सुबह जलसेवन की आयुर्वेदिक शास्त्रोक्त संकल्पना


आजकल कई लोग है जो सुबह उठकर खाली पेट तथा बासी मुंह 3 से 4 गिलास पानी पीते हैं और साथ में लोगों को भी ऐसा करने की सलाह देते हैं लेकिन उनको तथा यह सलाह देने वाले लोगों को शायद ही इसके पीछे का शास्त्र, योग्य पद्धति तथा प्रयोजन का पता होता है आप सभी जानते है कि सुबह जलसेवन को संस्कृत में उष:पान कहा गया है तो आज हम इसी उष:पान पर चर्चा करेगें-

सुबह जलसेवन की आयुर्वेदिक शास्त्रोक्त संकल्पना

दरअसल यह सलाह मुख्य रूप से आधुनिक चिकित्सा पद्धति से आई हुई है और उनका कहना है कि ज्यादा पानी पीने से शरीर के विषैले तत्व ज्यादा प्रमाण में या आसानी से शरीर के बाहर निकल जाते हैं उनकी सलाह के पीछे उनकी पाश्चात्य जीवन शैली तथा खान-पान मुख्य कारण है जिसकी चर्चा हम अगले किसी लेख में विस्तार से करेंगे फिलहाल विषयांतर ना करते हुए हम उष:पान के बारे में आयुर्वेद में क्या कहा है तथा पानी कैसे कितना और क्यों पीना चाहिए उसके बारे में आपको विस्तार से इस लेख में जानकारी देंगे-

दवा या चिकित्सा कर्म-


जब कोई रोगी हमारे पास बहुमूत्रता, पुरानी सर्दी, सूजन, किडनी की कम कार्यशीलता, अजीर्ण तथा अन्य बीमारियों की समस्या लेकर आते हैं और हम उनके जीवन शैली व रूटीन के बारे में विस्तार से जानते हैं तब हम उनको सुबह का उष:पान बंद करने को कहते हैं और लोगो को बेहद आश्चर्य होता है कि उष:पान बंद करते ही उनकी उपरोक्त समस्याएं आश्चर्यजनक रूप से  कम होने लगती है-

सबसे पहले तो हमें यह ध्यान में लेना होगा कि आयुर्वेद की औषधिया, औषधि कर्म का निर्धारण तथा आहार-विहार की पद्धति भी हर एक व्यक्ति की उम्र, रोग तथा प्रकृति देखकर ही निर्धारित होती है क्योंकि हर व्यक्ति की प्रकृति अलग-अलग होती है इसीलिए जो दवा या चिकित्सा कर्म किसी एक व्यक्ति को लाभदायी है वह दूसरे को लाभ करेगा ही ऐसा नहीं है-

जब जल तत्व या कफ के अधिकता वाली प्रकृति का व्यक्ति अगर जरूरत से ज्यादा या बिना प्यास के ज्यादा पानी पिएंगे तो निश्चित ही शरीर में ठंड (Coldness) बढ़ेगी, किडनी और ब्लैडर पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा, कफ बढ़ेगा, फेफड़े कमजोर होंगे व इसकी वजह से दूसरी कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा-क्योंकि यह क्रियाएं शरीर में धीरे-धीरे होती है इसीलिए इसका असली कारण लोगों को पता नहीं चल पाता और प्रज्ञापराध के चलते शरीर स्वस्थ होने की जगह रुग्ण होता चला जाता है-तो आइये जाने की इस विषय पर आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ क्या कहते हैं-

सुबह जलसेवन (उषा:पान) की आयुर्वेदिक शास्त्रोक्त संकल्पना-


सुबह जलसेवन की आयुर्वेदिक शास्त्रोक्त संकल्पना

    विगत घन निशीथे प्रात रुत्थाय नित्यं
    पिबति खलू नरो यो घाणरेंद्रेंण वारि|
    स भवति मतिपूर्ण: चक्षुषा ताक्षर्यतुल्यो
    वलिपलितविहीन: सर्वरोगोंविमुक्त: || (भावमिश्र)

अर्थात-

मध्य रात्रि के बाद ब्रह्म मुहूर्त या सुबह 3:00 से 5:00 के बीच (4:00 बजे का समय उत्तम) जो व्यक्ति अपनी नासिका द्वारा पानी पीता है वह संपूर्ण बुद्धिशाली बनता है जिसकी आंखें तेजोमयी घाणेन्द्रिया (Sense Organs) सतेज व प्रखर बनती है तथा वह व्यक्ति नए व पुराने समस्त रोगों से मुक्त रहता है-

