28 जुलाई 2017

मन्त्र(Mantra)साधना के लिए नियम क्या हैं

हमने आपको अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि मन्त्र(Mantra)जप में सफलता क्यों नहीं मिलती है इस पोस्ट में आपको मन्त्र साधना के लिए क्या नियम होते है इस पर कुछ प्रकाश डालेगें हर देवता को प्रसन्न करने का एक मन्त्र होता है और मंत्र जप का मूल भाव होता है मनन करना यदि सही नियम से जप नहीं किया जाए तो भी मन्त्र का कोई फल नहीं मिलता है-

मन्त्र(Mantra)साधना के लिए नियम क्या हैं

शास्त्रों के मुताबिक मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए इसके साथ ही एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है इसके बिना मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है आइये आपको हम बताते है कि मन्त्र जप के लिए मुख्य नियम क्या है जिनका पालन करना आवश्यक होता है-गुरु मंत्र हो या किसी भी देव मंत्र और उससे मनचाहे कार्य सिद्ध करने के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं-

मन्त्र(Mantra)जप के नियम-


1- सबसे पहले आपको मन्त्र जप के लिए सही वक्त का चयन आवश्यक है इसके लिए ब्रह्ममूर्हुत यानी तकरीबन सुबह चार बजे से पांच बजे या सूर्योदय से पहले का समय श्रेष्ठ माना जाता है प्रदोष काल यानी दिन का ढलना और रात्रि के आगमन का समय भी मंत्र जप के लिए उचित माना गया है-यह वक्त भी साध न पाएं तो सोने से पहले का समय भी चुना जा सकता है-स्थान अच्छा हवादार और शांत होना चाहिए-

2- मंत्रों का पूरा लाभ पाने के लिए जप के दौरान सही मुद्रा या आसन में बैठना भी बहुत जरूरी है इसके लिए पद्मासन मंत्र जप के लिए श्रेष्ठ होता है इसके बाद वीरासन और सिद्धासन या वज्रासन को प्रभावी माना जाता है-

3- मंत्र जप प्रतिदिन नियत समय पर ही करें एक बार मंत्र जप शुरु करने के बाद बार-बार स्थान न बदलें एक ही स्थान नियत कर लें-अगर आप गौशाला, नहर या नदी के तट पर, या किस देवालय में और या फिर किसी महा गुरु के सानिध्य में जप करें तो जप का फल लाखों गुना बढ़ जाता है-

4- मंत्र जप में तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन या स्फटिक की 108 दानों की माला का उपयोग करें यह प्रभावकारी मानी गई है और माता बगुलामुखी की साधना में हल्दी की माला का ही प्रयोग करें-

5- किसी विशेष जप के संकल्प लेने के बाद निरंतर उसी मंत्र का जप करना चाहिए जप अनुष्ठान के लिए कितना जप प्रतिदिन करना चाहिये और कितने दिनों तक करना चहिये ये सबकुछ प्रत्येक मंत्र पर अलग अलग आधारित होता है या फिर आपके इष्ट देव का मंत्र पर अधारित होता है क्योंकि सबके इष्टदेव अलग अलग होते है तथा मंत्र जप के लिए कच्ची जमीन, लकड़ी की चौकी, सूती या चटाई अथवा चटाई के आसन पर बैठना श्रेष्ठ है सिंथेटिक आसन पर बैठकर मंत्र जप से बचें-

6- मंत्र जप दिन में करें तो अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें और अगर रात्रि में कर रहे हैं तो मुंह उत्तर दिशा में रखें तथा मंत्र जप के लिए एकांत और शांत स्थान चुनें जहाँ कोई व्यवधान न हो-

7- मंत्रों का उच्चारण करते समय यथा संभव माला दूसरों को न दिखाएं जप गोमुख के अंदर या किसी कपडे से ढंक कर करना चाहिए तथा अपने सिर को भी कपड़े से ढंकना चाहिए जप के बाद माला को कपड़े में ही ढंक कर रक्खे क्युकि जप का फल वातावरण में विचरण करने वाले अद्रश्य शक्तियां ले जाती है-

8- माला का घुमाने के लिए अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करें तथा माला घुमाते समय माला के सुमेरू यानी सिर को पार नहीं करना चाहिए जबकि माला पूरी होने पर फिर से सिर से आरंभ करना चाहिए-

9- अलग-अलग कामना के लिए अलग-अलग प्रकार की माला का उपयोग किया जाता है धन प्राप्ति की इच्छा से मंत्र जप करने के लिए मूंगे की माला, पुत्र पाने की कामना से जप करने पर पुत्रजीव के मनकों की माला और किसी भी तरह की कामना पूर्ति के लिए जप करने पर स्फटिक की माला शत्रु दमन घर कलह के लिए हल्दी माला का उपयोग किया जाता है-

10- साधक बार बार असफलता के बाद भी लगा रहता है तो वो चाहे किसी भी श्रेणी का साधक क्यों न हो अंत में सफलता अवश्य उसके चरण चूमती है इसमें कोई संदेह नहीं है बस साधक को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए-

जप का विधान- 


किसी भी मंत्र का पाठ करना हो तो वो बोलकर ही किया जाता है वो ही सर्वोतम होता है जैसे सुंदरकांड का पाठ इत्यादि, लेकिन मंत्र का जप हमेशा दिल से करना चाहिए मतलब की दिल में जप चलना चाहिए और होंठ और जिव्हा तो हिलनी भी नहीं चाहिए मंत्र के लिये ऐसा ही जप सर्वोतम होता है मंत्र जप हमेशा गोमुखी में रख कर ही जप करना चाहिए आगे जब साधक मन्त्र सिद्ध हो जाता है तो फिर मानसिक जप किसी भी अवस्था में किया जा सकता है इसमें चलते फिरते उठते बैठे किसी भी अवस्था में जप कर सकते हैं-

मंत्र जप अनुष्ठान के दौरान जप अगर त्राटक करते हुए किया जाए तो उस से एकग्रता में चमत्कारिक रूप से बढ़ावा मिलता है त्राटक आप ज्योत जलाकर भी कर सकते है अथवा जिस भी देवी देवता का आपने चित्र या मूर्ति स्थापित की है उसको देखते हुए भी कर सकते है-

अगर एक बार आप अपने इष्ट देव को या इष्ट मंत्र को सिद्ध कर लेतें है तो बार बार दुसरे मंत्र आपको सिद्ध करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि एक साधे सब सधे और सब साधे सब जाए-

सबसे पहली बात मंत्र चाहे कैसा भी हो उस पर पूर्ण विस्वास करो अगर आपकी पूर्ण श्रधा या विस्वास है तो परिणाम भी शत प्रतिशत पूर्ण ही आएगा मन्त्र जप अथार्थ किसी पवित्र शब्दों की पुनरावर्ती करना है इसमें क्या है की आप जप करते करते उस मंत्र के अर्थ में तल्लीन होते जायेंगे इससे कम से कम जप में जादा से जादा लाभ मिलेगा-


Upcharऔर प्रयोग-

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