22 मई 2017

मनुष्य जीवन के होने वाले संस्कार क्या हैं

Sanskar of Human Life


संस्कार (Sanskar) का वास्तविक अर्थ होता है शुद्धिकरण और हिन्दूओं संस्कारों का विशेष महत्व है ये संस्कार आदि काल से चला आ रहा है सभी संस्कार हमारे मन-कर्म-वाणी-और शरीर के उत्थान के लिए हमारे ऋषियों ने इसका प्रवधान किया है हमारे सनातन धर्म में सोलह संस्कार बताये गए है आइये जाने अब तक आपने अपने जीवन काल में कितने अपनाए है और आगे कितने संस्कार होना बाकी है-

मनुष्य जीवन के होने वाले संस्कार क्या हैं

सभी सोलह संस्कारों के लिए सनातन धर्म (Sanatan Religion) में इसकी व्याख्या की गई है इसका मूल अर्थ है जीवन में पिछले किये गए पाप कर्मो का जो प्रभाव आज हमारे जीवन में है उसको मिटा कर अच्छा प्रभावशाली बनाना-भगवान् को भी इस मृत्यु लोक में आकर उन सभी संस्कारों को करना पडा था-सभ्य समाज के लिए जो संस्कार आवश्यक है उनके न करने से समाज भी हमें हेय द्रष्टि से देखता है-

भगवान् राम के संस्कार ऋषि वशिष्ठ और कृष्ण के सभी संस्कार (sanskar) ऋषि संदीपनी द्वारा सम्पूर्ण कराये गए थे-ये संस्कार हमें समाज के अनुरूप चलना सिखाते है और हमारी दिशा बोध भी कराते है -क्युकि हमारी खुद की पहचान समाज ही निर्धारित करता है आप खुद कुछ भी नहीं है अगर ये समाज न हो ?

संस्कार (Sanskar) हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन की पहचान होते हैं भारतीय संस्कृति में मनुष्य को राष्ट्र, समाज और जनजीवन के प्रति जिम्मेदार और कार्यकुशल बनाने के लिए जो नियम तय किए गए हैं उन्हें संस्कार कहा गया है-प्रमुख रूप से सोलह संस्कार माने गए हैं जो गर्भाधान से शुरू होकर अंत्येष्टी पर खत्म होते हैं-संस्कारों से गुणों में वृद्धि होती है जिससे हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है-

कुछ जगह 48 संस्कार भी बताया गया है महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का उल्लेख किया है लेकिन महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार 16 संस्कार ही आज प्रचलित हैं-

कितने भारतीय संस्कार (Indian Sanskar) है-


1- गर्भाधान संस्कार
2- पुंसवन संस्कार
3- सीमन्तोन्नयन संस्कार
4-जातकर्म संस्कार
5- नामकरण संस्कार
6- निष्क्रमण संस्कार
7- अन्नप्राशन संस्कार
8- मुंडन संस्कार
9- कर्णवेध संस्कार
10-उपनयन संस्कार
11-विद्यारंभ संस्कार
12-केशांत संस्कार
13- समावर्तन संस्कार
14-विवाह संस्कार
15-विवाहाग्नि संस्कार
16-अंत्येष्टि संस्कार

आइये अब आप इन संस्कारों के बारे में भी समझ ले पहले लोग इन संस्कारों को कैसे किया करते थे आज पच्छिमी सभ्यता (Westen culture) में बहुत कुछ लोप होता जा रहा है जिसके परिणाम ये कह सकते है हम संस्कार विहीन होते जा रहे है-

गर्भाधान संस्कार क्या है-

मनुष्य जीवन के होने वाले संस्कार क्या हैं

पुरातन काल में दाम्पत्य बंधन में बंधे हुए माता-पिता (पति-पत्नी) अपने गुरु के साथ हवन-यज्ञ करते हुए ईश्वर से कर बद्ध प्रार्थना करते थे कि हमारे घर में पवित्र और पुण्यात्मा जैसे बच्चे का आगमन हो हर माँ-बाप की एक इक्षा होती है उत्पन्न होने वाला बालक संस्कारी हो तथा उसका खुशहाल जीवन हो-गर्भ-धारण के भी दिन और नियम बनाए गए है उन सभी रात्रियों में सम्भोग करने से बालक तेजस्वी और प्रतापी तथा आयुष्मान (Aayushmaan) होता था-आप निम्न पोस्ट से जानकारी  ले  सकते है-


पुंसवन  संस्कार क्या है-

पुंसवन संस्कार गर्भधारण के पश्चात किया जाने वाला विधान है बालक स्थिर हो सुंदर हो गुणवान हो इसके लिए भी यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है-

सीमन्तोन्नयन संस्कार क्या है-

ये संस्कार गर्भधारण के चौथे-छठवें-और आठवें माह में सम्पन्न कराया जाता है गर्भवती माता इसी समय से सभी आचार-विचार का पूर्ण रूप से पालन करती है उसका खान-पान-रहन-सहन व्यवहार सभी कुछ होने वाले बच्चे के अनुकूल हो क्युकि गर्भस्थ शिशु इस समय सीखने के काबिल हो जाता है-अभिमन्यु और भक्त प्रहलाद ने गर्भ में ही रहते हुए अपनी माँ से सीखा था-

