तुलसी के नाम और माहात्म्य

जीवन की सफलता मन की एकाग्रता पर बहुत कुछ निर्भर करती है यदि मन एकाग्र न हो तो मनुष्य न तो भजन, पूजन, आराधना और चिन्तन-मनन कर सकता है न ही अध्ययन कर सकता है शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है इस कारण घर में तुलसी(Tulsi)हो तो कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए और यदि ये बातें ध्यान रखी जाती हैं तो सभी देवी-देवताओं की विशेष कृपा हमारे घर पर बनी रहती है-

तुलसी के नाम और माहात्म्य

हमारे भारतीय चिकित्सा विज्ञान(आयुर्वेद)का सबसे प्राचीन और मान्य ग्रंथ चरक संहिता में तुलसी के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-

हिक्काल विषश्वास पार्श्व शूल विनाशिनः।
पितकृतात्कफवातघ्र सुरसः पूर्ति गंधहा।।

अर्थात् तुलसी हिचकी, खांसी, विष विकार, पसली के दाह को मिटाने वाली होती है इससे पित्त की वृद्धि और दूषित कफ तथा वायु का शमन होता है-

भाव प्रकाश में तुलसी को रोगनाशक, हृदयोष्णा, दाहिपितकृत शक्तियों के सम्बन्ध में लिखा है-

तुलसी कटुका तिक्ता हृदयोष्णा दाहिपितकृत।
दीपना कष्टकृच्छ् स्त्रार्श्व रुककफवातेजित।।

अर्थात् तुलसी कटु, तिक्त, हृदय के लिए हितकर, त्वचा के रोगों में लाभदायक, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली मूत्रकृच्छ के कष्ट को मिटाने वाली होती है यह कफ और वात सम्बन्धी विकारों को ठीक करती है-

धन्वंतरि निघुंट में कहा गया है-

तुलसी लघु उष्णाच्य रूक्ष कफ विनाशिनी।
क्रिमिमदोषं निहंत्यैषा रुचि वृद्वंहिदीपनी।।

तुलसी, हल्की, उष्ण रूक्ष, कफ दोषों और कृमि दोषों को मिटाने वाली अग्नि दीपक होती है-

1- सामान्य रूप से तुलसी के दो ही भेद जाने जाते हैं जिन्हें रामा और श्यामा कहते हैं-रामा के पत्तों का रंग हलका होता है जिससे उसका नाम गौरी पड़ गया है तथा श्यामा अथवा कृष्णा तुलसी के पत्तों का रंग गहरा होता है और उसमें कफनाशक गुण अधिक होता है इसलिए औषधि के रूप में प्रायः कृष्णा तुलसी का ही प्रयोग किया जाता है इसकी गंध व रस में तीक्ष्णता होती है-

2- तुलसी की अन्य कई प्रजातियाँ होती हैं एक प्रजाति ‘वन तुलसी’ है जिसे ‘कठेरक’ भी कहते हैं इसकी गंध घरेलू तुलसी की अपेक्षा कम होती है और इसमें विष का प्रभाव नष्ट करने की क्षमता होती है-रक्त दोष, नेत्रविकार, प्रसवकालीन रोगों की चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी होती है-

3- दूसरी जाति को ‘मरुवक’ कहते हैं-राजा मार्तण्ड ग्रन्थ में इसके लाभों की जानकारी देते हुए लिखा गया है कि हथियार से कट जाने या रगड़ लगकर घाव हो जाने पर इसका रस लाभकारी होता है तथा किसी विषैले जीव के डंक मार देने पर भी इसका रस लाभकारी होता है-

4- तीसरी जाति बर्बरी या बुबई तुलसी की होती है इसकी मंजरी की गंध अधिक तेज होती है तथा इसके बीज अत्यधिक वाजीकरण माने गए हैं-

5- अनेक हकीमी नुस्खों में बर्बरी प्रयोग होता है वीर्य की वृद्धि करने व पतलापन दूर करने के लिए बर्बरी जाति की तुलसी के बीजों का प्रयोग किया जाता है इसके अलावा तुलसी की एक कृमिनाशक जाति भी होती है-

