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आज का बौद्धिक स्तर क्या है

पुरातन काल में शिक्षा का रुप ही बिलकुल ही अलग था विद्यार्थी को हमारा समाज पढ़ाने के लिए साधन देता था और तब उसका परिवार से संबंध नही रहता था तथा पढ़ते समय वह समाज का रहता था और वह घर-घर जाकर माता भिक्षाम देहि का उच्चारण करता था और उससे उसका तथा गुरु जी के घर का पालन पोषण होता था तब फलस्वरुप उसे समाज का वास्तविक ज्ञान होता था वह समाज का कष्ट समझता था और ज्ञानार्जन के बाद जब वह सेवा में आता था तब उसने समाज में रहकर जो कष्ट देखे या महसूस किये होते थे उच्चपद आसीन होने के बाद भी उसे महसूस होते थे या कहें कि सदवुद्धि का उदय होता था-

आज का बौद्धिक स्तर क्या है

लेकिन आज का परिवेश बदल गया है आजकल बिलकुल भी सदवुद्धि वाले लोग नही हैं तो यह गलत बात ही होगी किन्तु आज के समय में उनकी संख्या बहुत ही कम है या आप यह कहे कि किसी भी क्षेत्र में भी वड़े ही कम मिल सकेंगें आज अधिकांशतः आजकल के शिक्षित ऐसे हैं जो विनम्र,सरल और विद्यावान होने की अपेक्षा इसके उल्टे विचारों पर ही चल रहैं  हैं ये लोग विना पड़े लिखे लोगो की अपेक्षा अधिक चालाक,अहंकारी,पाखण्डी, बेईमान व दूसरों को शोषित करने की व मूर्ख बनाने की  कला में निपुण होते जा रहे हैं-

आज के प्राणियों की वोद्धिक स्तर पर  तुलना करने पर हम उसे हम दो भागों में बाँट सकते है इन प्रकारों में एक प्रकार के  प्राणीं वुद्धिमान और दूसरे प्रकार के  मूर्ख कहलाते हैं किन्तु बुद्धिमान  भी  दो प्रकार के होते हैं एक बुद्धिमान व दूसरे सदवु्द्धि मान और बुद्धि जव केवल स्वार्थपूरक हो तो यह चालाकी कहलाती है किन्तु जव यही समझदारी के साथ प्रयोग हो तो यही सदवुद्धि कहलाती है-

आजकल जमाना चालाकी वाला होने के कारण ही दुनिया में पाप व अनाचार वढ़ रहा है क्योंकि जो शिक्षित होता जा रहा है वह चालाकी में दम भर रहा है चूँकि शिक्षा का रुप अब वदल रहा है इसी कारण जैसी शिक्षा मिल रही है वह वुद्धिवाद बढ़ा रही है फलस्वरुप मानव अपने ही हाथों प्रकृति का दोहन न करके उसे समाप्त करने पर तुला है-

इसी के चलते नागरिकता का लोप होता जा रहा है प्रत्येक व्यक्ति किसी भी प्रकार अपना लाभ करने के लिए देश का समाज का कितना भी नुकसान करने पर उतारू है अगर मेरा एक रुपये का काम बन रहा है चाहें दुसरे का 10000 या अधिक का ही नुकसान क्यों न हो मै अपना फायदा लेने के लिए उसका नुकसान कर दूँगा ऐसी भावनाए जव लोगों में उदित होने लगे तो समझों समाज के विनाश का समय आ गया है औऱ ऐसा ही आजकल हो रहा है-

ग्रंथो में भोजन की सात्विकता की महिमा का वर्णन किया है और खादय पदार्थो व कार्यों का सत्, रज् व तम में बँटवारा करके मानव को कुछ भी खाने व करने से पहले सचेत किया है और हर बार आप यह पाऐंगे कि यह विचार विल्कुल सही ही कह रहें हैं आज कल का खान पान व्यक्ति न चाहते हुये भी कई चीजों का देखने दिखाने के चक्कर में गलत का सेवन कर लेता है जिसका प्रभाव या तो रोगों के रुप में खुद को छेलना पड़ता है या फिर समाज को उसका प्रभाव दिखाई देता है -

वुद्धि यदि सतोगुणी नही है तो आपको सफलता व सांसारिक व्यवहार कुशलता तो मिल सकती है किन्तु साथ में उलझन ,दिखावा ,तिकड़म-वाजी ,तनाव व छल-कपट भी प्रसाद रुप में प्राप्त होगें ही जवकि सदवुद्धि समझदारी, दायित्व-वोध, सुकर्म, ईमानदारी, तत्व-ज्ञान, आध्यात्मिक शक्ति, मन की शक्ति ,शान्ति और परमात्मा के प्रति प्रेम पाने की प्रेरणा भी देती है-

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