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9 अगस्त 2018

नैसर्गिक शारीरिक वेग रोकने से होने वाले रोग व उनकी चिकित्सा

Diseases Due to Suppressing Non Suppressible Urges


आयुर्वेद में रोग होने के कारणों में (Cause of diseases) सबसे प्रमुख कारण प्रज्ञाअपराध बताया गया है यानी मनुष्य की खानपान, आहार विहार (Life style) आचार विचार की अयोग्यता तथा बुरी आदतें, अक्सर नशीले पदार्थों का सेवन करना ही बुरी आदतों में शुमार माना जाता है लेकिन असंयमित, अविवेकी, तथा अयोग्य जीवन शैली व हित अहित का दीर्घ विचार न करते हुए जीवन व्यतीत करना भी प्रज्ञा अपराध ही है अक्सर डॉक्टर्स या वैद रोगी  परिक्षण के समय रोगी की जीवन शैली (Life style) तथा भोजन शैली ही पूछते हें लेकिन अगर थोड़ा विस्तार से पुछा जाय तो अक्सर रोगी की ऐसी आदतों के बारे में पता चलता है जिसमे उन्हें मजबूरी या आदत वश या कभी कभी लोक लाज वश नैसर्गिक आवेग (Natural Urges) रोकने की आदत पड जाती है और अगर लम्बे समय तक यह आदत बनी रहे तो इसके परिणाम स्वरूप शरीर को हानि तथा रोग होते हुए देखे जा सकते है-

नैसर्गिक शारीरिक वेग रोकने से होने वाले रोग व उनकी चिकित्सा

महर्षि चरक ने भगवान अत्रेय के हवाले से 13 तरह के अधारणीय वेग कहे है जिनको किसी भी कारणवश रोकना शरीर के लिए हानिकारक तथा रोगों के उद्गम का मूल कारण हो सकता है आचार्य चरक कहते हैं की मूत्र, मल, शुक्र, अपान वायु, वमन, छींक, डकार, जंभाई, भूख, प्यास, आंसू, निंद्रा, और भारी परिश्रम से चलने वाली तेज सांसो के आवेग को कभी भी नहीं रोकना चाहिए-

नैसर्गिक शारीरिक वेग रोकने से होने वाले रोग व उनकी चिकित्सा

         न वेगानम् धारये द्वि माआतान मुत्रपुरीषयो
         न रेतसो न वातस्य न च्छर्धा: क्षव्योर्णच ।।
         नोद्रारस्य न जुभभ्या न वेगान् क्षुतिप्पास्यो।
         न बाष्पस्य न निंद्राया नि:श्वासस्य श्रमेण च ।।

अधारणीय वेग (Non suppressible Urges) को धारण करने से यानी रोकने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा-


मूत्र वेग को रोकने से होने वाले रोग-


आए हुए मूत्र का वेग रोकने से कमर तथा लिंग में दर्द, पथरी, सिर दर्द, पेडू में दर्द, भारीपन, कमर दर्द, पैरों में सूजन (Edema) व दर्द जैसे लक्षण या समस्या उत्पन्न हो सकती है-

मूत्रावरोधजन्य रोगो की चिकित्सा- 


स्वेदन, अवगाहन याने (Tub Bath), अभ्यंग तथा घी का अवपीड़न व अनुवासन, निरूहा तथा उत्तर यह तीनों तरह की बस्ती प्रकृति व जरुरत के हिसाब से प्रयोग करनी चाहिए-

पुरीषवेगावरोध जन्य रोग-


पूरीश यानी मल का वेग रोकने से पक्वाशय तथा सिर में वेदना, अपान वायु के रुकने से पेट का फूलना (Bloating) तथा पेट दर्द, मल का स्तंभन होने से तथा आंतों में गर्मी बढ़ने से गुदाद्वार में घाव, मस्से, बवासीर, गुदाद्वार की जलन, सूजन तथा जांघों व पिंडलियों में ऐंठन और पेट में गुड़गुड़ाहट की शिकायत हो सकती हैं-

चिकित्सा- 


मल को रोकने से होने वाली समस्याओं में स्वेदन, अभ्यंग (oil Bath) अवगाहन, गुदा में वर्ती रखना (Suppositories), बस्तीकर्म, विरेचन कर्म तथा पथ्य कर अन्नपान का सेवन हितकर होता है-

शुक्रावरोधजन्य रोग- 


शुक्र का वेग रोकने से मूत्रइंद्रिय शिश्न तथा वृषण में शूल अथवा दर्द, अंगों का ढीलापन, ह्रदय में वेदना और मूत्र का रुक-रुक कर आना जैसे उपद्रव होने लगते हैं-

चिकित्सा- 


ऐसे उपद्रवों में वातनाशक तेल से अभ्यंग, मालिश, अवगाहन, मदिरापान, मुर्गे के मांस का भक्षण, षष्ठींशाली चावल तथा दूध का सेवन, निरूहा बस्ती और मैथुन हितकर होते हैं-

अपान वायु का वेग रोकने से होने वाले रोग- 


अपानवायु रोकने से वात, मूत्र और मल की रुकावट, पेट फूलना बिना श्रम के थकावट लगना (Fatigue) पेट दर्द तथा अन्य वात संबंधी रोग हो जाते हैं-

चिकित्सा- 


अपान वायु का वेग रोकने से होने वाले उपद्रवों में स्नेहन, स्वेदन व्रती, गुदा व्रती, वाताअनुलोमक या वातहर खान पान तथा वातहर औषधीय काढे से बस्ती कर्म या एनिमा (Enema) का प्रयोग हितकर है-

