Homeopathy-Brain Damage-मस्तिष्क की क्षति

Brain Damage

Homeopathy-Brain Damage-मस्तिष्क की क्षति-

मेरे ही विभाग के एक सहायक यंत्री को मस्तिष्क की क्षति अर्थात् सेरिब्रल सक्लेरोसिस(Cerebral Sclerosis)की बीमारी हुई और एलोपैथिक दवाओं से कोई लाभ तो हुआ नहीं बल्कि ज्यों-ज्यों दवा की गई -मर्ज बढता ही गया -उनके एक भाई इंगलैण्ड में डॉक्टर थे -बहीं इलाज कराने का विचार किया गया और पासपोर्ट आदि की व्यवस्था की जाने लगी -आगे पढ़े-

इसी बीच आफिस में ही किसी ने सहायक यंत्री को सुझाव दिया कि आप होम्योपैथिक इलाज क्यों नही करवाते है-जब डॉक्टर की बात चली कि किस डॉक्टर को दिखाया जाय तो उन्हें बताया गया कि आपके ही विभाग में जो सक्सेना उपयंत्री हैं वे बहुत अच्छे होम्योपैथ हैं आप उन्ही को दिखाइये -

एक समृद्ध परिवार का व्यक्ति जो स्थाई सहायक यंत्री भी हो- कैसे एक उपयंत्री से जो कि उनके विभाग का ही हो- से चिकित्सा कराना उचित नहीं लगा किन्तु वे जिससे भी वे बात करते मेरा नाम ही सुझा देता -अन्तत: उन्होंने मेरे पास संदेश भेजा -मैं जिस समय उनको देखने के लिये पहुचा वहाँ उनके एक मित्र जो उनके क्लासफेलो व सहायक यंत्री भी थे- पहिले से ही बैठे हुए थे -जैसे ही मैंने कमरे में पैर रखा उनने मेरे पैर छुए क्यों कि वे मेरे बडे भाई साहब के साले थे -एक सहायक यंत्री को पैर छूते देख कर वे कुछ सकपकाये -

उनसे मेरी बीमारी पर चर्चा आरम्भ हुईं - उनकी वाणी में अभी भी बहुत अक्खडपन था -शारीरिक स्थिति तों यह थी कि वे अपने हाथों से अपने पाजामे का नाडा भी नही बाँध सकते थे -बीमारी घीरे-धीरे आई थी -किसी प्रकार की अनुवांशिक कमी,तेज बुखार या दुर्घटना का कोई इतिहास नहीं था -सारा हाल बता कर उनने मुझसे पूँछा कि क्या मैं ठीक हो जाऊँगा

मैंने उनसे कहा कि मैं आपसे केवल एक लक्षण पूछूँगा  ? यदि वह होगा तो मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे सकूँगा मैंने उनसे कहा कि आपका एक पैर ठन्डा  व एक पैर गरम होना चाहिये -वे बोले ऐसा कैसे हो सकता है-मैंने कहा हो सकता है या नहीं इसे छोडिये है कि नहीं बस इसे देखिये -मैंने उनके मित्र से कहा राजेन्द्र पहिले तुम देख कर मुझे बताओ फिर मै अपने तरीके से इनकी जाँच करूंगा -उन्होने पैरों को छू कर देखा और मुझे बताया कि जीजाजी सच में इनका एक पैर तो बिलकुल बर्फ जैसा ठंडा है जबकि दूसरा पैर नॉर्मल गरम लगता है-

यह सुन कर वे लगे डॉक्टरों को बुरा-भला कहने -वे बोले डॉक्टरों ने मुझे घन्टो लिटाकर सुइयाँ चुभाई , हथोंडों से ठोका बजाया, खूब नोंचा घसोटा पर ये मूर्ख यह भी नहीं जान पाये कि मेरा एक पैर ठंडा और एक पैर गरम है तब मैंने उनसे कहा कि आप डाक्टरों को गालियां क्यों दे रहे हैं -

मैंने उनसे पूँछा आपकी उम्र कितनी है, उन्होने कहा 27 साल - मैंने पूँछा ये पैर आपके साथ कब से है -वे बोले जन्म से -मैंने पूँछा कि ये दूसरा पैर आपके साथ कब से है -वे बोले क्या बात करते हो-ये भी जन्म से ही है -मैंने उनसे कहा कि 27 सालों में आप यह नही जान पाये कि आपका एक पैर ठंडा और दूसरा पैर गरम है - तो अगर डॉक्टर घन्टे दो घन्टे के परीक्षण में यह नहीं जान पाये तो इसमे कौन सा बडा भारी अपराध हो गया