जातकर्म संस्कार क्या है-

जन्म के पश्चात गर्भस्त्रावजन्य दोष दूर करने के लिए नालछेदन के पूर्व ही अनामिका अंगुली से शहद+घी+स्वर्ण चटाया जाता है एक भाग घी और चार भाग शहद से बालक की जीभ पर लिखा जाता है-

नामकरण संस्कार क्या है-

बालक के जन्म के बाद ग्यारहवे या सौ या फिर एक सौ एक दिन पर नामकरण संस्कार का विधान है ज्योतिष या विद्वान् के द्वारा बालक का नामकरण किया जाता है उसी समय नामकरण के पश्चात सूर्य दर्शन का भी विधान है बालक के नए नामकरण के बाद सभी लोग उसे अपना आशीर्वाद देते है और उसके स्वास्थ एवं सुख की मंगल-कामना की जाती है-नाम पवित्र रखने का विधान है जो देवताओं से सम्बंधित हो और बालक का नाम लेते समय ईश्वर का नाम आये -लेकिन बदलते वक्त पर सभी लोग अभिनेताओं से सम्बंधित उल्टे-सीधे नाम रखने लगे है -

निष्क्रमण संस्कार क्या है-

ये संस्कार बालक के जन्म के चौथे माह किया जाता है चूँकि हमारा शरीर पंचमहाभूत से बना है ये पंचमहाभूत -पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है और निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना-अत: बच्चे को पहली बार शुद्ध खुली हवा में लाया जाता है तथा देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि सभी देवता उसकी रक्षा करे-

अन्नप्राशन संस्कार क्या है-

इस संस्कार में नियम ये है कि बालक को सोने-चांदी के चम्मच से खीर चटाई जाती है चूँकि गर्भ में रहते हुए बालक के पेट में गंदगी चली जाती है अन्नप्राशन संस्कार बच्चे को शुद्ध भोजन कराने से होता है ये संस्कार छ: या सात माह की अवस्था में किया जाता है इसके बाद बालक अन्न ले सकता है उसी समय बच्चे के नए दांत का भी उदभव होता है-


मुंडन संस्कार क्या है-

वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार आदि नामों से इसे संबोधित किया जाता है-ये संस्कार बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारने को कहते हैं-इस संस्कार से सिर पे घने व नए बाल का आगमन तथा सिर का मजबूत होना और बुधि प्रखर होना आदि है -

कर्णवेध संस्कार क्या है-

कर्णवेध संस्कार का मतलब कान और नाक का छेदना है ये छ:माह के बाद से पांच वर्ष का बालक होने के बीच किया जाता है काफी जगह आज भी ये परम्परा प्रचलित है कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है और मस्तिष्क में जाने वाली रक्त का प्रवाह ठीक होता है अब तो वैज्ञानिकों ने भी कर्णभेद संस्कार का पूर्णतया समर्थन किया है और यह प्रमाणित भी किया है की इस संस्कार से कान की बिमारियों से भी बचाव होता है-


उपनयन संस्कार क्या है-

उप यानी पास और नयन यानी ले जाना-गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार- ये बालक के पांच वर्ष पूर्ण होने के बाद का विधान है इसमें यज्ञ करके बालक को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं ये जनेऊ पहना कर ही गुरु आश्रम जाने की प्रथा थी आज भी गुरुकुल में ये प्रथा जारी है जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं- ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं-पहला जन्म तो हमारे माता पिता ने दिया है लेकिन दूसरा जन्म हमारे आचार्य, ऋषि, गुरुजन देते हैं-उनके ज्ञान को पाकर हम एक नए मनुष्य बनते हैं इसलिए इसे द्विज या दूसरा जन्म लेना कहते हैं-

विद्यारंभ संस्कार क्या है-

शिक्षा का प्रारंभ होना ही विद्यारंभ संस्कार है जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है-गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे-वर्तमान समय में अधिकाँश लोगों ने गुरुकुल में शिक्षा नहीं पायी है इसलिए हमे अपने ही धर्म के बारे में बहुत बड़ी ग़लतफ़हमियाँ हैं और ना ही वर्तमान समय में हमारे माता-पिता को अपनी संस्कृति के बारे में पूर्ण ज्ञान है कि वो हमको हमारे धर्म के बारे में बता सकें-इसलिए बहुत से प्रश्न बालक के मन में ही आंदोलित होते रहते है जादा पूछने पर अभिभावक तो बस कभी- कभी मन्दिर जाने को ही "धर्म" कह देते हैं-ये हमारा दुर्भाग्य ही है आज वेदों के बारे में जानकारी का अभाव हो गया है-

