बच्चों में सूखा रोग या कुपोषण क्या है

बच्चों में सूखा रोग(Rickets)एक हड्डियों का रोग है जो प्राय: बच्चों में होता है हड्डियों के कमजोर होने को सूखा रोग कहते हैं परिणामस्वरूप अस्थिविकार होकर पैरों का टेढ़ापन और मेरूदंड में असामान्य मोड भी आ जाते हैं इससे छोटे बच्चों में कुपोषण और उम्र के हिसाब से ग्रोथ कम होती है-

बच्चों में सूखा रोग या कुपोषण क्या है

दुर्भाग्य से यह रोग हमारे देश के बालकों में बहुत होता है और हमने देखा है कि सूखा रोग से पीड़ित सौ में निन्यानवे बालक अच्छे होते ही नहीं हैं दैवयोग से सौ में कोई एक आधा ही बच पाता है इस रोग को वैद्यकशास्त्र में “शोष” कहते हैं यह एक प्रकार से क्षय रोग का ही भेद है जिस प्रकार क्षयरोग(तपेदिक) असाध्य होता है ठीक उसी प्रकार बालकों को सूखा रोग(Rickets)भी असाध्य रोगों की श्रेणी में रक्खा जाता है-

सूखा रोग(Rickets)क्यों होता है-


सूखा-रोग होने के मुख्यत: ये तीन कारण हैं-

माता के पोषकतत्व-हीन दूषित दूध का सेवन-
दूषित ऊपरी दूध का सेवन-
दूसरे सूखा ग्रस्त रोगियों के सम्पर्क में बच्चे का आना-

1- यह रोग बच्चों को दूध की खराबी से होता है बच्चे तो किसी प्रकार का कुपथ्य करते नहीं हैं किन्तु उनको दूध पिलाने वाली उनकी माँ कुपथ्य कर लेती हैं जो छोटे-छोटे बालक अपनी माँ का दूध पीते हैं उनको शरीर की वृद्धि और पोषण के लिये अच्छा दूध मिलना चाहिये तथा जो स्त्रियाँ अनेक प्रकार के खट्टे, बासी, अजीर्णकारक, दूध को दूषित करने वाले पदार्थ खाती हैं अथवा अतिचिन्ता, क्रोध, शोक, ईर्ष्या, द्वेष, कलह और कामवासना से ग्रस्त रहती हैं उनका दूध दूषित हो जाता है और दूषित दूध के पीने से बालकों को अजीर्ण, ज्वर, खाँसी, मोतीझरा, आदि अनेक रोग हो जाते हैं अतः दूध पिलाने वाली माताओं को चाहिए कि वे जब तक बच्चों को अपना दूध पिलावें तब तक ऊपर लिखे हुए दूध को बिगाड़ने वाले अजीर्ण आदि कुपथ्य सेवन से बचती रहें और सदा शुद्ध, ताजा दुग्धवर्द्धक अग्निप्रदीपक आहार ही सेवन करें-

2- बालक के जन्म बाद स्त्रियों का शरीर अत्यन्त दुर्बल और अशक्त हो जाता है उस समय उनके शरीर की पुष्टि के लिये आहार और विश्राम तथा उचित परिचर्या की आवश्यकता होती है यदि उस समय जरा भी असावधानी से काम लिया जाय तो प्रसूता (जच्चा) को ज्वर, खाँसी, दस्त, क्षय (तापेदिक) आदि रोग शीघ्र ही पैदा हो जाते हैं रोगी होने से प्रसूता(जच्चा)का दूध भी रोगी हो जाता है और उस दूध में रोग के साथ साथ बालक के शरीर की पुष्टि व वृद्धि करने वाले पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है उस रोगी का सारहीन दूध के पीने से बालक को सूखारोग(Rickets)हो जाता है-

