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हमारा आहार ही हमारी औषधि(Medicine)है

जिस प्रकार आयुर्वेद बीमारी का नही किन्तु ये हमारे स्वस्थ जीवन का विज्ञान भी है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद(Ayurveda)एक सम्पूर्ण जीवन शैली भी है आयुर्वेद के मुताबिक इस प्रकृति में मिलने वाली हर चीज को अगर योग्य प्रमाण, योग्य तरीके तथा योग्य अनुपान के साथ विशिष्ट रूप से सिध्द किया जाए तो हर चीज चाहे वो जड़ी-बूटी हो, धान्य हो, फ़ल हो, या पुष्प हो वो हर चीज औषधिय गुणों(Medicinal Properties)से परिपूर्ण होकर हमे स्वास्थ प्रदान करने वाली बनती है-

हमारा आहार ही हमारी औषधि(Medicine)है

पथ्यकर अन्न को विविध प्रक्रिया से सिद्ध करके यानि की पकाकर हम यवागु,  कृशरा, विलेपि, पेया, तथा युष बना सकते है यह अन्ननौषधि ना सिर्फ विविध् रोगों में पथ्यकर है किंतु बहुतांश रोगों में यह स्वयं ही औषधि है-

कोई भी अन्न जैसे कि चावल, जौ, तिल, मूंग, उड़द इत्यादि को 6 गुना पानी में पकाकर गाढ़ा करने से उस अन्नद्रव्य का यवागु सिद्ध होता है शारंगधर संहिता के मुताबिक यवागु को ग्राहिनी, बल्या, तर्पिणी, तथा वातनाशिनी कहा है याने मल को बांधने वाला, बल प्रदान करने वाला, समस्त धातु ओ को पृष्ठ करने वाला तथा वायु नाशक है अतिसार, कोलेरा, ज्यादा उल्टियां होना, अपचन तथा लम्बी बीमारियो से शरीर मे आई कमजोरी में यवागु बहोत लाभदायक है-

कृशरा को आम भाषा मे खिचड़ी कहा जाता है जिसका स्वरूप यवागु से गाढ़ा तथा द्रव रहित होता है आयुर्वेद के हिसाब से कृशरा प्रायः चावल, उड़द, मूंग, तिल तथा अन्य अन्न घटकों को एक साथ पकाकर बनाई जाती है ( कुकर में नही)महर्षि शारंगधर ने कृशरा को सर्व रोगों में पथ्य बताया है कफ रोगों में हल्दी व घी के तड़के के साथ पित्त रोगों में जीरा व घी के तड़के के साथ, तथा वायु रोगों में तिल तेल तथा अजवाइन के तड़के के साथ कृशरा खानी चाहिए-

रोगी की पथ्यावश्यकता के हिसाब से चुने हुए अन्न घटकों को चार गुने पानी मे पकाकर घट्ट बनाकर चिकना हो जाए तब तक पकाए इसे शास्त्रोक्त भाषा मे विलेपि कहा जाता है-महर्षि शारंगधर विलेपि को  बृहनी, तर्पिणी, ह्र्दया, मधुरा, तथा पित्तनाशनी बताये है और यह खास करके चावल से ही बनाई जाती है

विलेपि को मांड भी कहा जाता है विलेपि धातुओं को बढाने वाली, तृप्त करने वाली याने की पेट भरने वाली, ह्र्दय के लिए उत्तम हितकारी, मीठी तथा पित्त नाश करने वाली है इसे प्रायः घी, जीरा, सेंधानमक डालकर पकाया जाता है तथा पेट के रोगों तथा अजीर्ण में छाछ के साथ भी पकाया जाता है और अरुचि जैसे रोगों में इसमें 3 काली मिर्च कूटकर डालने तथा कुछ दिन रोज खाने से पेट की समस्त व्याधियो से मुक्ति मिलती है-

चावल, कुल्थी, नाचनी, गेहूं आदि द्रव्यो से तथा उसमे विविध सब्जियां डालकर 14 गुना पानी मे अच्छे से उबालकर थोड़ा गाढ़ा हो जाए तब पेया ये सिद्ध होता है पेया को शास्त्रों में लघुतरा याने पचने में हल्की, ग्राहिनी याने मल को बांधने वाली तथा धातु पृष्टिका याने शरीर की समस्त धातुओं को पुष्ट करने वाली बताया गया है अतिसार, टीबी,तथा लंबे समय से चलने वाले ज्वर जैसी बीमारियों में पेया विशेष लाभदायक है अमिबैटिस जैसी बीमारी में चावल तथा अदरक की पेया एक उत्तम इलाज है-

पेया से गाढ़ा लेकिन द्रव स्वरूप ही होता है युष खासकरके मूंग, मसूर, चने इत्यादि दालों से तथा सब्जियों व मसाले डालकर बनाई जाती है युष को शास्त्रों में बल्य याने बल देने वाला, कंठय याने कंठ को सुधारने वाला, लघुपाक याने पचने में हल्का तथा कफापह याने कफ को दूर करने वाला कहा गया है कफ के रोगों में मूंग, सहजन तथा अलसी की युष बहुत लाभ दायक है-

कफ, खांसी, गले का इंफेक्शन, ज्वर, बुखार से कमजोरी, जीर्ण ज्वर, मुह का स्वाद ना लगना, कफ से नाक,कान आंखों में परेशानी ऐसी व्याधियों में हरे मूंग की युष को अदरक तथा काली मिर्च डालकर हल्दी व घी डालकर पीने से कफ दूर होता है।

इस तरह शास्त्रोक्त विधि से सिद्ध किये हुए भोजन भी औषधि ही है योग्य तरीके से इसे लेने से स्वास्थ्य लाभ अवश्य मिलता है-

प्रस्तुति-

SJT- Chetana Kanchan Bhagat




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