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23 मई 2016

Homeopathy-Pet Mein Jalan-पेट में जलन

Pet Mein Jalan

Pet Mein Jalan-पेट में जलन-

नगरिया जी  के बच्चे के चलने की खबर जंगल में आग की तरह फैलने लगी जिसकी पोस्ट हम आपको पहले कर चुके है - दतिया के वनमण्डल अधिकारी उस समय एक सरदारजी थे उन्होंने  ने जब यह सुना तो उन्होंने नगरियाजी से कहा कि सक्सेना जी से मेरी पत्नी का इलाज भी करवा दीजिये -नारियाजीने मुझ से अनुरोध किया कि आप हमारे डी-एफ-ओ-साहब की पत्नी को भी एक बार देख लीजिये वैसे तो शासकीय कार्य से मैं प्राय: दतिया जाता ही रहता था किन्तु वे मुझें विशेषरूप से आग्रह पूर्वक उनके बंगले पर ले गये -लक्षण देखने पर पता लगा कि उनकी पत्नी को पेट में बहुत जलन होती है - 

वैसे तो उनका इलाज बहुत हुआ पर लाभ कुछ नहीं हुआ था पी.जी.आई.चण्डीगढ मेँ जहाँ कि पेट के रोगों के लिये देश की सर्वोत्वम व्यवस्था है वहाँ भी न जाँचों मेँ कुछ मिला और न दवाओं ने कोई काम किया-

मुझे इतिहास जानने पर पता चला कि इसके पहिले वे अपने बेटे के पास सिंगापुर काफी दिन रही थीं वहां चेरी जैसा एक फल उन्हें बहुत पसन्द आया था जिसे उन्होंने अधिक मात्रा में खाया था- उसी के बाद उनको ये कष्ट प्रारम्भ हुआ था-असंगत चिकित्सा ने उसे और जादा बढा दिया था- जलन,थोडे थोडे पानी की बार बार प्यास, मृत्यु का भय तथा फलों के अधिक प्रयोग के द्वारा उत्पन्न कष्ट आदि लक्षण सब आर्सेनिकम एल्बम के लगे इसलिये 30 पोटेन्सी मेँ में चार बार लेने के लिये बता दिया - डी.एफ.ओ.साहब ने सम्मानपूर्वक मेरा स्वागत किया था तथा चलते समय फीस देने लगे -मैंने कहा कि फीस आदि तो मै किसी से भी नहीं लेता किन्तु मेरा नियम यह है कि मैं सरकारी समय अर्थात् सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक कोई मरीज नहीं देखता क्योकि यह मेरा शासकीय समय होता है जिसके लिये मुझे वेतन मिलता है-

सरदारनीजी को पहिले ही दिन से लाभ होना प्रारम्भ होगया था जो ठीक होने तक चलता ही रहा मै यहाँ सरदार जी की प्रशंसा अवश्य करूँगा  कि इसके बाद उन्होंने मुझे कभी भी अपने बंगले पर नहीं बुलाया- वे स्वयं ही आकर सेंवढा रेस्ट हाउस में रुक जाते व मेरे पास सूचना भिजवा देते कि जब भी मुझे समय हो मै रोगी को देख लूँ-

इलाज के रुप में मुझे उन्हें 'नक्स वोमिका 200', 'रोविनिया 30' ओर 'नेट्रम फांस 30' के अतिरिक्त कोई विशेष औषधियों का प्रयोग नहीं करना पडा-

अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर सरदार दम्पत्ति स्वयं मेरे घर मुझें आमंत्रित करने आये सरदारनीजी ने मुझसे कहा कि आपको बारात में पंजाब अवश्य चलना पडेगा नहीं तो मै बहू का मुह नहीं देखूँगी क्योंकि मैंने तो जीवन की आशा ही छोड दी थी -आपकी मेहरबानी ने ही मुझे यह दिन दिखाया है उनकी कृतज्ञ भावना देख कर मुझें खुशी तो हुई पर बहू का मुंह न देखने बाली बात मुझे अखर गई -मैंने उनको समझाया कि कृपया ऐसो बात न कहे -वाहे गुरू की दया से ऐसा अवसर आया है तो उसे खुशी से मनायें -

उस समय मेरे पास सिन्ध नदी पर पुल बनाने का कार्य चल रहा था -स्लेब की कांकीर्टिग का दिन निश्चित हो चुका था - बडा काम था इसलिये मेरा रहना अनिवार्य था -मैंने अपनी मजबूरी बताई - मैने उनसे कहा कि आप बहू को लेकर आइये मैं उसका स्वागत आपके बंगले के गेट पर खडे होकर करूँगा- ये मेरा आपसे पक्का वादा है -बडी मुश्किल से मैं उनको राजी कर सका -उनके इस आदर ओर प्रेम की भावना का जब भी स्मरण करता हूँ तो पुलकित हो उठता हूँ- मैं इसे अपना नहीं अपनी पैथी- होम्योपैथी का सम्मान मानता हूँ -
डॉ-सतीश सक्सेना 


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