तुलसी के अन्य नाम-


तुलसी के कई नाम हैं जो इसके गुणों का इतिहास बताते हैं वेदों, औषधि-विज्ञान के ग्रंथों और पुराणों में इसके कुछ प्रमुख नाम-गुण इस प्रकार हैं-

कायस्था- क्योंकि यह काया को स्थिर रखती है-

तीव्रा- क्योंकि यह तीव्रता से असर करती है-

देव-दुन्दुभि- इसमें देव-गुणों का निवास होता है-

दैत्यघि- रोग-रूपी दैत्यों का संहार करती है-

पावनी- मन, वाणी और कर्म से पवित्र करती है-

पूतपत्री- इसके पत्र(पत्ते) पूत (पवित्र) कर देते हैं-

सरला- हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है-

सुभगा- महिलाओं के यौनांग निर्मल-पुष्ट बनाती है-

सुरसा- यह अपने रस (लालारस) से ग्रन्थियों को सचेतन करती है-

तुलसी(Tulsi)का माहात्म्य-


1- तुलसी आपके  मन में बुरे विचार नहीं आने देती और रक्त-विकार शान्त करती है तथा त्वचा और छूत के रोग नहीं होने देती-

2- तुलसी की कंठी माला आपको सभी प्रकार के कंठ रोगों से आपको बचाती है-

3- तुलसी आपके शरीर में कामोत्तेजना नहीं होने देती है लेकिन ये आपको  नपुंसक भी नहीं बनाती है-

4- तुलसी-दल चबाने वाले के दांतों को कीड़ा नहीं लगता है लेकिन इसे चबाने के बाद आपको तुरंत कुल्ला करना चाहिए क्युकि तुलसी में पारे की मात्रा होती है जो आपके दांतों के इनेमल के लिए नुकसान दायक है-

5- तुलसी की सेवा करने वाले मनुष्य को क्रोध कम आता है यानी ये आपको मन और बुधि से शांत-चित्त बनाती है-

6- तुलसी की माला, कंठी, गजरा और करधनी पहनना शरीर को निर्मल, रोगमुक्त और सात्विक बनाता है इसलिए वैष्णव भक्त तुलसी की माला गले में धारण करते है-

7- कार्तिक महीने में जो तुलसी का सेवन करता है उसे साल भर तक डॉक्टर-वैद्य, हकीम के पास जाने की जरूरत नहीं पड़तीं है-

8- तुलसी को अंधेरे में तोड़ने से शरीर में विकार आ सकते हैं क्योंकि अंधकार में इसकी विद्युत लहरें प्रखर हो जाती हैं-

9- तुलसी का सेवन करने के बाद दूध न पीएं इससे आपको चर्म-रोग हो सकते हैं-

10- कार्तिक महीने में यदि तुलसी-दल या तुलसी-रस ले चुकें हों तो उसके बाद पान न खाएं-ये दोनों गर्म हैं और कार्तिक में रक्त-संचार भी प्रबलता से होता है इसलिए तुलसी के बाद पान खाने से परेशानी में पड़ सकते हैं-

11- तुलसी-दल के जल से स्नान करके कोढ़ नहीं होता है-

12- सूर्य-चन्द्र ग्रहण के दौरान अन्न-सब्जी में तुलसी-दल इसलिए रखा जाता है कि सौरमण्डल की विनाशक गैसों से खाद्यान्न दूषित न हो-

13- जीरे के स्थान पर पुलाव आदि में तुलसी रस के छींटे देने से पौष्टिकता और महक में दस गुना वृद्धि हो जाती है-

14- तेजपात की जगह शाक-सब्जी आदि में तुलसी-दल डालने से मुखड़े पर आभा, आंखों में रोशनी और वाणी में तेजस्विता आती है-

15- तेल, साबुन, क्रीम और उबटन में तुलसी, दल और तुलसी रस का उपयोग, तन-बदन को निरोग, सुवासित, चैतन्य और कांतिमय बनाता है-

16- आपके स्वभाव में सात्विकता लाने वाला केवल यही पौधा है-तुलसी केवल शाखा-पत्तों का ढेर नहीं ये आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है-

17- तुलसी के आगे खड़े होकर पढ़ने, विचारने दीप जलाने और पौधे की परिक्रमा करने से दसों इन्द्रियों के विकार दूर होकर मानसिक चेतना मिलती है-


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