श्राद्ध करने का क्या महत्व है

Shraddh-श्राद्ध के महत्व के बारे में कई प्राचीन ग्रंथों तथा पुराणों में वर्णन मिलता है शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों का श्राद्ध(Shraddh) मनाया जाता है उनके नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके मंत्रों द्वारा अन्न आदि उन्हें समर्पित किया जाता है वह उन्हें अलग-अलग रुपों में प्राप्त होता है पितरों की श्रेणी में मृत पूर्वजों माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी सहित सभी पूर्वज शामिल हैं शास्त्र के अनुसार मृत गुरु और आचार्य भी पितरों के श्रेणी में आते हैं-

Shraddh-श्राद्ध


मृतक व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार देव योनि मिलती है तो श्राद्ध(Shraddh) के दिन ब्राह्मण को खिलाया गया भोजन उन्हें अमृत रुप में प्राप्त होता है-

यदि पितर गन्धर्व लोक में है तो उन्हें भोजन की प्राप्ति भोग्य रुप में होती है तथा यदि पशु योनि में है तो तृण रुप में- सर्प योनि में होने पर वायु रुप में- यक्ष रुप में होने पर पेय रुप में- दानव योनि में होने पर माँस रुप में- प्रेत योनि में होने पर रक्त रुप में तथा मनुष्य योनि होने पर अन्न के रुप में भोजन की प्राप्ति होती है-

देवताओं से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है देवकार्य से भी ज्यादा पितृकार्य का महत्व होता है पितरों का आशीर्वाद आपके जीवन को सरल और उन्नतिवान बना देता है-

पूर्णिमा से लेकर अमावस्या के मध्य की अवधि अर्थात पूरे 16 दिनों तक पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये कार्य किये जाते है पूरे 16 दिन नियम पूर्वक कार्य करने से पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है इस वर्ष ये 15दिन की है नवरात्रि इस बार 10दिन की होगी-

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में Shraddh-श्राद्ध कर्म द्वारा पूर्वजों की मृत्यु तिथि अनुसार तिल, कुशा, पुष्प, अक्षत, शुद्ध जल या गंगा जल सहित पूजन, पिण्डदान, तर्पण आदि करने के बाद ब्राह्माणों को अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन, फल, वस्त्र, दक्षिणा आदि दान करने से पितृ दोष से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है यदि किसी को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो वह लोग इस समय अमावस्या तिथि के दिन अपने पितरों का श्राद्ध(Shraddh) कर सकते हैं और पितृदोष की शांति करा सकते हैं श्राद्ध समय सोमवती अमावस्या होने पर दूध की खीर बना, पितरों को अर्पित करने से पितर दोष से मुक्ति मिल सकती है-

विधि-विधान और नियम का सही से पालन श्राद्ध में करना-

  1. Shraddh-श्राद्ध में सात पदार्थ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जैसे- गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल-
  2. शास्त्रों के अनुसार तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं-
  3. तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं-
  4. सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं इनके अभाव में पत्तल का भी प्रयोग किया जा सकता है-
  5. रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं-
  6. आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए-
  7. केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है-
  8. चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी,अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं-


पुत्र के न होने पर कौन कर सकता है श्राद्ध(Shraddh)-

हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का स्थान सर्वोपरि माना जाता है शास्त्रों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान करना चाहिए- यही कारण है कि नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर माता- पिता करते है शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है-

  1. पिता का श्राद्ध(Shraddh) पुत्र को ही करना चाहिए-
  2. पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है-
  3. पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध(Shraddh) करना चाहिए-
  4. एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध(Shraddh) करता है-
  5. पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं-
  6. पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं-
  7. पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध(Shraddh) कर सकती है-
  8. पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है जब कोई पुत्र न हो-
  9. पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी Shraddh-श्राद्ध का अधिकारी है-
  10. गोद में लिया पुत्र भी Shraddh-श्राद्ध कर सकता है-
  11. कोई न होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का भी विधान है-


किस जगह श्राद्ध करें-

Shraddh-विधि किसी भी देवता के मंदिर में किसी भी नदी के तट पर कराई जा सकती है जहां कहीं भी योग्य पात्र तथा योग्य आचार्य इस विधि के ज्ञाता हों इस कर्म को कराया जा सकता है-

ख़ास कारण क्या है-

  1. यह विधि प्रेत बाधा दूर करने एवं परिजन को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए की जाती है असमायिक मृत्यु जैसे कि एक्सीडेंट, बीमारी, आत्महत्या या हत्या, पानी में डूबने से या जलने से साथ ही प्रसव के दौरान इत्यादि से होने वाली मृत्यु के कारण कोई भी जीव सद्गति को प्राप्त न कर प्रेत योनि में प्रवेश कर जाता है जीव को प्रेतयोनि में नाना प्रकार के कष्ट को भोगने पड़ते हैं जिसके कारण वह अपने परिवार के प्रियजनों को भी कष्ट देता रहता है जिसके कारण उस परिवार के वंशज विभिन्न प्रकार के कष्ट जिसमें शारीरिक, आर्थिक, मानसिक अशांति अथवा गृह-क्लेशों से गुजरते रहते हैं-
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