पांच दिन का पर्व दीपावली है Panch Din Ka Parv Dipavali Hai

दीपावली(Diwali)स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है और लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं तथा घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं लेकिन भारत में दीवाली(Diwali)पर्व के कितने दिन हैं आइये इस पर एक प्रकाश डालते है-

Dipavali


पहले दिन का नाम धनतेरस है इस दिन अर्थ-व्यवस्था का नया साल शुरू होता है तथा रोग से मुक्त रहे इसलिए भगवान् धन्वंतरी की पूजा का विधान है और दूसरा दिन नरक चतुर्दशी है जब श्री कृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने नरक राक्षस को परास्त कर दिया था तथा तीसरे दिन अमावस्या में लक्ष्मी का दर्शन किया जाता है तथा इस दिन में भी विष्णु की बली पर विजय उत्सव मनाया जाता है चौथे दिन राजा बली पाताल गया और वहाँ उसने नया राज्य किया-पांचवें दिन भाई दूज मनाने की परम्परा है-

धनतेरस या धन त्रयोदशी-

इस त्यौहार की तैयारी कई दिन पहले ही आरम्भ हो जाती है घर की लिपाई-पुताई होती है तथा रंग-रोगन होता है और घर की पूरी सफाई की जाती है-दिवाली से दो दिन पहले धन-तेरस अथवा धन त्रयोदशी का त्यौहार मनाया जाता है इस दिन नए बर्तन खरीदने की परंपरा है इस दिन स्वर्ण अथवा रजत आभूषण खरीदने का भी रिवाज है लोग अपनी-अपनी परम्परानुसार लोग सामान खरीदते है तथा संध्या समय में घर के मुख्य द्वार पर एक बडा़ दीया जलाया जाता है-

छोटी दिवाली-

बडी़ दिवाली से एक दिन पहले छोटी दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है इस दिन को नरक चतुर्दशी अथवा नरका चौदस भी कहते हैं इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था इसलिए इसे नरका चौदस कहा जाता है इस दिन संध्या समय में पूजा की जाती है और अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार दीये जलाए जाते हैं नरकासुर नामक राक्षस देवलोक एवं भूलोक में आंतक फैलाकर भगवान् कृष्णा का भी विरोध कर रहा था तथा उस ने 16000 महिलाओं को बंदी बनाकर रखा था-इस से क्रोधित होकर श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा से इसका वध कराया था-भूदेवी और भगवान् विष्णु को जन्मे पुत्र नरकासुर को अपनी माता के शिवाय किसी अन्य के हाथों न मर ने का वर प्राप्त था इसलिए श्री कृष्ण ने सत्यभामा के हाथों से नरकासुर का वध करवा कर मात्रभूमि की रक्षा की-

एक कारण यह भी बताया जाता है इन दिनों भगवान् वामन ने राजा बलि की पृथ्वी को नापा था भगवान् वामन ने तीन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी तथा बली के शरीर को नाप लिया था-इस लिए देवताओं ने हर्सोल्लास में भी दीप जलाकर इस पर्व को मनाया था-

बडी़ दिवाली-

इस दिन सुबह से ही घरों में चहल-पहल आरम्भ हो जाती है एक-दूसरे को बधाई संदेश दिए जाते हैं घर को सजाने का काम आरम्भ हो जाता है तथा संध्या समय में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी का पूजन पूरे विधि-विधान से किया जाता है-पूजन विधि में धूप-दीप,खील-बताशे,रोली-मौली,पुष्प आदि का उपयोग किया जाता है पूजन के बाद मिठाई खाने का रिवाज है बच्चे और बडे़ मिलकर खूब आतिशबाजी चलाते हैं बम-पटाखे फोड़ते हैं तथा इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं- दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है-

अन्नकूट या गोवर्धन पूजा-

दिवाली से अगले दिन अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है इस दिन मंदिरों में सभी सब्जियों को मिलाकर एक सब्जी बनाते हैं जिसे अन्नकूट कहा जाता है मंदिरों में इस अन्नकूट को खाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी होती है अन्नकूट के साथ पूरी बनाई जाती है कहीं-कहीं साथ में कढी़-चावल भी बनाए जाते हैं तथा इसी दिन गोवर्धन पूजा भी की जाती है गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है और उसे भोग लगाया जाता है उसके बाद धूप-दीप से पूजन किया जाता है फिर घर के सभी सदस्य इस गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं इसी दिन विश्वकर्मा दिवस भी मनाया जाता है इस दिन मजदूर वर्ग अपने औजारों की पूजा करते हैं फैक्टरी तथा सभी कारखाने इस दिन बन्द रहते हैं-

भैया दूज या चित्रगुप्त पूजा-

दिवाली का पर्व भैया दूज या यम द्वित्तीया के दिन समाप्त होता है यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वित्तीया को मनाया जाता है इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करती हैं और मिठाई खिलाती हैं भाई बदले में बहन को उपहार देते हैं इसी दिन कायस्थ समाज के लोग भगवान् चित्रगुप्त की पूजा अर्चना करते है जिसे कलम-दवात की पूजा के रूप में भी जाना जाता है-

इस त्यौहार को मनाने के संबंध में अनेक कहानियाँ है-


  1. दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है-
  2. कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए थे-
  3. एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था-
  4. इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए-
  5. जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है-
  6. सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था  और इसके अलावा 1619 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था-
  7. नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है-
  8. पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ था इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली थी महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की थी-
  9. दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था-बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे-
  10. मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे तथा शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे-

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