Homeopathy-Stains In Brain-मस्तिष्क में दाग

Stains In  Brain

Homeopathy-Stains In  Brain-मस्तिष्क में दाग-

सन् 1975 में जब हमने मुरार(ग्वालियर) ठंडी सडक पर क्लीनिक आरम्भ किया तो निकट में ही रहने वाले श्री मित्तल प्राय: हमारे यहाँ आकर बैठ जाया करते थे चूँकि वे उम्र में मुझसे बडे थे सो मेरे लिए आदर के पात्र थे वे भी लोक निर्माण विभाग मे उपयंत्री थे - शुरू शुरू में वे मुझसे पूँछते थे तुम यहॉ बैठे-बैठे क्या करते हो- मै भी कहता आप देख नहीँ रहे हैं कि मैं लोगों की बीमारियों का इलाज करता हूँ- वे हँसते और कहते तुम क्या इलाज करोगे अपना ही काम देख लो -

मैँ उनसे कहता कि यह भी तो अपना ही काम है जब उन्होंने देखा कि दूर-दूर से मरीज चले आ रहे हैं कठिन रोग बाले मरीज भी आसानी से ठीक हो रहे हैं तो जाके उनको कुछ बिश्वास हुआ - बोले तुम तो वास्तव में ही डॉक्टर हो गये हो-

अब मेरे लडके का इलाज करो -मैंने पूँछा उसे क्या हो गया है - वे बोले उसे मिर्गी आती हैं - लेकिन उस के मिर्गी(apoplexia) के वारे में एक विशेष बात यह थी कि उसे मिर्गी केवल खाना खाते समय ही आता था -जब तक सामने थाली और हाथ में कौर और मुह में कौर नहीं होगा उसे मिर्गी(apoplexia)नहीं आ सकता था ये बच्चा लगभग 13 वर्ष का था और कक्षा 8 का विद्यार्थी था-पढाई लिखाई ओर अन्य गतिविधियों में पूर्णत: सामान्य था - उसके नाना लखनऊ उत्तर प्रदेश शासन में स्वास्थ्य सचिव थे -वहाँ के मेडीकल कॉलेज के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉक्टर न्यूटन द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य परीक्षण के उपरान्त भी कोई संतोषजनक निष्कर्ष नहीँ निकल सके थे-उस समय ई.ई.जी.आदि की कोई व्यवस्था भी नहीं थी-

उसे मिर्गी की सामान्य दवाइयाँ तथा सेडीटिब वैगरह लेने के लिये कहा गया था - जब मैंने बच्चे का सूक्ष्म निरीक्षण किया तो पाया की उसकी बायीं कनपटी के पास लाल रंग का एक उठा हुआ सा एक दाग पाया-मेरे पूँछने पर उन्हों ने बताया कि यह बहुत दिनों से हैं उन्होंने यह भी बताया कि जब इसे मिर्गी(apoplexia)आने को होता है तो यह काफी फूल जाता है और इसका रंग गहरा लाल ताम्बे के रंग जैसा होजाता है और मिर्गी आने के बाद यह धीरे- धीरे फिर अपने स्वाभाविक आकार और रंग का हो जाता है-

तब मैने उनसे कहा कि इसको मिर्गी आने का कारण यह है कि इसके मस्तिष्क में उस स्थान पर जो खाने पीने की क्रियाओं का संचालन करता है वहां भी एक ऐसा ही दाग(Stains) है -उसमें रक्त संचित होने से वह फूल जाता है और खाना-खाने के कारण उसमे हलचल अधिक होने से दबाव अधिक बढ जाता हैं जिससे मिर्गी(apoplexia) के रूप में यह अचेत हो जाता है -बेहोशी में मस्तिष्क के निष्किय हो जाने के कारण रक्त धीरे धीरे वहाँ से निकल जाता है और उसका आकार सामान्य हो जाता है और तब उसे होश आ जाता है -यह पूँछने पर कि उसे दर्द बगेरह कुछ होता है उन्होंने बताया कि नहीं होता है तब उन्होंने मुझसे पूँछा कि दर्द होता आखिर क्यों नहीं है तब मैंने उन्हें बताया, चूकि यह किया बहुत धीमे- धीमे होती है इसलिये उसे इसका कोई आभास नहीं होता -तब जाके उनको मेरी बात का बिश्वास नही हुआ और वे बोले "ऐसा भी कहीँ होताहै" उन्होंने  मुझसे इलाज नहीं करवाया-

गरमियों की छुट्टियों में वह बालक फिर अपने नाना के घर गया हुआ था -एक दिन डॉक्टर न्यूटन बंगले पर आये हुए थे  उन्होंने मित्तल साहव से पूँछा कि आप के बेटे का क्या हाल हैं - उन्होने कहा कि डॉक्टर साहव हाल तो वही है - मिर्गी(apoplexia) तो अभी भी आती हैं - फिर कुछ सोचते हुए बोले कि हमारे मुहल्ले का एक लडका है- है तो वह भी उपयंत्री परन्तु होम्योपैथी इलाज के लिये उसने एक क्लीनिक खोल रखा है - वह कह रहा था कि जैसा दाग(Stains) इसकी कनपटी पर है वैसा ही एक दाग इसके ब्रेन मेँ उस जगह भी है जो खाने पीने की क्रियाओं को संचालित करता है- वहाँ दवाव बढने के कारणं इसको मिर्गी आती हैं-

डॉक्टर न्यूटन अत्यन्त आश्चर्य के भाव से कहा कि वे जो भी हो- जिसने भी यह बात बताई है उसे मस्तिष्क के कार्य की पूरी- पूरी जानकारी होना चाहिये -आप उनसे कहिये ,यदि वे इसका इलाज भी कर सकते हों तो उनसे इलाज भी करवाहये वरना आप मेरे पास आ जाइये- अब मैं भी इसका इलाज कर सकता हूँ किन्तु इसके लिये मुझें इसके ब्रेन का आपरेशन करना पडेगा-

ग्वालियर आने पर मित्तल बच्चे को लेकर मेरे पास आये और डॉक्टर न्यूटन से हुई सारी चर्चा मुझे सुनाई और कहा कि अब आप इसका इलाज करिये- मैंने 'थूजा 1000' की दो खुराकें सप्ताह में एक दिन और 'एन्टिम क्रूड 30' व 'कॉस्टीकम 30' प्रति दिन दो- दो बार देने की व्यवस्था करदी - इसके बाद तीन महिने में उसे मिर्गी(apoplexia) आनी बन्द हो गई- किन्तु इलाज तब तक चलाता रहा जब तक कि कनपटी का दाग पूरी तरह गायब नहीं हो गया क्यों कि केवल यही एक साधन था जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि दिमाग का दाग(Stains) भी ठीक हो गया है-

डॉ-सतीश सक्सेना 

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