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प्रेम(Love)की स्पस्ट व्याख्या क्या है

आज मैं आप सब को प्रेम(Love)की व्याख्या करती हूँ प्रेम-नफरत ' ईर्ष्या ' द्वेष का विरोधी है और भक्ति का एक रूप है चूँकि आज प्रेम का निम्न  स्तर पर इस्तेमाल होने से उसकी सुगंध दुर्गंध मे बदल गई हैं प्रेम की ताकत उसकी कमजोरी बन गई है इसलिए अब प्रेम का जादू बेअसर हो गया है आज प्रेम प्रार्थना बनाने की बजाय वासना बन कर रह गई हैं अब प्रेम का इजहार दूषित नजरों से देखा जाने लगा है इसलिए प्रेम की तड़प अब एक दुःख बनकर रह गई जो आपके लिए महाआनंद सकती थीं-

प्रेम(Love)की स्पस्ट व्याख्या क्या है


प्रेम(Love)की अग्नि शीतल अग्नि न बनकर बल्कि नरक की आग  बन गई आज प्रेम का करिश्मा खोखला बनकर रह गया और प्रेम की नगरी पैसों का व्यापार बन गई है प्रेम की गीत मन-भंजन नहीं बना बल्कि आज ये भजन मनोरंजन के साधन बन गए है-

प्रेम का अमृत अंधश्रद्धा की मदिरा और बेहोशी का साधन बन गया जबकि प्रेम का बल जो सेवा बन सकता था आज वह निजी स्वार्थ बन गया है प्रेम(Love)की याद निराकार की ओर ले जाने की बजाय अहंकार की पुष्टि बन गई है और अब प्रेम का अनुभव पूर्णता खो चुका है

आज प्रेम का स्वाद इंद्रियों मे फँस कर रह गया है जो है ध्यान 'ज्ञान' समझ  ' प्रेम (भक्ति) प्रार्थना और छमा नफरत 'ईर्ष्या' द्वेष से मुक्ति पाने के लिए इंसान को प्रेम, भक्ति और छमा का वरदान दिया गया है नफरत अगर रोग है तो छमा इसकी दवा है-

संतों की शिक्षा में प्रेम 'भक्त ' और छमा को हमेशा से महत्व दिया गया है प्रेम ही ईश्वर हैं और ईश्वर ही प्रेम हैं प्रेम में कोई शर्त नहीं होती हैं प्रेम में पहला भाव लेना-देना का आता है कि-मैं प्रेम लूँ जितना मिल सकता हैं उतना लूँ-रिश्ते जब शुरू होते है तब बच्चे माता पिता से कहते है ये चाहिए, वो चाहिए,बच्चे माँगते ही रहते है बच्चे केवल अपने बारे मे सोचते है वे किसी के बारे मे नही सोचते है और मां को भी ये अच्छा लगता हैं क्योंकि उस प्रेम में मोह , आसक्ति और चिपकाव हैं-

जब कोई बहुत प्रेम अभिव्यक्त करता हैं तो अक्सर उस पर कैसे प्रतिक्रिया करना या आभार व्यक्त करना आपको समझ में नहीं आता है सच्चे प्रेम को पाने की क्षमता प्रेम को देने या बाँटने से आती हैं जितना आप अधिक केंद्रित होते हे उतना अपने अनुभव के आधार पर यह समझ पाते हैं कि प्रेम सिर्फ एक भावना नहीं हैं वह आपका शाश्वत आस्तित्व हैं फिर चाहे कितना भी प्रेम किसी भी रूप में अभिव्यक्त किया जाए आप अपने आप को स्वयं में पाते हैं-

प्रेम जो आकर्षण से मिलता हैं वह बस क्षणिक होता हैं क्युकी वह अनभिज्ञ या सम्मोहन की वजय से होता हैं इसमें आपका आकर्षण से जल्दी ही मोह भंग हो जाता हैं और आप ऊब जाते हैं यह प्रेम धीरे धीरे कम होने लगता हैं और भय, अनिश्चिता, असुरक्षा और उदासी सा लाता हैं-