वमन का वेग रोकने से होने वाले रोग- 


निकलते हुए वमन का वेग रोकने से छाती में जलन (Burning) कण्डू, दाद, खाज, खुजली (Itching) भोजन में अरुचि, सूजन, ज्वर, पांडु रोग, कुष्ठ रोग, चक्कर आना (Nausea) तथा विसर्प रोग होते हैं-

चिकित्सा- 


ऐसे लोगों में वमन कारक औषधि खिलाकर वमन करवाना, धूम्रपान, लंघन, रक्तमोक्षण (Blood letting) पथ्यकर तथा रूक्ष अन्न पान का सेवन, व्यायाम तथा विरेचन करवाना हितकर होता है-

छींक का वेग रोकने से होने वाले रोग-


छींक का वेग रोकने से सिर दर्द, मुंह का लकवा (Facial Palsy) आंखों की कमजोरी, माइग्रेन (Hemicrania)  साइनस तथा ज्ञान इंद्रियों की दुर्बलता जैसे रोग हो सकते हैं-

चिकित्सा- 


वातनाशक तेल से अभ्यंग, सिर की मालिश (Head Massage) चेहरे की मालिश, नस्य तथा भोजन के बाद धृत पान करना लाभदायक होता है-

डकार के वेग रोकने से होने वाले रोग- 


डकार के वेग को रोकने से हिचकी (Hiccup) श्वास, भोजन में अरुचि, कम्प, ह्रदय और छाती में जकड़न होती है-

चिकित्सा- 


नस्य, स्नेहन और स्वेदन (Steam bath)-

जमाई के वेक को रोकने से होने वाले रोग- 


जमाई रोकने से विनाम, शरीर का झुकना, आक्षेप (Convulsion), संकोच याने अंगों का सिकुड़ना, झुकना, तथा हाथ-पैरों में कम्प होने लगता है-

चिकित्सा- 


नस्य, शिरोबस्ति, शिरोधारा तथा वातनाशक औषधियों का सेवन-

भूख के वेग को धारण करने से होने वाले रोग- 


भूख के वेग को रोकने से शरीर में कृशता, दुर्बलता, वजन कम होना, अंगों में वेदना, पित्ताशय की पथरी (Gallbladder stone) निम्न रक्तचाप, शरीर में शुगर की मात्रा कम हो जाना, भूख मर जाना, अरुचि, एसिडिटी (Acidity) चक्कर आना, कुपोषण (Malnutrition) तथा सिर दर्द जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं-

चिकित्सा- 


त्वरित मधुर पदार्थों का सेवन, ग्लूकोज का सेवन तथा भोजन करना हितकर होता है पौष्टिक अन्नऔषधि का सेवन भी लाभदायक होता है-

प्यास के वेग को धारण करने से होने वाले रोग- 


प्यास के वेग को रोकने से कंठ और मुंह का सूखना, डिहाइड्रेशन (Dehydration) बहरापन, थकावट, अवसाद, हृदय में पीड़ा, रूक्ष त्वचा (Xeroderma) तथा किडनियों को क्षति पहुंचती है-

चिकित्सा- 


इसमें तृषा हर फलों (Citrus Fruits) फलों के रसों (Fruit Juice) शरबत तथा शीतल द्रव्यों का सेवन करना तथा चेहरे और माथे पर बर्फ मलना हितकर होता है-

आंसू के वेग को रोकने से होने वाले रोग- 


आंसू रोकने से नेत्र रोग, ह्रदय रोग, भोजन में अरुचि, सर चकराना, उदासीनता, अवसाद, ह्रदय का भारीपन, तथा अन्य शारीरिक और भावनात्मक (Emotional Blockages) जैसे उपद्रव होते हैं-

चिकित्सा- 


शयन, नेत्रांजंन, आराम, मनोरंजन तथा कपालभाति प्राणायाम-

निंद्रा वेग को रोकने से होने वाले रोग- 


निंद्रा वेग को रोकने से जम्हाई, बदन दर्द (Body pain) तंद्रा, सिर दर्द, आलस्य (Lethargy) नेत्रों का भारीपन, अरुचि, याददाश्त का कम होना, एकाग्रता का कम होना, बाल झड़ना (Hair fall) थकान जैसे उपद्रव हो सकते है-

चिकित्सा- 


पथ्य अपथ्य के साथ हल्का व सुपाच्य भोजन, योग्य आराम, शिरोबस्ती, शिरअभ्यंग (Head Massage) पादाभ्यंगम, पूरे बदन की मालिश (Body Massage) शिरोधारा तथा शवासन व ध्यान करना हितकर है-

श्रम जन्य निश्वास को धारण करने से होने वाले रोग- 


कड़ा परिश्रम करने से उत्पन्न श्वासवेगो को रोकने से गुल्म, ह्रदय रोग, छाती में दर्द (Chest Pain) पीठ में दर्द व मूर्छा रोग होते हैं तथा फेफड़ों को क्षति पहुंचकर फेफड़े कमजोर हो जाते हैं-

चिकित्सा- 


उचित विश्राम, वातनाशक आहार का सेवन तथा प्राणायाम करना उचित चिकित्सा है-

इस तरह महर्षि चरक कहते हैं अधारणीय वेग (Non suppressible Urges) को ना रोक ना ही स्वास्थ्य के लिए हितकर है रोगों की उत्पत्ति न चाहने वाले व्यक्तियों ने किसी भी कारणवश उपरोक्त 13 अधारणीय वेगो को धारण नहीं करना चाहिए-

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Chetna Kanchan Bhagat Mumbai


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