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20 अप्रैल 2016

Homeopathy-Eye-disease-optical-nerve-paralysis-नेत्र रोग-ऑप्टिक तंत्रिका पक्षाघात

optical-nerve-paralysis

Eye-disease-optical-nerve-paralysis-नेत्ररोग-ऑप्टिक-तंत्रिका पक्षाघात-

मेरे एक बुजुर्ग रिश्तेदार कॉंग्रेस के बडे नेता थे - यह उस समय की वात हैं जव ग्वालियर मैं पहिला सुपर बाजार शुरू हुआ था  वे एक अन्य बडे नेता के साथ सुपरबाजार फे लिये सामान खरीदने कार से मुम्बई जा रहे थे रास्ते मैं ब्यावरा मे उन्होने रात्रि विश्राम किया -सुबह वह जव जागे तो अचानक उनको दिखना बन्द हो गया - तुरन्त ग्वालियर वापिस आकर चिकित्सा की व्यवस्था की किन्तु कुछ लाभ नहीं हुआ-

लगभग छह माह बाद उनका डबरा आना हुआ वहॉ उनकी एक कोठी थी दूसरे दिन उन्होंने मुझें बुलाया - मैंने जाकर कहा भाई साहव नमस्कार ! वे बोले कौन है  मुझे बडा आश्चर्य हुआ कि 30 वर्ष से इनके मुहल्ले में रहता रहा हूँ और ये कह रहे हैं कौन हैं - मैंने कहा भाई साहव मैं हूँ सतीश - आपने पहिचाना नहीँ ? वे बोले, अरे भाई मै पहिचानूँ कैसे मुझे कुछ दिखता तो है नहीं - आओं बैठो मैंने बैठते हुए पूँछा भाई साहव ऐसा कैसे हो गया - अब वे नेता तो ये ही वडे विस्तार से अपने यात्रा वृत्तान्त बताने लगे - वह भी कहने लगे कि कौन- कौन से मन्त्री कौन से वडे नेता और अधिकारी उन्है देखने के लिये आये थे - मैंने उनसे कहा कि भाई साहब आप वहुत वडे नेता हैं यह तो में भली भाँति जानता ही हूँ आप तो मुझें यह बताइये कि आपने अपनी आँखें किस  डाक्टर को दिखाई और उसने क्या कहा-उन्होंने  कहा कि मैने डाक्टर फिरदौसी को दिखाया था जो गजराजा मेडिकल कालेज,ग्वालियर के नेत्र विभाग के डीन हैं - उन्होंने बताया हैं कि आंखों के आगे एक परदा आ गया है-

लक्षणों को देखने पर मुझे पता लगा कि सुबह जव वे सोकर उठते हैं उस समय उन्हें काफी कुछ दिखाई देता था पर जैसे जैसे रोशनी बढती धी वैसे वेसे उनको दिखना कम होता जाता था और घूप निकलने के वाद तो बिलकुल ही बन्द ही जाता था- मैंने उनसे कहा कि आप कृपया डाक्टर फिरदौसी  से यह पूँछ कर बताइये कि ऐसा कौन सा परदा है जो सुबह उठ जाता है और फिर कुछ देर वाद गिर जाता है  दुसरा ऐसा कौन सा परदा हैँ जिसमेँ कम रोशनी में ज्यादा दिखता है और ज्यादा रोशनी में बिलकुल नहीं दिखता - उन्होंने मुझसे क्या कि तुम मुझ से बहस करते हो, क्या तुम अपने आप की आंखों का डॉक्टर समझते ही -मैंने उनसे क्या कि जहॉ तक समझने का सबाल हे मैं अपने को विश्व का आँखों का सबसे वडा डॉक्टर समझता हूँ- पर आप यह सब छोडिये मुझे तो आप यह बताइये कि आपने मुझें बुलाया  क्यों हैँ - वे बोले मेरे बंगले की छत टपकती है मुझे एक कारीगार और एक मजदुर की ज़रूरत है मैँने कहा ठीक है, कल सुबह भेज दूँगा - दो-तीन दिन बाद वे ग्वालियर वापिस चले गये-

15-20 दिन बाद उकोंने अपने दामाद को भेज कर मुझें ग्वालियर बुलाया - वे बोले मुझें तुम्हारी वात वहुत अपील कर रही है - तुम डॉक्टर फिरदौसी के पास जाकर पूँछ कर आओ कि ऐसा क्यों होता हैं- मैंने उनसे स्पष्ट कहा कि मुझे मालूम हैं कि ऐसा क्यों होता है इसलिये मैं डाँ फिरदौसी के पास क्यों जाऊँ,अगर डॉ फिरदौसी को नही मालुम हो तो वे मेरे पास आका पूँछ सकते हैं - में उनको ज़रूर बता दूँगा - उन्होंने मुझसे कहा कि तुम वहुत जिद्दी हो, नालायक हो आदि -मैँने कहा  कि आप ठीक कहते हैं और में वापिस डबरा चला आया-

