25 फ़रवरी 2018

इंटरनेट का भ्रामक जाल-बीमारियों का डर-बेचफ्लॉवर चिकित्सा


पिछले लेख "इंटरनेट की  भ्रामक दुनिया" में हमने पढा की किस तरह इंटरनेट जैसी सुविधाओ का दुरुपयोग करके कुछ लोग अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए है वही इंटरनेट को ही जानकारी का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत मानकर सर्फिंग करने वाले लोग झूठी व निरूपयोगी चीजे पढ़कर स्वास्थ लाभ लेने की बजाय रुग्ण बनते जा रहे है-

इंटरनेट का भ्रामक जाल-बीमारियों का डर-बेचफ्लॉवर चिकित्सा

निदान एक केस का-


एक ऐसा ही केस हमारे पास उमेश शाह जी का आया था उमेश जी पेशे से इंजीनियर है तथा पांच साल से एंजाइटी व इनसोम्निया (Insomnia) जैसी तकलीफों से पीड़ित थे तथा उसके चलते हमारे पास चिकित्सा हेतु आए थे एलोपैथी दवाई चल रही थी लेकिन उससे उनको कोई खास लाभ होता मालूम पड़ता नही दिखाई दे रहा था सालों एलोपैथी दवाइयां लेकर वो बेजार से हो गए थे-

जब हमने उनसे उनके लक्षण पूछे गए तो उन्होंने जो बताया उससे हमें ज्ञात हुआ कि इंटरनेट का विपरीत प्रभाव इतना गहरा भी होता है हम यह जानकर चकित रह गए उमेश जी को हर बात ऑनलाइन करने की आदत थी जिसमे शॉपिंग, बिलिंग, पढाई तथा मनोरंजन भी शामिल था और यही करते-करते उनको रिश्तेदारों को या दोस्तों को होने वाली बीमारियां तथा उनके बारे में जानकारी लेने की आदत पड़ गई लोग उनसे अपनी बीमारियो के लिए सलाह मंगते या चर्चा करते तो उमेश जी को अपने पर गर्व और लोगो की मदद करने का संतोष मिलने लगा-

लेकिन धीरे-धीरे उनको बीमारियों के बारे में सर्च करने की मानो लत ही लग गई दिन का कुछ समय वह बिना चूके इंटरनेट सर्फिंग करने लगे और धीरे-धीरे उनको पहले बीमारियो से डर लगने लगा कि कही ये बीमारियां मुझे ना हो जाए और इसी डर के चलते वो बीमारियों के लक्षणों तथा उनसे बचाव के बारे में पढ़ने लगे-

यह डर धीरे-धीरे उनके मन पर कब्जा जमाने लगा था बीमारियां होने की आशंका के चलते बार-बार कोई ना कोई टेस्ट करवाना, डॉक्टर्स के चक्कर लगाना तथा हमेशा आशंकित रहना जैसी समस्याए खड़ी हो गई थी-

शुरुआत में परिवारजनों ने भी काफ़ी दरकार तथा समजाने की कोशिश की लेकिन जब कोई परिणाम नही मिला तो परिवार वालो ने भी ध्यान देना छोड़ दिया इन्ही बीमारियो की आशंकाओं के चलते उमेशजी रात को सो भी नही पाते थे ना ही ठीक से खाना खा पाते थे जिसका विपरीत असर उनकी व्यवसायिक जीवन पर तथा सामाजिक जीवन पर भी पड़ने लगा था वो हर एक से कटने लगे थे-संसर्गजन्य रोगों के डर से वो किसी से खुलकर मिलते जुलते भी नही थे मित्रो से भी मिलने को कतराते थे-

यदि जरा सी हिचकी भी आ जाए तो उन्हें लगता कि उनको हार्ट एटेक आ जाएगा, खांसी हुई तो लगता कि टीबी हो गई है, सरदर्द हुआ तो लगता कि ब्रेंटयूमर है और इसी आशंका के चलते वो ढेरो जांच करवाते लेकिन जांच में कुछ भी नही आता था रिपोर्ट्स नॉर्मल ही आती थी उनकी यह समस्या जागरूकता के अभाव के चलते मित्रों व परिवार जनों में मजाक का विषय बनकर रह गई थी-

इंटरनेट का भ्रामक जाल-बीमारियों का डर-बेचफ्लॉवर चिकित्सा

अचानक चक्कर आना, पेनिक एटेक आना, घबराहट होना, बीपी लो या कभी हाई हो जाना, भूख ना लगना, आत्म विश्वास की कमी, सर भारी रहना, कुछ बुरा हो रहा है ऐसी आशंका होना, जैसी तकलीफों के साथ-साथ अनिंद्रा, कमजोरी तथा थकान जैसी समस्याए भी हो गई थी तथा लंबे समय से दवाइयां लेने के बावजूद भी समस्या कम होने की बजाय बढ़ ही रही थी-

बीमारी होने का डर या भ्रम उनको बीमारी ना होने कर बावजूद भी उनके शरीर तथा मन को रुग्ण करता जा रहा था जब वो हमारे पास एंजाइटी व अनिंदा की शिकायत लेकर आए तब हमने उनकी पूरी केस हिस्ट्री जानी तथा उनकी समस्याओं की असली वजह को पकड़ा था उनकी सारी डिटेल्स, रिपोर्ट्स, जीभ तथा अन्य मानसिक लक्षण देखकर हमने उनको बेचफ्लॉवर के 2 कॉम्बिनेशन्स 45 दिन के लिए दिए-

20 दिन के बाद ही उमेश जी को डर, पेनिक एटेक, आत्म-विश्वास की कमी तथा कमजोरी जैसे लक्षणों में इम्प्रूवमेंट लगने लगा तथा उनको नींद भी अच्छी आने लगी- 40वे दिन उन्होंने खुद कहा कि वो पहले से बेहतर महसूस कर रहे है व इन 40 दिनों में उन्होंने डर कर कोई भी टेस्ट नही करवाए है-बाद में उनको उनके लक्षणों के मुताबिक 4 माह तक अपग्रेडेड डोज दिये गए आज उमेश जी पूर्णतः स्वस्थ है व बीमारियों का डर उनके मन से जाता रहा है तथा उनकी बिना जरूरत के इंटरनेट सर्फिंग की आदत भी छूट गई है-

डर व आशंका ऐसे नेगेटिव इमोशन्स है जो धीरे धीरे हमारे मन को कमजोर करने लगते है और परिणाम-स्वरूप हमारे शरीर पर भी इसके विपरीत परिणाम होने लगते है ऐसी मानसिक समस्याए बेहद जटिल तथा मनुष्य के शरीर व मन पर गहरे प्रभाव छोड़ने वाली होती है इसे कतई हल्के में लेना या हास्यास्पद नही मानना चाहिए बल्कि समय रहते योग्य इलाज अवश्य करवाना चाहिए-

प्रस्तुती- Chetana Kanchan Bhagat-Mumbai

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