जो प्रेम सुख सुविधा से मिलता हैं वह घनिष्टता लाता हैं परन्तु उसमे कोई जोश, उत्साह , या आनंद नहीं होता हैं उदहारण के लिए आप एक नवीन मित्र की तुलना में अपने पुराने मित्र के साथ अधिक सुविधापूर्ण महसूस करते हैं क्युकी वह आपसे परिचित हैं उपरोक्त दोनों को दिव्य प्रेम पीछे छोड़ देता हैं  यह सदाबहार नवीनतम रहता हैं आप जितना इसके निकट जाएँगे उतना ही इसमें अधिक आकर्षण और गहनता आती हैं इसमें कभी भी उबासी नहीं आती हैं और यह हर किसी को उत्साहित रखता हैं-

सांसारिक प्रेम सागर के जैसा हैं परन्तु सागर की भी सतह होती हैं दिव्य प्रेम आकाश के जैसा हैं जिसकी कोई सीमा नहीं हैं अक्सर लोग पहली नज़र में प्रेम को अनुभव करते हैं फिर जैसे समय गुजरता हैं, यह कम और दूषित हो जाता हैं और घृणा में परिवर्तित होकर गायब हो जाता हैं जब वही प्रेम वृक्ष बन जाता हैं जिसमे ज्ञान की खाद डाली गई हो तो वह प्राचीन प्रेम का रूप लेकर जन्म जन्मांतर साथ रहता हैं वह हमारी स्वयं की चेतना हैं  आप इस वर्तमान शरीर, नाम, स्वरूप और संबंधो से सीमित नहीं रहते हैं-

जब प्रेम को चोट लगती हैं तो वह क्रोध बन जाता हैं जब वह विक्षोभ होता हैं तो वह ईर्ष्या बन जाता हैं,जब उसका प्रवाह होता हैं तो वह करुणा हैं और जब वह प्रज्वलित होता हैं तो वह परमान्द बन जाता हैं प्यार या प्रेम एक अहसास है तथा प्यार अनेक भावनाओं का और रवैयों का मिश्रण है जो पारस्परिक स्नेह से लेकर खुशी की ओर विस्तारित है ये एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है-

प्रेम किसी की दया, भावना और स्नेह प्रस्तुत करने का तरीका भी माना जा सकता है खुद के प्रति, या किसी जानवर के प्रति, या किसी इन्सान के प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने या जताने को प्यार कह सकते हैं तभी तो कहते हैं कि अगर प्यार होता है तो हमारी ज़िन्दगी बदल जाती हैं-

रिश्तेदारी, दोस्ती, रोमानी इच्छा और दिव्य प्रेम-


वैसे आजकल तो प्यार को अक्सर वासना के साथ तुलना की जाती है और पारस्परिक संबध के तौर पर रोमानी अधिस्वर के साथ तोला जाता है, प्यार दोस्ती यानी पक्की दोस्ती से भी तोला जाता हैं आम तौर पर प्यार एक एहसास है जो एक इन्सान दूसरे इन्सान के प्रति महसूस करता है पुराने जमाने में लोग गुप्त रूप से प्यार करते थे और गंधर्व विवाह भी करते थे(गंधर्व विवाह यानी कि दो प्राणियों के अलावा कोई नहीं जाने)

जैसे फुलो की शुरुआत कली से होती हैं जिन्दगी की शुरुआत प्यार से होती हैं और प्यार की शुरुआत अपनों से होती हैं और प्रेम का मतलब वह.भावना जो आपको आप के घर से शुरुआत करनी होती हैं अपनी मां, बहन, भाई, पिता, अपनी दिनचर्या अगर आप ने अपने इन सभी का सम्मान करना नहीं सीखा है तो फिर आप संसार में किसी को भी प्रेम नहीं कर सकते है-प्रेम माँगता हैं और आपको देना है  इसलिए देना सीखें तभी तो आपको भी मिलेगा ये "वास्तविक प्रेम
                      
इसलिए स्बार्थ और प्यार मे उतना ही अन्तर है जितना "काँच और कंचन"

प्रस्तुति-

निर्मला मिश्रा

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