3- छह महीना, नौ महीना अथवा एक वर्ष तक या जब तक बालक माता का दूध पीये तब तक-बच्चे की माँ को चाहिए कि वह दूध दलिया आदि दुग्धवर्धक और दुग्धपोषक पदार्थों का सेवन अवश्य किया करे-बच्चे के शरीर की वृद्धि के लिये दूध में पोषक तत्वों का होना अति अत्यावश्यक है पोषक तत्वहीन दूध को पीने वाले बालकों के शरीर रस, रक्त, माँस, चरबी, हड्डी, मज्जा आदि धातुओं की वृद्धि होना बन्द हो जाती है-

4- जिन माताओं के स्तनों में दूध कम उतरता है अथवा जो अपनी बीमारी या कमजोरी से अपना दूध नहीं पिला सकतीं हैं तथा वे बालक को ऊपर का दूध पिलाती है चूँकि ऊपर के दूध में गाय, बकरी या बाजार में गाय, भैंस, बकरी, भेड़ का मिला हुआ दूध होता है लेकिन एक बात ये भी सत्य है कि हमारे यहाँ अधिकतर माताओं को बच्चों के दूध पिलाने का सही ढंग नहीं मालूम होता है इस विषय में माताओं को बहुत जानकारी की आवश्यकता है- 

5- जन्म से ही बालक को ऊपर का दूध पिलाना अच्छा नहीं है हमारा तो यह विचार है कि माताओं को कम से कम छह मास अथवा नौ मास तक शिशु को अपना ही दूध पिलाना चाहिये क्योंकि शिशु को जैसा अनुकूल अपनी माँ का दूध होता है वैसा और नहीं होता है यदि माता के दूध कम उतरे अथवा रोग आदि से दूषित हो तो उन्हें योग्य चिकित्सक से चिकित्सा कराकर उस दूध के दोषों को दूर करना चाहिये-

6- नौ मास या 12 मास का बालक इस योग्य हो जाता है कि वह ऊपर के दूध को पचा सकता है बालक को यदि ऊपर का ही दूध पिलाना हो तो गाय या बकरी का ताजा दूध लेकर उसमें थोड़ा जल मिलाकर मन्द अग्नि से औटाकर उसमें किंचित मीठा मिलाकर थोड़ा थोड़ा पिलाना चाहिए-

7- छोटा बालक किसी रोगी बालक या पुरुष-स्त्री के पास रहता है और उस रोग से पीड़ित रोगी का झूठा जल, दूध अन्न आदि वस्तु खा लेता है तो भी उसके शरीर में उस रोग के कीटाणु बहुत शीघ्रता से प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं अतः माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने नौनिहाल को रोगी मनुष्यों या रोगी बालकों से सदा अलग ही रखा करें-

बच्चों में सूखा रोग(Rickets)के लक्षण-


सूखा रोग से ग्रसित बालक का शरीर बहुत ही दुर्बल हो जाता है तथा उसे हर समय थोड़ा बहुत ज्वर बना रहता है और दिन रात में कभी तेज भी हो जाता है तथा उस बच्चे को खाँसी रहती है खाँसी में कभी कफ आता है कभी नहीं आता है खाँसी के विकार से फुफ्फुस (फेफड़ों) में कफ (बलगम) बोलता रहता है तथा पेट कड़ा हो जाता है और पेट में अजीर्ण से मल की गांठें पड़ जाती हैं कभी कभी अपने आप पतले दस्त भी हो जाते हैं बच्चे को कभी भूख लगती है तो कभी नहीं लगती है  प्रायः अरुचि ही रहा करती है यहाँ तक कि माँ का दूध भी पच नहीं पाता है तथा बच्चे का स्वभाव चिड़चिड़ा और रूखा हो जाता है वह हर समय रें-रें किया करता है शरीर में रक्त-माँस की कमी हो जाती है, और उसके हाथ पाँव सूख कर पतले लकड़ी से हो जाते हैं पीठ, रीढ़ कमर आदि अंगों का माँस सूख जाता है और बैठक की जगह खाल लटक कर सलवटें पड़ जाया करती है तथा बच्चे की आवाज (स्वर) बहुत क्षीण हो जाती है तथा वह हर प्रकार से अशक्त हो जाता है-

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