हमारी नाक तथा आंखों के ज्ञानतंतु या नसें (Nerve) एक दूसरे से जुड़े हुए हैं पिछले लेख में हमने आपको बताया था की  नाक का सीधा संबंध हमारे मस्तिष्क से है जब नासिका द्वारा शरीर तथा प्रकृति के सामान्य नियम तथा आदत के विपरीत पानी अंदर खिंचा जाता है तब नासिका के अंदरुनी पटल की तंत्रिकाओ (Nerve) पर दबाव पडकर हो झंकृत (Stimulate) होते हैं जिससे मस्तिष्क वहां खून का संचार (Blood Circulation) बढ़ा देता है जिस से आंख, नाक, कान, मुख व दिमाग के रोग व दोष दूर होते हैं-

ऋषि मुनियों का मत है कि ब्रह्म मुहूर्त अमृतवेला है इस समय मस्तिष्क से तालु के भाग से एक अमृत स्त्राव रिसता है जब उपर बताई गई शास्त्रोक्त विधी से उष:पान करते हैं तब यह स्त्राव नासिका से खींचे पानी में मिलकर शरीर में पहुंचता है व एक उत्तम अमृत रसायन की तरह काम करता है तथा शरीर व मन के समस्त रोगों को दूर करता है आधुनिक विज्ञान इस अमृतस्त्राव को ही शायद सेलिब्रो स्पाइनल फलुइड (Cerebrospinal Fluid) कहता हैं-

कहने का तात्पर्य यह है कि शास्त्रोक्त वर्णन के अनुसार अगर उचित समय पर उचित तरीके से नासिका द्वारा उष:पान किया जाए तो सिर, आंख, नाक, मुंह, कान के समस्त रोगों को नष्ट किया जा सकता है-

सुबह जलसेवन की आयुर्वेदिक शास्त्रोक्त संकल्पना

जैसा कि आयुर्वेद में बिना भूख के भोजन करना वर्जित बताया हैं वैसे ही बिना प्यास के पानी पीने को निषिद्ध, प्रज्ञापराध व विविध रोगों की उत्पत्ति का कारण बताया है-आयुर्वेद की संहिताओं में स्पष्ट वर्णन है कि भूखे पेट या खाली पेट पानी नहीं पीना चाहिए-

चरक संहिता के मुताबिक तंदुरुस्त व्यक्ति ने भी शरद तथा ग्रीष्म ऋतु के सिवाय बाकी ऋतुओ में थोड़ा ही पानी पीना चाहिए साथ ही साथ जिन व्यक्तियों को एनीमिया (Anaemia), पेट के रोग, अतिसार (Dysentery), बवासीर (Haemorrhoids), मस्से, संग्रहणी तथा सूजन (Edema) जैसी तकलीफ है उन्हें सुबह पानी बिल्कुल नहीं पीना चाहिए-

ज्यादा पानी पीने से आमाशय में कफ की वृद्धि होती है जिस से शरीर फूलता है ज्यादा पानी पीने से पेट में रहने वाला पाचाग्नि मंद हो जाता है जिससे पाचन क्षमता कमजोर होती है तथा अन्न का अच्छी तरह से पाचन ना होने से शरीर को पोषण भी नहीं मिल पाता है-

आयुर्वेद और संस्कृति-


पहले के जमाने में बच्चे खेल कर जब घर आते थे तो उनको तुरंत पानी पीने से टोका जाता था अगर बाहर से कोई मेहमान आता था तो उन्हें थोड़ी देर बिठाकर फिर जलपान कराया जाता था-

आजकल किसी भी मेहमान को बाहर से आते ही ठंडा पानी या कोल्डड्रिंक देने की कुप्रथा बड़ी प्रचलन में है जिससे मंदाग्नि और अरुचि तथा अन्य कई रोग प्रचुरता से देखने को मिल रहे हैं-

स्वतन्त्रता पूर्व एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि भारत भ्रमण के दौरान जब मैं उत्तर भारत के दौरे पर था तब मैंने गर्मियों में वहां लोगों को प्याऊ लगाकर अनजाने राहगीरों को मुफ्त में पानी पिलाते देखा और मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि हमारे देश में कोई किसी को मुफ्त में पानी तक नहीं पूछता है लेकिन मैं जब वहां गया तब मुझे अत्यंत आदर के साथ बैठाया गया तथा उबले हुए मुंग खाने को दिए और उसके बाद ही मुझे पानी दिया गया उनका यह आथित्य सत्कार देखकर मेरा दिल भारतीय लोगों के प्रति धन्यवाद व सहानुभूति से भर गया- 

पहले के जमाने में गर्मियों में सेवाभावी लोग प्याऊ लगाते थे लेकिन वहां पानी पीने आने वाले लोगों को पहले पानी ना देकर चने, उबले हुए मूंग या गुड़ खाने को देकर ही लोगों को पानी पिलाया जाता था और यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि पहले के लोग हमसे ज्यादा शक्तिशाली व स्वस्थ थे क्योंकि वे लोग दवा की नही बल्कि उचित जीवनशैली व आयुर्वेद के शरण में थे और योग्य जीवनशैली ही स्वास्थ की बुनियाद है रोकथाम हैं और उपचार भी हैं-

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