संयोगवश कुछ समय वाद मेरा स्थानान्तर भी ग्वालियर हो गया - रहता तो मै भी उसी  मोहल्ले में था , आना जाना भी था ही -एक दिन भाभी जी ने मुझसे कहा कि भईया जी आप  इनका  इलाज करो -मैंने कहा कि भाभी जी मैं इलाज तो करूँ  पर दवाइयों आप खायेगी कि मै  खाऊँगा? क्यों कि भाई साहब तो खाना पसन्द नहींकरेगें- उन्होंने कहा  कि आप दवा दे तो सही- हम उन्हें किसी भी तरह खिलायेगे-

अब आइये यहाँ पहले रोग की कुछ चर्चा कर ली जाए दरअसल में इस केस में उनकी द्रष्टि-नाडी यानी Optical nerve(आप्टिकल नर्व) को लकवा लग गया था -उसमे हल्की सी शक्ति शेष थी इसलिए रात्री को विश्राम करने से वह कुछ कार्य करने लगती थी किन्तु आँखों पर जोर पड़ने पर या तेज प्रकाश के कारण वह पुन: निर्जीव हो जाती थी और दिखना बंद हो जाता था -जहाँ तक चिकित्सा का प्रश्न है यदि अटैक के समय ही उन्हें सामान्य से सामान्य लकवे की कोई दवा दे दी जाती तो उनकी द्रष्टि बच जाती वह चाहे जिस पैथी की दवा होती-

चिकित्सा के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी फिर भी कहावत है कि आशा से आसमान टिका है,चिकित्सा आरम्भ की -सबसे पहले मैने उन्हें 'जिंकम सल्फ़ 1000' की दो खुराक प्रति सप्ताह तथा 'कोनियम30' 'जेल्सिमियम30' 'कास्टीकम30' तथा 'काली फाँस6एक्स' लक्षणों के अनुसार देना आरम्भ किया-


लगभग तीन माह बाद एक दिन सायंकाल वे अपनी बालकनी में खड़े थे उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर पूँछा कि सड़क के उस तरफ गली के कोने पर ये बिजली का खम्भा क्यों दिख रहा है-ये तो पहले यहाँ था नहीं-उनकी पत्नी की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए-उन्होंने कहा कि क्या आपको सड़क के उस पार का खम्भा दिख रहा है - उन्होंने कहा ,तभी तो मै पूछ रहा हूँ-उनकी पत्नी ने बताया कि गली में शर्मा जी ने बिजली का कनेक्शन लिया था इसलिए ये खम्भा पीछे से हटा कर गली के कोने पर गाड दिया गया है -अब उन्हें विश्वास हो गया कि कुछ दिनों में काम-काज लायक निगाह वापस आ जायेगी-

अब यहाँ थोडा भाग्य कहें,या दुर्भाग्य,की भी चर्चा कर ली जाए -मुझे एक बरात में जयपुर जाना था कुछ काम होने के कारण वहां से दिल्ली चला गया-इस बीच में हमारे एक बुजुर्ग पड़ोसी जिन्हें हरफन मौला कहें कि लाल बुझक्कड़ उनके यहाँ पहुँच गए -जब उन्हें उनकी आँखों  की  कमजोरी की बात पता चली तो उन्होंने कहा कि मै इसकी बहुत अच्छी दवा जानता हूँ -आप घी,कालीमिर्च,और मिश्री मिलाकर रोज सुबह खाओ एक महीने में आपकी आँखे चमाचम हो जायेगी -उन्होंने ये प्रयोग आरम्भ कर दिया-उन्हें उच्च रक्त चाप और खुनी बवासीर की बहुत पुरानी बीमारी थी-घी-कालीमिर्च-मिश्री के मिश्रण ने उच्च रक्तचाप को बढ़ा ही दिया,बवासीर से रक्त आना भी चालू  हो  गया उच्च-रक्तचाप के कारण रक्त का प्रवाह बड़ी तेजी से होने लगा-तुरंत एलोपैथिक चिकित्सा के द्वारा किसी तरह उनके प्राणों की रक्षा तो हो गई लेकिन उनकी द्रष्टि पूर्ण रूप से समाप्त हो गई -

उन सज्जन से मैने जब पूछा कि आप ने ऐसी दवा क्यों बताई तो उन्होंने बड़े भोलेपन से कहा कि"मैने क्या उनको जहर दे दिया -घी,कालीमिर्च,मिश्री से कोई मरता है क्या ?"

मेरा सम्पर्क पता है-




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