11 अक्तूबर 2018

आज अवमूल्यन किसका हुआ है

Whose has happened Devaluation Today


लोग कहते है रूपये का अवमूल्यन (Devaluation) कम हुआ है लेकिन उससे जादा तो इन्शान का अव-मूल्यन हुआ जादा लगता है आज परिवर्तन के युग में हम खुद को पिछड़ा दलित ही मानते है क्युकि संस्कार मेरी जन्म घुट्टी में इतना मिला कर पिलाया गया था वर्ना तो आज हम भी आधुनिकता (Modernity) की इस दौड़ में आगे होते-

आज अवमूल्यन किसका हुआ है

पाश्चात्य सभ्यता (Western Culture) का युवा जिस तरह आदी होता जा रहा है उससे तो ये सर्व-सिद्ध हो जाता है कि आने वाले समय में भारतीय संस्कृति (Indian Culture) विलुप्त हो जायेगी अब तो जिसे देखो पाश्चात्य संस्कृति का दीवाना बन चुका है आधुनिकता रोम-रोम में रच -बस रही है लेकिन आधुनिकता सिर्फ फैशन (Fashion) में ही नजर आ रही है इसका वास्तविक अर्थ तो शायद ही किसी-किसी को ही पता होगा-बस भागे जा रहे है इस दौड़ में शामिल होने के लिए-कही भूल वश वो किसी से पीछे न रह जाए-भारत में तो वैसे भी ये कहावत सटीक ही बैठती है "गतानुगति लोक:"अर्थात "नकल करने वाले लोग "

आधुनिकता सिर्फ फैशन में ही नजर आ रही है टी.वी और सिनेमा की फैशन परस्त दुनियां को देख कर लोग वही वस्त्र-वही विचार अपनाते जा रहे है जबकि वास्तविक आधुनिकता है मनुष्य को जागरूक विचारों (Conscious thoughts) से जीना सिखाती है न कि बस सिर्फ फैशन को अपना लिया और बन गए आधुनिक- 

आज युग बदल गया है जितनी ऊँची सैंडल की हील है वो लड़की उतनी ही सुशील है बस फर्क इतना है पहले जितना लम्बा घुंघट होता था वो उतनी सुशील होती थी-आज संस्कृति के बस मूल्य बदल गए है-नारी तो वही है-अब शर्मो-हया सिर्फ किताबो में लिखने की वस्तु होती जा रही है- आजकल हमारी कन्याएं मल्टीनेशनल-ग्लेमर (Multinational-Glamour) की चकाचौंध के आगे पुराने युग की अप्सराएं को भी मात दे रही है आज हर एक कन्या विस्वामित्र के सब्र का बाँध तोड़ने के लिए काफी है -

फैशन के इस दौर में सामजिक मूल्य (Social values) बदलते जा रहे है दफ्तर में आज जो सबसे हसीन है-उसका इन्क्रीमेंट भी उतना अधिक है लड़कों का बुरी तरह अवमूल्यन हुआ है शायद उनका मूल्य डालर के मुकाबले अब चवन्नी सा हो गया है- "कल ही मुझे मेरी बीबी भी कह रही थी आप तो चवन्नी छाप हो" उस दिन से मुझे अपनी कीमत का पता चला है वर्ना मुझे लगता था मै किसी काम का नहीं हूँ-

बस बाकी थी एक कमी वो भी पूरी हो रही है लोग समलैंगिकता (Homosexuality) के पक्षधर है-हो भी क्यों न-आबादी पे अंकुश का इससे अच्छा कोई और रास्ता भी तो नहीं है

वक्त बदल गया है बॉस की बीबी घर पे और बॉस आफिस में ओवर टाइम करते है-स्टेनो बॉस को उल्लू बना रही है तो बॉस स्टेनो को उल्लू बनाता है कमाल का धमाल है बड़ा बुरा हाल है-आधुनिक मार्डन महिलाए घर पर कम आफिस में जादा पाई जाती है-बॉस हैं तो पोपले-पोपले आम लेकिन सर्जरी करा कर कास्मेटिक कराके-लाल टमाटर बनकर गोपियों को रिझाने पे आमादा है-

पहले तो मूंछ के बाल गिरवी रखने से स्वर्णकार भी पैसे ब्याज पे दे देता था आज रखने को मूंछ ही नहीं बची है इसलिए स्वर्णकारों पे भी मंदी का दौर छाया हुआ है-

अमीर पहले वो था जिसके कई बेटे हुआ करते थे आज अमीर वो है जिसकी सबसे जादा काली कमाई है- हम भी ईश्वर से जाके शिकायत करेगे- बस एक बार नेता बना देना-भले पांच साल के बाद मुझे वापस स्वर्ग बुला लेना-इतना ही बहुत है दस पीढ़ियों के लिए-

अश्लीलता तो खुद-ब-खुद आज सडको घूमती है और इल्जाम लड़कों के सर-माथे पे आ जाता है-नाई की कैंची से जादा तेज जुबान हो गई है क्युकि-बहू अब सास बन गई है-बीबी को देखने की गुस्ताखी आप क्यों करते हो ये श्रंगार तो पडोसी के लिए है-युवा इतना स्मार्ट बन गया है बाप को कहता है आपने अपने मजे के लिए मुझे जन्म दे दिया है -

आधुनिकता अपनाना है तो रोज एक नई जिन्दगी में प्रवेश कीजिये वर्ना आप भी मेरी तरह पिछड़े दलित कहलायेगें और फिर पिछड़ गए तो आरक्षण-आरक्षण ही चिल्लायेगे-

एक सामाजिक कटु व्यंग-

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4 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामीजून 01, 2016

    बहुत ही सुन्दर , अद्धभुत प्रस्तुति , आपने जो भी लिखा बहुत ही सही लिखा लेकिन अफ़सोस इन बातों को समझने वाले बहुत ही काम लोग रह गए है और आने वाले समय में क्या हाल होगा, हम सोच भी नहीं सकते या यूं कहे कि हम वो समय सोचना ही नहीं चाहते क्यूंकि जो लोग जिंदगी के असली महत्व को समझते है आगे वाला समय शयद उनके लिए नहीं है । अफ़सोस इस बात का जो लोग सही भी है वो भी क्या कर सकते है ? क्यूंकि यह दुनिया उनको सही बनकर नहीं जीने देती । लेकिन कोशिश करते रहेंगे जब तक हम अपनी सभ्यता और अपने संस्कारो पर चल सकते है तब तक चलेंगे और उसके बाद हमे इस जिंदगी की जरूरत नहीं ।

    सच में बहुत ही खूब लिखा आपने ,सब कुछ एकदम सच ।

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  2. आने वाले समय में भारतीय संस्कृति विलुप्त नहीं पाश्चात्य संस्कृति हो जायेगी। सुंदर आलेख।

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