अन्न खाने से मेरे मन और बुद्धि पर पडा-किंतु अब अर्जुन के बाणों ने पाप के अन्न से बने रक्त को मेरे तन से बाहर निकाल दिया है और मेरी भावनाएं शुद्ध हो गई हैं इसलिए अब मैं वहीं कह रहा हूं जो धर्म के अनुकूल और न्यायोचित है-

देखे-  कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

Upcharऔर प्रयोग-

22 मार्च 2017

लहसुन को सेवन-योग्य क्यों नहीं मानते हैं

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आपके घरों या जान-पहचान वालो में कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो प्याज या लहसुन(Garlic)नहीं खाते होंगे लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि ऐसा क्यों हैं आपने अपने घर में दादी-नानी या किसी अन्य बुज़ुर्ग से जो इन्हें ना खाते हों कभी जानने का प्रयास किया है-
लहसुन को सेवन-योग्य क्यों नहीं मानते हैं

यदि आप उनसे इस बारे में पूछेंगे तो अधिकतर लोगों का शायद यहीं जवाब होगा कि अब हमसे यह मत पूछो कि क्यों नहीं खाते है बस जैसा हमारे बड़ो-बुजुर्गों ने हमें बता दिया वो हम कर रहे हैं क्युकि वो लहसुन(Garlic)प्याज(Onion)नहीं खाते थे इसलिए हम भी नहीं खाते है जी हाँ-ये सच है कि बहुत से धर्मों को मानने वाले लोग प्याज और लहसुन खाना पसंद नहीं करते है लेकिन लहसुन और प्याज नहीं खाने के पीछे असल वजह क्या है यह आपको शायद कम ही लोग बता पाएंगे-

लहसुन न खाने का धार्मिक कारण-


प्याज व लहसुन जैसी सब्ज़िया जिनमें काफी रोग प्रतिरोधक गुण होते हैं लेकिन लोगो द्वारा लहसुन खाने योग्य नहीं माने जाने के पीछे जो कारण निकल कर आए है वो धार्मिक भी हैं और पौराणिक भी और वैज्ञानिक भी हैं-सिर्फ वैष्णव धर्म में ही नहीं बल्कि और भी कई धर्मों में लहसुन(Garlic)प्याज(Onion) को शैतानी गुणों वाली, शैतानी दुर्गंध वाली, गंदी और प्रदूषित सब्ज़िया माना जाता है- 

प्राचीन मिस्त्र के पुरोहित प्याज और लहसुन  को नहीं खाते थे चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी इन सब्ज़ियों को खाना पसंद नहीं करते हैं और हमारे वेदों में भी बताया गया है कि प्याज और लहसुन जैसी सब्ज़ियां प्रकृति प्रदत्त भावनाओं में सबसे निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तजेना और अज्ञानता को बढ़ावा देकर किसी व्यक्ति द्वारा भगवद् या लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं तथा ये व्यक्ति की चेतना को भी प्रभावित करती हैं इसलिए इन्हें नहीं खाना चाहिेए-

भगवान कृष्ण के उपासक भी लहसुन(Garlic)प्याज(Onion) नहीं खाते हैं क्योंकि यह लोग वहीं सब्ज़िया खाते हैं जो कृष्ण को अर्पित की जा सकती हैं और चूंकि प्याज और लहसुन कभी भी कृष्ण को अर्पण नहीं किए जाते हैं इसलिए कृष्ण भक्त इन्हें बिलकुल भी नहीं खाते हैं-

प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे तभी दो राक्षस राहू और केतू भी वहीं आकर बैठ गए थे भगवान ने उन्हें भी देवता समझकर अमृत की बूंदे दे दीं लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि यह दोनों राक्षस हैं तब भगवान विष्णु ने तुरंत उन दोनों के सिर धड़ से अलग कर दिए और इस समय तक अमृत उनके गले से नीचे नहीं उतर पाया था और चूंकि उनके शरीरों में अमृत नहीं पहुंचा था वो उसी समय ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो गए-लेकिन राहू और केतु के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए दोनों राक्षसो के मुख अमर हो गए(यहीं कारण है कि आज भी राहू और केतू के सिर्फ सिरों को ज़िन्दा माना जाता है)पर भगवान विष्णु द्वारा राहू और केतू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिरों से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे ऐसा माना जाता है-

चूंकि लहसुन(Garlic)प्याज(Onion)अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज़ गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता है और कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मज़बूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार भी राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं-

