30 सितंबर 2017

कितनी कारगर है एक्यूप्रेशर चिकित्सा-How Effective is Acupressure Therapy


आजकल के गतिशील युग मे जहां चिकित्सा भी फास्ट  हो गई हो वहा अब विदेशों में एक्यूप्रेशर(Acupressure)जैसी प्राकृतिक और निराप्रद चिकित्सा पद्धतियाँ तेजी से लोकप्रिय हो रही है एलोपैथी से होने वाले अस्थायी लाभ तथा साइड इफेक्टस इसका मुख्य कारण है हजारों रुपये बर्बाद करके भी जब स्वास्थ लाभ नही मिलता तब थक हार कर मनुष्य को प्रकृति की शरण आना ही पड़ता है क्योंकि असली चिकित्सक तो आज भी प्रकृति ही है।

कितनी कारगर है एक्यूप्रेशर चिकित्सा-How Effective is Acupressure Therapy

प्रकृति ने मनुष्य को जब अपने ही पंचतत्वों से बनाया तब प्रकृति ने मानव को जीवनावश्यक हर चीज मूफ्त में प्रदान की है जिसमे भोजन, पानी, प्राणवायु तथा सूर्यप्रकाश शामिल है तथा साथ ही बीमारियो से झुझने के लिए प्रकृति ने मानव शरीर मे कुछ मर्म बिंदु भी बनाए जिसको दबाकर हम आसानी से अपना व दूसरो का इलाज कर सकते है और यह पूरी तरह से असरदार तथा निराप्रद भी है।

हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी दिव्य दृष्टि तथा अंतः स्फुरणा से मनुष्य शरीर मे मर्म बिंदु होने का पता लगाया था तथा कालांतर में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा यह चिकित्सा चीन पहुँची और चायनीज ट्रेडिशनल मेडिसिन में इसे स्थान दिया गया वैसे ही जब यह चिकित्सा जापान पहोंची तो शिआत्सु कहलाई।

लेकिन मूलरूप से यह चिकित्सा भारतीय होने की वजह से सनातन संस्कृति के रहन सहन , वेशभूषा तथा रीति रिवाजों में इसका उल्लेख प्रमुखता से है।

सनातन संस्कृति में एक्यूप्रेशर को दैनिक जीवन मे अपनाकर अपने आप को कई सदियों तक, पीढ़ियों तक स्वस्थ रखा, किन्तु आजकल हम आधुनिक जीवन शैली के चलते पुरानी जीवन-शैली भूलते जा रहे है और यही एक मुख्य कारण है कि आजकल हर सुख सुविधा तथा अच्छी जीवन शैली होने के बावजूद लोग पहले की तुलना में ज्यादा बीमार पड़ रहे है तथा हजारों नही किन्तु लाखो रुपये चिकित्सा पर खर्च कर रहे है।

पुराने जमाने मे पहने जाने वाली वेशभूषा जिसमे पुरुष पगड़ी तथा स्त्री अपने सर को पल्लू या चुनरी से ढकते थे तथा स्त्रियां सर पर गगरी रखकर पानी भर्ती थी यह एक तरह का एक्यूप्रेशर ही था जो सर के सारे पॉइंट्स स्टिम्युलेट करता था जिससे लोग अनिंद्रा, माइग्रेन, डिप्रेशन, कमजोर नजर जैसी समस्याओं से बचे रहते थे।

पहले के जमाने मे स्त्री पुरुष के पहने जाने वाले गहने जिसमे चूड़ियां, मांग टीका, कान की बालियां, नाक में नथनी, गले मे हँसली या हार, कमरबंद, पैरों में बिछिये तथा पायल व बाजू बंद यह सब जगह शरीर के वाइटल ऑर्गन्स के पॉइंट्स आये हुए है जिससे शरीर के हार्मोन्स संतुलित रहते है तथा थाइरॉइड तथा अन्य गायनेकोलॉजिकल समस्याओं से बचाव होता था।

धार्मिक अनुष्ठानों में करने वाली मुद्राएं, तिलक यह भी मन की शांति तथा सद्बुद्धि दायक पॉइंट्स पर ही दबाव करने वाली कृतियां थी तथा भजन में नमस्कार या तालिया बजाना या करताल बजाने से हाथों की हथेलियों पर आने वाले एक्यूप्रेशर पॉइंट्स दबकर शरीर को स्वास्थ्य प्रदान करता है।

मन्दिर में जब कान पकड़कर जब प्रदक्षिणा लगाते है तब हमारा मष्तिष्क 100% कार्यरत होकर स्ट्रेस कम करने वाले व बुद्धि वर्धक हार्मोन्स छोड़ता है यह बात विज्ञानियों ने तक रिसर्च करके साबित की है।


हमारे हाथ की हथेलियों तथा पाव के पंजो में कुछ विशिष्ट स्थानों पर हमारे शरीर के अंगों के प्रतिबिंब बिंदु आए हुए है और जब इन्हें दबाया जाता है तब विशिष्ट अंगों में ब्लॉक या रुकावट हुई ऊर्जा खुल जाती है वहां तक ऊर्जा पहोच कर उस अंग को शक्ति देती है और वो अंग ठीक से कार्यरत होने लगता है।

विशिष्ट स्थानों पर हम हाथों से, पेंसिल से या लकड़ी या धातु की बनी जिम्मी या प्रोब से हल्के मसाज या दबाव दे सकते है।

इन्ही स्थानों पर मैग्नेट्स याने चुम्बक लगाकर या विभिन्न बीज लगाकर या रंग लगाकर भी उपचार किया जाता हैआजकल इलेक्ट्रिक तरंगों से भी उपचार दीया जाता है।

इन बिंदुओ पर मसाज या दबाव करने से धीरे धीरे शरीर की समस्याए ठीक होने लगती है।यह दबाव दिन में 3 बार 5-5 मिनिट के लिए करना चाहिए और अगर पुरानी या गम्भीर समस्या हो तो प्रतिदिन सोने से पहले अवश्य यह उपचार करना चाहिए।

एक्यूप्रेशर सम्पूर्ण निराप्रद और प्राकृतिक चिकित्सा है इसलिए इसे छोटे बच्चों तथा वयोवृद्धों पर भी बेझिझक उपयोग कर सकते है।इसके परिणाम स्थायी होते है इसलिए धैर्य से इसे प्रतिदिन लाभ मिलने तक जरूर करे। 

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