तब जाकर वे कुछ शान्त हुए -उन्होने मुझसे कहा कि आपने तो मेरे शरीर से हाथ भी नहीं लगाया फिर आप कैसे जान गये कि मेरा एक पैर गरम व दूसरा पैर ठंडा है -मैंने कहा कि सिम्पटम के आधार पर -अब तो मैं आपके बारे में बहुत कुछ जान गया हूँ जैसे कि आपके मस्तिष्क का बायाँ भाग प्रभावित हुआ है इस लिये आपका शरीर का दाहिना भाग बिशेष रूप से आकान्त है-

फिर उन्होंने मुझसे फिर पूँछा फि क्या में ठीक हो जाऊँगा मैने उनसे कहा-हाँ-ठीक हो जायेंगे तब उन्होंने बड़ी ही कटु वाणी में कहा कि ऐसा तो सभी कहते हैं -मैं भी उनकी कठोर वाणी से आहत था अत: आवेश में आकर मैंने उनसे कहा कि आप उठेंगे, आप चलेंगे, आप दोडेंगे, आपकी शादी होगी, आपके बच्चे होंगे -क्या ऐसा कोई कहता है? उन्होंने कहा नहीं -मैंने कहा कि ये मैं कह रहा हूँ-

चिकित्सा के रूप में पहिले उन्हें हमने 'लायकापोडियम 1000' की दो पुडिर्यों दीं साथ में 'जेल्सीमियम 30' और 'काली फांस 30' की दो-दो खुराके दी गई इसके बाद 'नियोडायनम आक्साइड 30' तथा 'ऐर्चियम मेटेलीकम30' लम्बे समय तक दी जाती रही - धीरे धीरे उनके शरीर में शक्ति का संचार होने लगा -पहिले मैं उन्हें देखने के लिये उनके घर जाता था, फिर वे किसी के साथ स्कूटर पर मेरे क्लीनिक पर आने लगे -और फिर वे स्वयं स्कूटर चला कर आने लगे अपने आफिस का काम काज तो पहिले ही करने लगे थे -

उनका विवाह हुआ और एक कन्या ने उनके घर जन्म भी लिया -1978 में मेरा स्थानान्तर सेंवढा हो गया -वे वहाँ भी मुझसे मिलने कईं बार आये -इसके बाद मेरा उनसे सम्पर्क टूट गया एक बार में उनसे मिलने उनके आँफिस पहुचा -सोचा कि जरा हाल चाल पता कर लूँ-

मुझे देखते ही उनने मुझसे ऐसे पूँछा कि जैसे कि वे मुझे जानते ही न हीं "कैसे आये हो" - सामान्य शिष्टाचार के नाते बैठने तक को भी नहीं कहा- चाय पानी तो दूर की बात है -मैँने उनसे कहा कुछ नहीं बस नमस्कार करने को चला आया था - नमस्कार.! चलता हूँ- 

जब में उनके कमरे से बाहर आ रहा था तो अचानक मन में बिचार आया कि इन्होंने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया -मन में किसी ने कहा शायद इनका कुछ बुरा समय आ गया है इसलिये ये मेरा अपमान कर रहे हैं -मैँ तो वापिस आ गया परन्तु दो तीन दिन बाद पता लगा कि उनका एक छोटा सा एक्सीडेंट हुआ जिसके बाद उनकी हालत बहुत बिगड गई और वे चलने फिरने से पुन: मजबूर हो गये-

सनृ 1990 में मेरा भी प्रमोशन हो गया और पोस्टिंग भी उसी सर्किल मेँ हो गई मैं अपने सहयोगियों और स्टाफ से मिलने सर्किल आँफिस गया -प्रवेश करते ही इनका कमरा था पर मै इनसे न मिलते हुए सीधा अन्दर चला गया -उन्होंने मुझे जाते देख लिया सो फोरन मुझे बुलाने के लिये चपरासी को भेज दिया -हमारे विभाग में तो शायद ही कोई ऐसा होगा जो मुझे न जानता और न मानता हो -

पहिले मैं सबसे प्रेम से मिला फिर उनके कमरे में पहुंचा -उन्होंने मेरा बडी गर्म जोशी से स्वागत किया फ़ौरन चाय का आर्डर दिया -मैंने कहा चाय तो मैंने अभी पी है कहिये कैसे याद किया वे बोले मुझे बहुत तकलीफ है -मुझे बार-बार पेशाब जाती है -स्वयं तो मैं चल फिर नहीं सकता दो तीन आदमियों की सहायता लेनी पाती है -मैंने पूँछा कि आप क्या दवा ले रहे हैं -उन्होंने कुछ दवाइयों के नाम बताये मैंने कहा ये बहुत अच्छी दवाइयाँ हैं लेते रहिये ज़रूर फायदा करेगी -यद्यपि उन्हें एक बार फिर किसी सीमा तक स्वस्थ किया जा सकता था किन्तु मेरे अन्दर का चिकित्सक राजी नहीं हुआ-

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