दांतों की फिलिंग क्यों आवश्यक है

Why is Teeth Filling Essential


यदि आप दांतों में फिलिंग (Filling) न कराएं तो दांत में ठंडा-गरम और खट्टा-मीठा लगता रहेगा और इसके बाद दांत में दर्द होने लगता है तथा पस बन जाता है और फिर रूट कनाल ट्रीटमंट की नौबत आ जाती है इसका मतलब आप जितनी जल्दी फिलिंग कराएं आपके लिए उतना अच्छा है लेकिन समस्या ये है कि अब आप कौन सी फिलिंग (Filling) कराएं-

दांतों की फिलिंग क्यों आवश्यक है

अस्थायी फिलिंग (Temporary Filling)-


अस्थायी फिलिंग (Temporary Filling) उस वक्त करते हैं जब दांत में काफी गहरी कैविटी हो तब सेंसटिविटी नहीं होने पर परमानेंट फिलिंग कर देते हैं अगर इसके बाद भी दिक्कत होती है तो रूट कनाल या फिर दांत निकाला जाता है-

सिल्वर फिलिंग (Silver filling)-


से एमैल्गम (Malgm) भी कहते हैं इसमें सिल्वर, टिन, कॉपर को मरकरी के साथ मिक्सचर करके तैयार किया जाता है लेकिन पहले कीड़े की सफाई और कैविटी कटिंग की जाती है इसके बाद जिंक फॉस्फेट सीमेंट की लेयर लगाई जाती है क्युकि फिलिंग में इस्तेमाल होने वाली मरकरी जड़ तक पहुंचकर नुकसान न पहुंचाए तब इसके बाद एमैल्गम भरा जाता है आप इस फिलिंग को कराने के एक घंटे तक कुछ न खाएं फिर फिलिंग वाली दाढ़ के दूसरी तरफ से खा सकते हैं तथा 24 घंटे बाद फिलिंग वाले दांत से भी आप खा सकते हैं यह दूसरी अन्य फिलिंग्स से सस्ती और ज्यादा मजबूत होती है लेकिन यह ग्रे/ब्लैक होती है और देखने में खराब लगती है क्युकि इसे मरकरी से मिक्स किया जाता है-

कंपोजिट फिलिंग (Composite Filling)-

इस कंपोजिट फिलिंग (Composite Filling) को Cosmetic या Tooth-Colored Filling भी कहते हैं इसे बॉन्डिंग टेक्निक और Light Cure Method से तैयार किया जाता है-

कैसे करते है-


इसमें सबसे पहले कैविटी कटिंग की जाती है फिर सरफेस (Surface) को फॉस्फेरिक एसिड के साथ खुरदुरा किया जाता है इससे सरफेस एरिया बढ़ने के अलावा मटीरियल अच्छी तरह सेट हो जाता है इसके बाद मटीरियल भरा जाता है-कंपोजिट फिलिंग (Composite Filling) छोटी-छोटी मात्रा में कई बार मेटीरियल भरा जाता है इसको हर बार करीब 30 सेकंड तक एलईडी लाइट गन की नीली रोशनी से उसे पक्का किया जाता है इसके बाद उभरी सतह को घिसकर शेप दी जाती है और फिर पालिसिंग (Polishing) होती है आप तुरंत बाद खा सकते हैं यह टूथ कलर की होती है पता भी नहीं चलता कि फिलिंग की गई है यह टिकाऊ होती है लेकिन आजकल अब नैनो तकनीक (Nanotechnology) का मटीरियल आने से यह फिलिंग और भी बेहतर हो गई है-

नुकसान से बचें-


फिलिंग कराते हुए दांत सूखा होना चाहिए वरना मटीरियल निकलने का डर होता है बच्चों में यह Composite Filling नहीं की जाती है ये फिलिंग आमतौर पर उन्हीं दांतों में की जाती है जिनसे खाना चबाते हैं-

जीआईसी फिलिंग (GIC Filling)-


इसका नाम ग्लास इनोमर सीमेंट फिलिंग है ज्यादातर बच्चों में या बड़ों में कुछ सेंसेटिव दांतों में की जाती है इसमें सिलिका होता है और यह हल्की होती है इसलिए चबाने वाले दांतों में यह फिलिंग नहीं की जाती फिलिंग कराने के एक घंटे बाद तक कुछ न खाना बेहतर रहता है यह सेल्फ क्योर और लाइट क्योर दोनों तरीकों से लगाई जाती है इसमें मौजूद फ्लोराइड आगे कीड़ा लगने से रोकता है इसलिए इसे प्रिवेंटिव फिलिंग (Preventive filling) भी कहा जाता है-

नुकसान-


यह सफेद होती है पर दांतों के रंग से मैच न करने से देखने में अच्छी नहीं लगती है और सभी दांतों में इसे नहीं भरा जाता है चबाने और सामने वाले दांतों में इसके इस्तेमाल से बचा जाता है क्यूंकि यह ज्यादा मजबूत नहीं होती है वैसे अब जीआईसी फिलिंग में भी दांतों के रंग के शेड आने लगे हैं-

कब निकल जाती है फिलिंग-


जब फिलिंग को पूरा सपोर्ट न मिला हो या सही मटीरियल और तकनीक इस्तेमाल न की गई हो तो ये समस्या होती है या फिर फिलिंग कराते हुए दांत सूखा न रहा हो या उसमें लार आ गई हो अथवा दांत और फिलिंग के बीच गैप आने से माइक्रो लीकेज हो जाए या फिर अगर कैविटी की शेप और साइज ठीक न हो या कैविटी काफी बड़ी हो-

फिलिंग से जुड़े दो और जरूरी बात-


फिलिंग कराने के बाद कई बार दांत में सेंसिटिविटी आ जाती है दांत पर ठंडा-गर्म महसूस होने लगता है अगर यह कुछ दिनों में ठीक न हो तो फिर आप डॉक्टर को अवश्य दिखाएं-

फिलिंग कराने के बाद कीड़ा बढ़ता नहीं है लेकिन कई बार थोड़ी-बहुत लीकेज हो सकती है तथा कई बार फिलिंग के नीचे ही कीड़ा लग जाता है यदि फिलिंग पुरानी हो गई है तो अवश्य ही चेक करानी चाहिए-

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