एक और मत के अनुसार-


इन दोनों सब्जि़यों को मांस के समान माना जाता है इसके पीछे भी एक और कथा प्रचलित है-प्राचीन समय में ऋषि मुनि पूरे ब्रह्मांड के हित के लिए अश्वमेध और गोमेध यज्ञ करते थे जिनमें घोड़े अथवा गायों को टुकड़ों में काट कर यज्ञ में उनकी आहूति दी जाती थी-

यज्ञ पूर्ण होने के बाद यह पशु हष्ट पुष्ट शरीर के साथ फिर से जीवित हो जाते थे-एक बार जब ऐसे ही यज्ञ की तैयारी हो रही थी तो एक ऋषि पत्नी जो की गर्भवती थी उनको मांस खाने की तीव्र इच्छा हुई और कुछ और उपलब्ध ना होने की स्थिति में ऋषिपत्नी ने यज्ञाहूति के लिए रखे गए गाय के टुकड़ो में से एक टुकड़ा बाद में खाने के लिए कुटिया में छिपा लिया-जब ऋषि ने गाय के टुकड़ो की आहूति देकर यज्ञ पूर्ण कर लिया तो अग्नि में से पुनः गाय प्रकट हो गई-पर ऋषि ने देखा की गाय के शरीर के बाएं भाग से एक छोटा सा हिस्सा गायब था

ऋषि ने तुरंत अपनी दिव्य -शक्ति से जान लिया कि उनकी पत्नी ने वह हिस्सा लिया है अब तक उनकी पत्नी भी सब जान चुकी थी इसलिए ऋषि के क्रोध से बचने के लिए उनकी पत्नी ने वह मांस का हिस्सा उठा कर फेंक दिया-लेकिन यज्ञ और मंत्रो के प्रभाव के कारण टुकड़े में जान आ चुकी थी-इसी मांस के टुकड़े की हड्डियों से लहसुन उपजा और मांस से प्याज की उपज हुई है इसलिए वैष्णव अनुयायी प्याज और लहसुन को सामिष भोजन मानते हैं और ग्रहण नहीं करते हैं-

जैन धर्म के मतानुसार-


जैन धर्म को मानने वाले लोग भी प्याज और लहसुन नहीं खाते लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि यह दोनों जड़ें हैं और जैन धर्म में माना जाता है कि अगर आप किसी पौधे के फल, फूल, पत्ती या अन्य भाग को खाओ तो उससे पौधा मरता नहीं है लेकिन चूंकि प्याज और लहसुन जड़े हैं इसलिए इन्हें खाने से पौधे की मृत्यू हो जाती है-

अन्य धर्म के मतानुसार-


तुर्की में भी इन सब्जियों को प्रयोग ना करने के पीछे एक दंतकथा प्रचलित है और कहा जाता है कि जब भगवान ने शैतान को स्वर्ग से बाहर फेंका तो जहां उसका बांया पैर पड़ा वहां से लहसुन और जहां दायां पैर पड़ा वहां से प्याज उगा था-

इसके उत्तेजना और जुनून बढ़ाने वाले गुणों के कारण चीन और जापान में रहने वाले बौद्ध धर्म के लोगों ने कभी इसे अपने धार्मिक रिवाज़ो का हिस्सा नहीं बनाया है जापान के प्राचीन खाने में कभी भी लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता था-

आयुर्वेद में प्याज-लहसुन-


भारत के प्राचीन औषधि विज्ञान आर्युवेद में भोज्य पदार्थो को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है-सात्विक, राजसिक और तामसिक-अच्छाई और सादगी को बढ़ावा देने वाले भोज्य पदार्थ सात्विक और जुनून और उत्तेजना बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ राजसिक और तामसिक यानि अज्ञानता या दुर्गुण बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ होते है-

प्याज और लहसुन राजसिक भोजन के भाग हैं जो लक्ष्य सिद्धि, साधना और भगवद् भक्ति में बाधा डालते हैं इसलिए लोग इन्हें खाना पसंद नहीं करते हैं-

ये भी सच है कि वनस्पति विज्ञान के अनुसार एलियम कुल की ये सब्ज़ियां रोग प्रतिरोधक क्षमता भी देती हैं प्याज जहां गर्मी के लिए अच्छा होता है वहीं लहसुन में अत्यधिक एंटीबायोटिक गुण होते हैं-

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