शंख की उत्पत्ति कैसे हुई है

शंख(Shankh)की उत्पत्ति संबंधी पुराणों में एक कथा वर्णित है कि सुदामा नामक एक कृष्ण भक्त पार्षद राधा के शाप से शंखचूड़ दानवराज होकर दक्ष के वंश में जन्मा और अन्त में विष्णु ने इस दानव का वध किया था शंखचूड़ के वध के पश्चात्‌ सागर में बिखरी उसकी अस्थियों से शंख(Shankh)का जन्म हुआ और उसकी आत्मा राधा के शाप से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन में श्रीकृष्ण के पास चली गई-

शंख की उत्पत्ति कैसे हुई


भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख(Shankh)का विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था-समुद्र-मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से छठवां रत्न शंख था अन्य 13 रत्नों की भांति शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद थे विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख(Shankh)है वहीं लक्ष्मी का वास होता है-

इन्हीं कारणों से शंख की पूजा भक्तों को सभी सुख देने वाली है शंख की उत्पत्ति के संबंध में हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि सृष्टी आत्मा से,आत्मा आकाश से,आकाश वायु से,वायु आग से,आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है-

भागवत पुराण के अनुसार संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ-कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुर को मार गिराया-उसका खोल शेष रह गया और माना जाता है कि उसी से शंख(Shankh) की उत्पत्ति हुई-पांचजन्य शंख वही था-

पौराणिक कथाओं के अनुसार,शंखासुर नामक असुर को मारने के लिए श्री विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था शंखासुर के मस्तक तथा कनपटी की हड्डी का प्रतीक ही शंख है उससे निकला स्वर सत की विजय का प्रतिनिधित्व करता है-

शिव पुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ-शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था और दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने विष्णु के लिए घोर तप किया और तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए-विष्णु ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने एक महापराक्रमी तीनों लोको के लिए अजेय पुत्र का वर मांगा और विष्णु तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए और तब दंभ के यहां शंखचूड का जन्म हुआ और उसने पुष्कर में ब्रह्मा की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तब ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा और शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए-ब्रह्मा ने तथास्तु बोला और उसे श्री कृष्ण कवच दिया फिर वे अंतध्र्यान हो गए लेकिन जाते-जाते ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी-ब्रह्मा की आज्ञा पाकर तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया-

ब्रह्मा और विष्णु के वर के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया- देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की-तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए-परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु से ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया और शंखचूड का रूप धारण कर तुलसी के शील का अपहरण कर लिया-अब शिव ने शंखचूड को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ-चूंकि शंखचूड विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख(Shankh)का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है-परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख(Shankh)का जल शिव को निषेध बताया गया है-इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है-

प्राचीन काल से ही प्रत्येक घर में पूजा-वेदी पर शंख(Shankh)की स्थापना की जाती है निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली, होली, महाशिवरात्रि, नवरात्र, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित किया जाता है- 

रुद्र, गणेश, भगवती, विष्णु भगवान आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल, दूध, घी, शहद, गुड़, पंचद्रव्य आदि से अभिषेक किया जाता है-इसका धूप, दीप, नैवेद्य से नित्य पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित करना चाहिए-

शंखराज सबसे पहले वास्तु-दोष दूर करते हैं ये भी मान्यता है कि शंख में कपिला(लाल)गाय का दूध भरकर भवन में छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं-परिवार के सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख-दुर्भाग्य दूर होते हैं- 

विष्णु शंख को दुकान, ऑफिस, फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तु-दोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय आदि में लाभ होता है- 

क्या शंख की स्थापना से घर में लक्ष्मी का वास होता है-


स्वयं माता लक्ष्मी कहती हैं कि शंख उनका सहोदर भ्राता है-शंख-जहाँ पर होगा वहाँ वे भी होंगी-देव प्रतिमा के चरणों में शंख रखा जाता है-पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख का जोड़ा होना चाहिए- 

गणेश शंख में जल भरकर प्रतिदिन गर्भवती नारी को सेवन कराने से संतान गूंगेपन, बहरेपन एवं पीलिया आदि रोगों से मुक्त होती है अन्नपूर्णा शंख की व्यापारी व सामान्य वर्ग द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न, धन, लक्ष्मी, वैभव की उपलब्धि होती है मणिपुष्पक एवं पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तु-दोषों का निराकरण होता है शंख का तांत्रिक-साधना में भी उपयोग किया जाता है इसके लिए लघु शंखमाला का प्रयोग करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है-

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