उदर रोगों में अमृत समान आसव आरिष्टम

Asava-Arishtam in Abdominal Diseases


आयुर्वेद में जब भस्में व अन्य योग प्रचलन में नहीं थे तब सभी उपचार ताज़ी वनस्पतियों को खिलाकर किये जाते थे लेकिन इसमें एक समस्या थी क्योंकि बहुत सी जड़ी बूटियां (Herbs) केवल ऋतु विशेष में ही मिलती हैं इस कारण इनको पूरे वर्ष उपलब्ध करने के लिये औषिधियों को सुखाया जाने लगा व उपयोग करने योग्य बनाने के लिये क्वाथ, आसव व आरिष्ट बनाने की परम्परा तभी से आरम्भ हुई थी-

उदर रोगों में अमृत समान आसव आरिष्टम

सबसे पहले आपको बताना आवश्यक है कि आसव और आरिष्ट क्या होते हैं और किस लिए इसका उपयोग किया जाने लगा था तो आइये सबसे पहले आप इनके बारे में भी समझ लें चूँकि क्वाथ या काढ़े बना कर रखने के साथ एक समस्या ये रही कि इनका लम्बे समय तक परिरक्षण (Preservation) नहीं किया जा सकता था चूँकि उस युग में रेफ्रीजिरेटर उपलब्ध नहीं होते थे इसलिए ये समस्या गर्मियों के मौसम में और अधिक उग्र हो जाती थी जब इनमें सडन उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता था तथा दूसरा कारण ये रहा कि जब कोई द्रव्य शुद्ध पानी की अपेक्षा सुरा मिला कर दिया जाता है तो उसके योगवाही गुण (Bio availability) बढ़ जाते हैं इसलिए आयुर्वेद में आसव व अरिष्ट इस सन्दर्भ के रूप में हमारे सामने उभर कर आये-

अरिष्ट क्या है-


जब वनस्पति जड़ी-बूटी के काढ़े में कुछ गुड या चीनी मिला कर उसका खमीरीकृत संधान (Fermentation Process) कर बनाते हैं तो उसे अरिष्ट कहा जाता है-

आसव क्या है-


मिठासयुक्त (Carbohydrates Containing) ताज़ी जड़ी बूटियों से बिना उबाले खमीरीकृत संधान किये द्रव्य आसव कहलाये-

तो अब आप शायद समझ ही गए होंगें कि जो पहले काढ़ा बनाकर संधान किये जाएँ वे अरिष्ट तथा जो बिना उबाले खामिरिकृत किये जाएँ वे आसव कहलाते हैं-

आप जान लें कि आसव व अरिष्ट में एक सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इनमें कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) के सुरा में बदलने के कारण औषधि अधिक गुणकारी हो जाती है जो सुरा के योगवाही गुणों (Bio-availability Increase) के कारण होता है-दूसरे इससे पाचन क्रिया में भी सुधार होता है सुरा की मात्रा 5 से 10% तक होती है जो बहुत ही कम होकर औषधि को उत्तम योगवाही भी बना देती है-

आसव व अरिष्ट के संधान के लिये 30 से 40 दिन का समय चाहिए ताकि बैक्टीरिया (Bacteria) औषधि में उपलब्ध मिठासद्रव्यों को सुरामें बदल पायें इस अवधि को समाप्त करने के उद्देश्य से आयुर्वेदिक फ़ार्मुलेरी ऑफ इंडिया (AFI) ने आधुनिक निर्माण विधि में सीधे सुरा मिलाने की अनुमति भी दे रखी है लेकिन इससे कई लोगो को आसव सेवन से पेट मे जलन की शिकायतें हो सकती है-

उदर रोगों में अमृत समान आसव आरिष्टम

चूंकि आधुनिक समय मे पारम्परिक विधि से बने आसव और आरिष्ट उपलब्ध नही है इसलिए हम आपको घर मे ही आसव बनाने का निराप्रद तरीका बता रहे है आसव आरिष्टम पेट के रोगों में अमृत समान है अजीर्ण, एसिडिटी, अपचन, आफरा, पेटदर्द, कब्ज, पाइल्स, एसिड बनना, लिवर की कमजोरी इन सब तकलीफों में लाभदायक है-

आसव बनाने के लिए हमे अन्नानास, अंगूर, काले अंगूर, फालसा, संतरा, स्ट्रॉबेरी, चेरी, लीची जैसे फल आप ले सकते है यह आसव जब हम घर पर बनाते है तो वो शुद्धता के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होते है और हम जरूरत के मुताबिक उसमे सामग्री कम या ज्यादा डाल सकते है-

सामग्री-


एक से डेढ़ किलो फल- (छोटे टुकड़ों में कटे हुए ऊपर लिखे है उसमें से कोई भी)
चीनी- एक किलो 
अदरक- 50 ग्राम 
जीरा- 25 ग्राम 
एक्टिव ईस्ट- 25 ग्राम
शुद्ध उबला हुआ पानी- 1 लीटर

बनाने की विधि-


एक कांच के (चौड़े मुह वाला बर्तन जिसमे ढक्कन भी हो जैसे जो पहले अचार डालने के काम आता था) बर्तन को धो कर सूखा कर उसमे 2 से 3 इंच परत फलों की टुकड़े छोटे काट के (थोड़ा दबाके जिससे रस आसानी से निकले) आप बिछा दें-

अब अदरक के छोटे छोटेे टुकड़ो को चीनी में मिलाकर फलों की परत के ऊपर शक्कर की 2 इंच की परत बनाए इस तरह फलों और शक्कर की परत बनाले तो अब इसमें 1 लीटर पानी डाल दे और ऊपर से एक्टिव यीस्ट को भी डाल दे तथा बर्तन को पक्का ढक्कन लगाकर 21 दिन के लिए सूखे और कम सूर्य प्रकाश वाली जगह पर रख दे तथा 3-4 दिन में एक बार सामग्री को अच्छे से हिलाते रहे-आपका 21 दिन बाद स्वादिष्ट आसव आरिष्टम तैयार है अब इसे छान कर दूसरी बाटलो में भर कर रख दे-

लाभ-


उल्टी, दस्त, भूख ना लगना, कमजोर पाचनाग्नि, बेस्वाद और मुँह का स्वाद बिगड़ना जैसी बीमारियों में इस आसव को तीन चम्मच आधे कप पानी और चुटकी भर सेंधा नमक के साथ लेने से लाभ होता है-

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