Homeopathy-Treatment Opium Addiction-अफीम की लत का इलाज

Treatment Opium Addiction

होम्योपैथी एक सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान है - मानव मन में छिपी हुई दुर्भावनाओं और गलत आचरण को सुधारने की इसमें पर्याप्त क्षमता है मानव मन की एक बहुत बडी कमजोरी है "लत"  

प्रारम्भ में मनोरंजन या शौक के लिये किया गया काम कालान्तर से लत या मजबूरी बन जाता है यह जानते हुए भी कि यह कार्य हमारे स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन के लिये न केवल हानिकारक अपितु घातक भी है वह उसे लगातार किये जाता है - शराब ,तम्बाखू भांग, गाँजा, अफीम और न जानें कैसे कैसे मादक पदार्थ आज उपलब्ध है  निर्धन और सामान्य वर्ग के व्यक्ति ही नहीं सम्पन्न और विश्व प्रसिद्ध व्यक्ति भी इनसे बरबाद होते देखे गये हैं -


मैं आपको यहाँ अफीम की लत का एक केस बताना चाहता हूँ -पी.डब्लू.डी. के मेकेनिकल वर्कशाप में एक मेकेनिक थे नामदेव - उम्र लगभग 50 वर्ष - हमारे मुहल्ले में ही रहते थे - परिवार के नाम पर कोई नहीं था उस जमाने -में कोयला या लकडी से चलने बाले सडक कूटने के रोलर चला करते थे - ये उसके सबसे अच्छे मिस्त्री  थे पर इनको अफीम खाने की लत थी ये दिन- रात पिन्नक में रहते थे-

सुबह-सुबह उनके पास काम करने वाले सहायक लडके आ जाते तथा उनको खाना बना कर खिलाते और साइकिल पर बैठा कर वर्कशाप ले जाते थे -सरदी हो तो धूप में और गरमी हो तो छाया में बैठा देते - लडके उन से पूंछ-पूछ कर काम करते रहते थे - जैसे लडके पूछते उस्ताद 140 नम्बर के रोलर में क्या होना है - वे कहते जा देख चार नम्बर रैक में ढाई किलो की रिग टंगी है लाकर बदल दे - ये खुद बैठे बैठे खाँसते और थूकते रहते थे-

मैंने उनसे कई बार कहा कि उस्ताद आप ये अफीम छोड क्यों नहीं देते हो- आपकी सारी तनख्वाह इसी अफीम में चली जाती है और अपनी हालत तो देखो, शरीर पर हड्डी और खाल के अलावा माँस तो जैसे बचा ही नहीं है-

एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि डॉक्टर साहब में इसे छोडना तो चाहता हूँ पर क्या करूँ बरसों की आदत है, जाती ही नहीं है आप छुडवा सकते हो तो छुडवा दो - मैंने कहा कि छुडवा तो मैं दूँगा लेकिन इलाज के बीच अगर आपने थोडी भी अफीम  खाली तो प्रतिक्रिया बहुत भयंकर होगी अब आप सोच लो, आपको गंगा उठानी पडेगी तथा जो भी कष्ट होगा उसे भोगना पडेगा- बैसे मैं अपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि आपको कोई कष्ट होने नहीं दूँगा-

सब तरफ से पक्का करके मैने उनकी चिकित्सा प्रारम्भ की - मुख्य दवा तो 'अवेना सटाइवा' का मूल अर्क ही था सुस्ती, कमजोरी व कज्ज आदि के लिये 'जेल्सीमियम' 'चायना' 'नक्स वोमिका' आदि देता रहा - नींद के लिये
'काली फाँस' दे देता था- धीरे धीरे उनके शरीर से अफीम बाहर निकलना शुरू हुई - टट्टी-पेशाब और पसीने के साथ भी -एक समय ऐसा आया कि शरीर पर हाथ फेरता तो ढेरों सफेद सफेद पाउडर जैसा झड पडता - उन्है बहुत कमजोरी, बेचैनी,घबडाहट, एकाग्रता तथा स्मृति की कमी, भूँख-प्यास की कमी, कब्ज आदि कष्ट होते - हालत और ज्यादा खराब होने लगी तो मेरे मन में भी विचार जाने लगे कि क्यों मैंने अच्छे भले में मुसीबत मोल ले ली लेकिन उन्होंने साहस नहीं छोडा और संयम बनाये रखा तो मै भी उनकी सेवा में लगा रहा-

जैसे ही उनके शरीर से सारी अफीम निकल गई उन्हें अफीम की तलब लगना बन्द हो गई तथा भूख प्यास लगने लगी, शरीर में नई शक्ति का संचार होने लगा- पौष्टिक खुराक उन्है दी जाती रही और परिणाम स्वरूप उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया या यह कहे कि वे लाल पड गये-

इस बीच उनके बहुत अधिक बीमार होने की खबर सुनकर उनके एक भतीजे दिल्ली से उन्है देखने आये यहॉ उन्होंने चाचा को देखा तो उन्हें एकदम मस्त पाया - उन्होंने कहा चाचा यहॉ पड़े-पड़े आप क्या कर रहे है आप मेरे साथ चलिये, करोल बाग में अपनी टेलरिंग की दुकान है - 30-40 आदमी काम करते हैं आप उन्हें को देखते रहना बस- अपने भतीजे की बात मान कर वे चंगे भले होकर दिल्ली चले गए-

लगभग दो वर्ष वाद मुझे अपने साढू भाई के यहाँ करोल बाग जाने का अवसर मिला - खाना खाने के बाद हम पान खाने के लिये निकले तो सामने एक बडे से बोर्ड पर नामदेव टेलर्स लिखा देखा- ध्यान अया कि अपने मिस्त्री साहब के भतीजे की फर्म का नाम भी यही था - मैंने सोचा देखूँ मिस्त्री साहब के क्या हाल हैं, कहीं फिर से तो उसी लाइन पर नहीं आ गये -दुकान के एक कर्मचारी से पूछा कि क्या यहाँ ग्वालियर के कोई सज्जन है तो उन्होंने कहा कि हमारे मालिक के चाचा जी हैं - वह सामने की केविन में उनका आफिस है - बैठे हैं मिल लीजिये मुझे देख कर तो वे मुझसे लिपट गये, उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था- फौरन अपने भतीजे को बुलाकर मुझसे मिलवाया सारे कारीगर और आसपास के दुकानदार इकट्ठे हो गये - ऐसा जोर दार स्वागत और आवभगत देख कर तो मैं अभिभूत हो गया-

हमारे साढू भाई बोले कि मैं यहीं करोल बाग का पैदा हुआ हूँ और हम आधी करोल बाग के मालिक कहलाते है लेकिन आपका रुतबा और सम्मान देखकर तो यह लगता है कि हम तो कुछ भी नहीं है - मैंने कहा कि हूँ तो मैं भी कुछ भी नहीं - यह सब तो होम्योपैथी का चमत्कार है-

प्रस्तुतीकरण- Upcharऔर प्रयोग-

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