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17 मई 2016

गर्व से कहो हम Kayastha-कायस्थ है

बड़ा दुःख होता है जब हम अपने कायस्थ(Kayastha)समाज के बारे में सोचते है श्रेष्ठ कुल में होते हुए भी हम कभी आज तक अपने Kayastha-कायस्थ समाज की एक-जुटता से क्यों विमुख रहे है-

गर्व से कहो हम Kayastha-कायस्थ है


जब किसी कायस्थ(Kayastha)की मदद करनी हो तो पीछे हट जाते है कोई न कोई बहाने बना के मुंह चुरा लेते है-बिना लाभ के किसी को अपने अधीनस्थ नौकरी देने से कतराते है क्युकि हमने पीढ़ी दर पीढ़ी की इसी परम्परा को निभाया है तो नई शुरुवात कब और कैसे होगी - 

अगर हमने पहले सोचा होता तो क्या आज हम कायस्थ(Kayastha)पीछे न होते जबकि अन्य जाति के लोग आगे निकल गए और हम आज तक कायस्थ एकता(Kayastha unity)की दुहाई देने में लगे है आखिर जो हमने गर्व(Proud)का बीज बोया है वही आज काट रहे है -

जब बात आती है कायस्थ-एकता की तो लोगों का एक टिप्पणी से काम हो जाता है कि "हम आपके साथ है " तो कही भी क्या जाने की जरुरत क्या है बस घर बैठे बाट जोहते रहना है ये कायस्थों की कब एकता का एक बड़ा बिगुल बजेगा और हम ये कहने आगे आयेगे "हम तो शुरू से आपके साथ थे" -

हमने अपने दिल पे हाथ रख कर जब ये पूछा है?क्या कभी अपने अधीनस्थ किसी एक कायस्थ बच्चे को काम दिया है? तो चोरी -छुपे अंदर से एक आवाज आई "अपने से आगे बढ़ने के लिए किसी बुद्धिमान वर्ग को आगे कैसे आने दे " हाँ ये बात और है खाने के दांत कुछ और और दिखाने के कुछ और होते है -

बात जब बिना दहेज़ के शादी की आती है-हम एक कमेन्ट करके इतिश्री कर लेते है कि "दहेज़ लेना पाप है" लेकिन ये बात जब खुद पे आती है तो ये कहता हूँ "हम तो लेना नहीं चाहते है लेकिन पापा-मम्मी नहीं मान रहे है "क्युकि अंदर से विद्रोह की भावना हम कभी बना ही नहीं पाए क्युकि स्वार्थ का लालच आज भी पंख फैलाए अंदर जो बैठा है -हम तो ये कहते है पहले मम्मी-पापा से पूछ लेना उचित है तब "हम कमेन्ट करे "

कुछ दहेज़ लोभी तो आईने में अपनी शक्ल भी ढंग से नहीं देखते है लेकिन उनको बहू सुंदर होनी चाहिए और अगर कमाऊ मिले तो सोने में सुहागा है अरे जब बेटी ही कमा लेगी तो फिर बेटो को चौका-चुल्हा देखना चाहिए -मतलब पैसे की भूंख पे सब कुछ खो दिया "स्त्री की सुन्दरता घर में ही है "- वास्तविकता ये है खुद असक्षम है जो सर्वस्त दे सके-

आज कल एक काम का प्रचलन फेसबुक पे आ गया है कायस्थ मित्रता करो और एक ग्रुप बनाओ और मित्र को जोड़ दो "बस हो गई इतिश्री " क्यों बनाया कायस्थ ग्रुप एडमिन को खुद ही पता नहीं है उसे तो बस एक आदत सी है किसी के अधीनस्थ होके ग्रुप में नहीं रहना है -

अब तो शर्म आती है मुझे ये कहने में कि "हम कायस्थ है "

सभी लोगो से छमा प्रार्थी हूँ जो मन के उदगार व्यक्त कर दिए सभी लोगो में चंद लोग है जो सामाजिक कार्यरत है लेकिन "स्वार्थ को पीछे नहीं छोड़ पा रहे है " बाहरी दिखावे से ओतप्रोत है -

एक Kayastha-कायस्थ-
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