समवर्तन संस्कार क्या है-

शिक्षा ग्रहण अवधि को सम्पूर्ण करने के उपरान्त ब्रम्हचारी बालक को सांसारिक दुनियां में लौटने को ही समवर्तन संस्कार कहते है यानि इसका आशय है ब्रह्मचारी को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षो के लिए तैयार करना है-गुरुकुल में बालक अपनी शिक्षा पूरी कर लेते हैं अर्थात उनको वेदों के अनुसार विज्ञान, संगीत, तकनीक, युद्धशैली, अनुसन्धान, चिकित्सा और औषधी, अस्त्रों शस्त्रों के निर्माण, अध्यात्म, धर्म, राजनीति, समाज आदि की उचित और सर्वोत्तम शिक्षा मिल जाती है उसके बाद यह संस्कार किया जाता है समवर्तन संस्कार में ऋषि, आचार्य, गुरुजन आदि शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा भी मांगते हैं-

विवाह संस्कार क्या है-

विवाह को शायद कुछ लोग समझौता समझते होगे लेकिन सनातन धर्म में विवाह को समझौता नहीं संस्कार कहा गया है पति-पत्नी साथ रह कर सृष्टि के विकास में भागीदारी करते है इसी से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है ये संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण  संस्कार  है विवाह के समय वेद-मन्त्रों में पति और पत्नी के लिए कर्तव्य दिए गए हैं और इन को ध्यान में रखते हुए अग्नि के सात फेरे लिए जाते हैं जैसे हमारे माता पिता ने हमको जन्म दिया वैसे ही हमारा कर्तव्य है की हम कुल परम्परा को आगे बढायें-हमारे समस्त ऋषियों की पत्नी हुआ करती थीं और ये महान स्त्रियाँ आध्यात्मिकता में ऋषियों के बराबर भी हुआ करती थीं-

वानप्रस्थ संस्कार क्या है-

ग्रहस्थ आश्रम की सभी जिम्मेदारियों का निर्वाह पूर्ण होने के बाद व्यक्ति को वानप्रस्थ आश्रम में जाने का विधान है यानी जंगल में माया मोह से मुक्त होकर अपनी मुक्ति का मार्ग प्राप्त करना-लेकिन आज परिस्थितियाँ अलग है तो भी व्यक्ति को सभी जिम्मेदारी को परिपूर्ण करने के उपरान्त सत्संग, गुरु की निकटता या घर में रह कर एकांत वासी बनकर-प्रभु साधना में लिप्त होना चाहिए-अब तक आपने दूसरों के लिए किया था अब आपको अपनी मुक्ति के लिए करना चाहिए-बस वही किया गया भक्ति और साधना से आपको ज्ञान द्वारा प्राप्त फल -मोक्ष प्रदान करने में सहायक है-

सन्यास संस्कार क्या है-

वानप्रस्थ संस्कार में जब मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके बाद वो सन्यास लेता है और सन्यासी का धर्म है की वो सारे संसार के लोगों को भगवान् के पुत्र पुत्री समझे और अपना बचा हुआ समय सबके कल्याण के लिए दे दे-ये सन्यास संस्कार 75 की वर्ष की आयु में होता है पर अगर इस संसार से वैराग्य हो जाए तो किसी भी आयु में सन्यास लिया जा सकता है और सन्यासी का धर्म है की वो धर्म के ज्ञान को लोगों में बांटे यही उसकी जान सेवा है आजकल सन्यासी नाममात्र को रह गए है अधिकतर इसकी आड़ में माया से लिप्त हैं और उनका व्यापार भी फल-फूल रहा है -

अंत्येष्टि संस्कार क्या है-

ये मनुष्य जीवन का अंतिम संस्कार है आज भी शवयात्रा के समय अग्नि लेकर जाने की परम्परा है-इसका तात्पर्य है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है ये अग्नि घर से ले जाने का विधान है और मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है लेकिन इस संस्कार से सिर्फ मृत शरीर नष्ट होता है आत्मा तो अजर-अमर है जो कभी नहीं मरती है अपने किये गए इस लोक के कर्म अनुसार ही दूसरी योनी में जन्म लेती है -

विस्तार पूर्वक समझाने के लिए समय मिला तो हम आपको "मृत्यु संस्कार" का पूरा ज्ञान अगली पोस्ट में अवस्य ही देगे-

विशेष-

मनुष्य जन्म आपको उत्तम कर्म करने के लिए ईश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है ताकि आप जन्म-मरण (Birth and death) के आवागमन से मुक्त हो सके-अच्छे कार्य और श्रद्धा-भक्ति से ही आप इससे मुक्त हो सकते है-लेकिन मनुष्य रूपी शरीर पा के भी लोग-माया-मोह -काम-क्रोध-लोभ-मद को नहीं छोड़ते है और जीवन के मूल उद्देश्य (Original objective) से भटक कर फिर योनियों में भ्रमण के लिए बाधित होते रहते है-

हमारा लेख अगर आपको उत्तम लगा है तो आप इसे औरों को भी शेयर कर सकते है वर्ना 'ॐ नम:शिवाय ' तो आप बोल ही सकते है-

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