कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

बालक में अन्य संस्कारो की तरह कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)को भी आवश्यक माना ग़या है आज अब धीरे-धीरे आधुनिक युग में लोग इस संस्कार से विमुख होते जा रहे है प्राचीन काल मे कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)की इतनी महत्ता मानीं गयीं है कि जिस व्यक्ति ने कान नहीं छिदवाये उसे शास्त्रोनुसार श्राद् का अधिकारी ही नहीं माना गया है इसके अंतर्गत बालक या बालिका के कान छिदवाये जाते थे जिससे पुरुष को पूर्ण पुरुषत्व और स्त्रीं को पुर्ण स्त्रीत्व प्राप्ति हो इसके लिये कान छिदवाये जाते थे-

कर्ण छेदन संस्कार क्यों होता है

बालक के जन्म के छः मास से लेकर सोलह मास अथवा तीन-पांच-सात विषम वर्षो में या अपने कुल के रीति रिवाजों अनुसार कर्णछेदन संस्कार(Karnchedan Sanskar)करवाना आवयशक माना गया है लेकिन कान क्यो छेदा जाता था ? आखिर यह प्रथा क्यो थी ?सभी जानते है कि जब भी कोई प्रथा जन्म लेती है उसके पीछे कोई ना कोई मूल कारण अवश्य ही होता है फिर चाहे वह आस्था हो धर्म हो या फ़िर विज्ञान हो इस विषय पर लोगो के विचार भी अलग-अलग होते है बस इसमें अपना-अपना विश्वास निहित होता है-

कारण(Reason)और मत-


1- प्राचीन काल मे हमारी चिकित्सा पद्धति इतनी विकसित नही थीं जिस्के काऱण बच्चोँ को बहुत से रोग हुआ करते थे तथा इन रोगों से असमय बालकों की अकाल मृत्यु हो जाया करती थी और तब शिक्षा का विकसित अभाव था अशिक्षित लोग अकाल मृत्यु को लोग दानवीय शक्ति समझते थे उनका मानना था कि धातु से दानवीय शक्ति दूर रहतीं है अतः वे अपने बच्चो के कान छिदवाकर धातु से बनीं कोई वस्तु पहना देते थे आज भी देखने मे आता है कि छोटे बच्चो के पास लोहे का छोटा चाकू रख दिया जाता है या फिर उनके गले मे पहना दिया जाता है मान्यता ये है कि इससें बुरी नज़र से उनकी बच्चो कि रक्षा होती है-

2- कुछ लोगों के मतानुसार सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड से प्रकृति और प्रकृति से मानव का जन्म हुआ था परन्तु उसका मस्तिष्क आज की तरह इतना विकसित नहीं था वह प्राक़ृतिक आपदाओं को अपने कुल देवताओं का प्रकोप मानता था और उन्हे प्रसन्न करने के लिये नर बलि दिया करता था और अबोध् बालक इसके शिकार हुआ करते थे परन्तु शर्त यह होती थी की जिसकी बलि दी जानी है उसका अंग भंग नहीं होना चाहिये और ना न ही कोई कट का निशान होना चहिये ये भी परम-आवश्यक था अंत: माता-पिता अपने बच्चों को नर बलि से बचाने के लिये उनके कान छिदवा देते थे जिससे उन्हे बलि के अपात्र माना जाये और उनकी बलि न दी जा सके-

3- एक अन्य मत के अनुसार इसे स्वास्थ्य कि द्रष्टि से भी उपयोगी माना गया है इस मत के अनुसार कान छेदने से स्वस्थ्य की रक्षा होती है समुंदर किनारे बसीं अनेक प्रजातिया ऐसा मानती थी कि कान छेदने से उनके देख़ने की शक्ति बढ़ जाती है इसलीये मछुआरे अपनें बच्चो के कान छेद दिया करते थे ताकि उनके देखने की शक्ति तीव्र हो जाये और दूर तक देख सके-

4- एक मत के अनुसार एक्यूपंक्चर विद्या पांच हज़ार साल से भी पुरानी है इस पद्धति मे शरीर के विभिन्न अंगो पर सुई चुभोकर रोग उपचार तथा स्वास्थ के अन्य रोगों का उपचार किया जाता था  उस समय जड़ी बूटियो का प्रयोग सीमित था तथा महिलाओं मे गर्भ के समय और प्रसव के बाद की जागरुकता न होने के कारण बच्चों मे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती थी तथा वो जल्दी बीमार हो  जाते थे तब कान छेदन से उनक़ी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती थी तथा वो अकाल मृत्यू से बच जाते थे-

5- आज कई देशो मे तथा अनेक जन-जातियों मे एव कई वर्गो मे कान छिदवाने कि परंम्परा है कई लोग तो फैशन या सून्दर दिखने के लिये भी कान छिदवाते है और आजकल तो लोग कान के साथ साथ नाक जीभ होठ नाभि आदि भीं छिदवाते  है इस बारे मे आम आदमी कि यह जिज्ञासा रहती है कि आखिर कान ही क्यो छिदवाते है चूँकि कान की त्वचा अति मुलायाम होती है और ये हमारी पंच ज्ञानेन्द्रियों मे से एक है इसके छेदन से एकाग्रता तथा मानसिक एव आध्यात्मिक विकास होता है तथा स्मरण शक्ति भी तीव्र होती है और बच्चोँ मे ये गुण परिपूर्ण रहे इसलिए कान के लोर मे छेद कियां जाता है ये भी सत्य है कि कान छेदन से फेफडे,हृदय,सिर,मत्था,गलां,हाँथ पैर अंगुलियां आदि का ऊपचार अति प्रभावी पाया ग़या है-

6- कान के चारो और तेल से या सूखे मालिश करना कान को मरोड़ना खीचना,नहाते समय कान के चारोँ तरफ रगड़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और देखने कि क्षमता बढ़ती है तथा निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है और दिमाग शक्तिशाली बनता है नींद न आना आदि में कर्ण छेदन अति उपयोगी है-

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