25 मई 2017

प्रेम का विकसित होना मतलब सेक्स का क्षीण होना है

आप जानते है कि प्रेम(Love)और सेक्स(Sex)ये दो विरोधी चीजे है जब प्रेम बढ़ता है तो सेक्स क्षीण हो जाता है और प्रेम जितना कम होता है उतना सेक्स बढ़ जाता है हो सकता है ये बात सुनने और समझने में आपको अटपटी लगे लेकिन अपने जीवन में बिना तर्क के भी अनुभव का प्रयास करे जिस व्यक्ति में जितना जादा प्रेम पुलकित होगा उसका सेक्स यानि की काम वासना कम होगी-

प्रेम का विकसित होना मतलब सेक्स का क्षीण होना है

जब मनुष्य प्रेम से परिपूर्ण होता जाता है उसके भीतर सेक्स जैसी चीज नहीं रह जाती है और अगर आपके अंदर प्रेम दिखावा मात्र है यानि छलावा है तो फिर आपके भीतर सेक्स का उदय होना संभव है वास्तविक सत्य यही है कि सेक्स जहाँ है वहां प्रेम का स्थान नहीं और जहाँ प्रेम है सेक्स की इक्छा कदापि नहीं नहीं हो सकती है भगवान् कृष्ण और गोपी का वास्तविक प्रेम इसका एक अदभुत उदाहरण है-

सेक्स की शक्ति को परिवर्तन करना है तो उदात्तीकरण से होता है आप चाहते है कि सेक्स से मुक्त हो तो सेक्स को दबाने से कुछ भी नहीं होने वाला है क्युकि किसी भी चीज को दबाना वो और प्रखर हो उठता है और जादा पागल हो सकते है दुनिया में जितने पागल हैं उसमें से सौ में से नब्बे संख्या उन लोगों की है जिन्होंने सेक्स की शक्ति को दबाने की कोशिश की है-

जो व्यक्ति अनायास ही अपने सेक्स को दबाता है तो दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है अनेक बीमारियां पैदा करता है तथा अनेक मानसिक रोग पैदा करता है मतलब ये है कि सेक्स को दबाने की जो भी चेष्टा है वह भी एक पागलपन है-

कई योगी योग साधना से सेक्स को दबाने का अथक प्रयास में और बिना गुरु सानिध्य के पागल होते देखे गए है क्युकि वो नहीं समझते है कि सेक्स को दबाया नहीं जाता है अपनी सेक्स की शक्ति को उर्ध्वामुखी करके जो शक्ति प्राप्त होती है वो धीरे से प्रेम के प्रकाश में परिणित हो जाती है वो ही आपका प्रेम का प्रकाश बन जाती है क्युकि प्रेम सेक्स का क्रिएटिव उपयोग है और उसका सृजनात्मक उपयोग है इसलिए आप प्रेम को विस्तीर्ण करें और जीवन को प्रेम से भरें-

छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं तो मां उनको प्रेम देती है फिर वे बड़े होते हैं और वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं तो परिवार भी उनको प्रेम देता है फिर वे और बड़े होते हैं अगर वे पति हुए तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं अगर वे पत्नियां हुईं  तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं और जो भी प्रेम चाहता है वह दुख झेलता है क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता है प्रेम केवल किया जाता है चाहने में पक्का नहीं है मिलेगा या नहीं मिलेगा और जिससे तुम चाह रहे हो ये जरुरी भी नहीं कि वह भी तुमसे चाहेगा तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी तब तो दोनों भिखारी मिल जाएंगे और एक दूसरे से प्रेम की भीख मांगेंगे-

दुनिया में जितना पति-पत्नियों का संघर्ष है उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं लेकिन सत्य ये भी है कि देने में कोई भी समर्थ नहीं है बस एक दूसरे से ये कहते हुए बिलकुल भी नहीं थकते है कि हम आपको बहुत दिलो जान से प्यार करते हैं अगर वास्तविक प्रेम कर लेगें तो फिर आपके बीच सेक्स का कोई स्थान ही नहीं रह जाएगा इस लिए बस एक दूसरे को बस भरोषा ही केवल दिए जा रहे है-

प्रेम करना और प्रेम चाहना ये दोनों बड़ी अलग बातें हैं हममें से अधिक लोग प्रेम की पढ़ाई में बच्चे ही रहकर मर जाते हैं क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है लेकिन प्रेम करना बहुत बड़ी अदभुत बात है और प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है-

आजकल तो दुनिया में दाम्पत्य जीवन एक नर्क बना हुआ है क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं लेकिन देना कोई भी जानता नहीं है बस सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है और कितना ही परिवर्तन हो किसी तरह के विवाह हों या किसी तरह की समाज व्यवस्था बने लेकिन जब तक वो ये नहीं समझेगें कि प्रेम दिया जाता है जबकि प्रेम मांगा नहीं जाता है और सिर्फ और सिर्फ दिया जाता है-

जबकि प्रेम वह प्रसाद है उसका कोई मूल्य नहीं है प्रेम दिया जाता है तब जो मिलता है वह ही उसका प्रसाद है वह उसका मूल्य नहीं है यदि वापस कुछ नहीं मिलेगा तो भी देने वाले का आनंद ही होगा कि उसने दिया है- 

अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें तो जीवन स्वर्ग बन सकता है और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे तो सच माने उतना ही अदभुत जगत की व्यवस्था है उन्हें प्रेम मिलेगा और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे जितना वे प्रेम देंगे हाँ उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा-

एक उदहारण देकर एक सत्य कथा से समझने का प्रयास करे तो शायद ही आपको समझ आ जाए गांधी जी एक बार लंका गए और उनके साथ उनकी पत्नी कस्तूरबा भी गई तो वहां जो व्यक्ति था जिसने उनका परिचय दिया पहली सभा में चूँकि उसने समझा कि माँ आयी हैं साथ और शायद ये गांधी जी की मां होंगी तो उसने गांधी जी का परिचय देते हुए कहा कियह बड़े सौभाग्य की बात है कि गांधी जी भी आए हैं और उनकी मां भी आयी हुई हैं-

ये सुन कर कस्तूरबा तो बहुत हैरान हो गयीं और गांधी जी के सेक्रेटरी जो साथ थे वे भी बहुत घबड़ा गए कि भूल तो उनकी है उनको परिचय देने वाले को पहले से बताना चाहिए था कि कौन साथ में है तो वे बड़े घबड़ा गए कि शायद बापू डांटेंगे और शायद कहेंगे कि ‘यह क्या भद्दी बात करवायी-लेकिन गांधी जी ने जो बात कही-वह बड़ी ही अदभुत थी-

उन्होंने कहा कि ‘मेरे इन भाई ने मेरा जो परिचय दिया है उसमें भूल से एक सच्ची बात कह दी है कि कुछ वर्षों से कस्तूरबा मेरी पत्नी नहीं है मेरी मां हो गयी है और वास्तव में सच्चा संन्यासी वह है जिसकी एक दिन पत्नी मां हो जाए न कि पत्नी को छोड़कर भाग जाने वाला नहीं और सच्ची संन्यासिनी वह है जो एक दिन अपने पति को अपने पुत्र की तरह अनुभव कर पाए- 

पुराने ऋषि सूत्रों में एक अदभुत बात कही गयी है पुराने काल में ऋषि कभी आशीर्वाद देता था कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए’ वास्तव में ये बड़ी अदभुत बात थी ऋषि ये आशीर्वाद देते थे वधु को विवाह करते वक्त कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, तुम्हारा ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए’ यह अदभुत कौम थी और अदभुत विचार थे और इसके पीछे एक बड़ा रहस्य था-

अगर पति और पत्नी में प्रेम बढ़ेगा तो वे पति-पत्नी नहीं रह जाएंगे अर्थात उनके संबंध कुछ और हो जाएंगे और उनके पास से सेक्स विलीन हो जाएगा और फिर वे संबंध सात्विक प्रेम के होंगे चूँकि जब तक सेक्स है तब तक शोषण है

सेक्स वास्तविक में एक प्रकार का शोषण है और जिसको हम प्रेम करते हैं फिर उसका शोषण कैसे कर सकते हैं? सेक्स एक व्यक्ति का एक जीवित व्यक्ति का अत्यंत गर्हित और निम्न उपयोग है अगर हम उसे प्रेम कर सकते हैं तो हम उसके साथ ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं? एक जीवित व्यक्ति का हम ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं अगर हम उसे प्रेम करते हैं? जितना प्रेम गहरा होगा वह उपयोग विलीन हो जाएगा और जितना प्रेम कम होगा वह उपयोग और शोषण उतना ज्यादा हो जाएगा-

सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति कैसे बने कि सेक्स बड़ी अदभुत शक्ति है और शायद इस जमीन पर सेक्स से बड़ी कोई शक्ति नहीं है मनुष्य के जीवन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा जिस चक्र पर घूमता है वह सेक्स है वह परमात्मा नहीं है और वे लोग तो बहुत कम हैं जिनका जीवन परमात्मा की परिधि पर घूमता है अधिकतर लोग सेक्स के केंद्र पर घूमते और जीवित रहते हैं हाँ शायद अज्ञानता वश वो सेक्स को ही प्रेम समझ बैठे है-

जबकि सेक्स सबसे बड़ी शक्ति है यानि अगर आप ठीक से समझें तो मनुष्य के भीतर सेक्स के अतिरिक्त और शक्ति ही क्या है जो उसे गतिमान करती है परिचालित करती है इस सेक्स की शक्ति को ही वास्तविक और सात्विक प्रेम में परिवर्तित किया जा सकता है और यही शक्ति परिवर्तित होकर परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग बन जाती है-लेकिन ये भी सत्य है कि इसके लिए आपको एक सद्गुरु की आवश्यकता होगी जो अब इस संसार में नाम मात्र ही है या आप ये समझ लीजिये आप उनसे कोसों दूर है क्यूंकि माया मोह लोभ लालच से सद्गुरु की प्राप्ति संभव नहीं है जो आपके अंदर के सेक्स को उन्मुक्त अवस्था में लाकर परमात्मा के दर्शन करा सकें-

गुरु चरण वन्दनं-

Upcharऔर प्रयोग-

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