Soybeans Nutrition and Health Effects-सोयाबीन पोषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव

सोयाबीन का स्वास्थ्य पर प्रभाव (Impact of Soya Bean on Health)-


हमारे पिछले दो लेख पढ़ कर आप सोयाबीन (Soybean) की उपयोगिता, गुणवत्ता और लाभप्रद क्षमता को जान ही चुके होंगे। अब इस जानकारी का सदुपयोग तभी हो सकेगा जब आप सोयाबीन को अपने आहार में शामिल करेंगे। इस लेख में हम आपको सोयाबीन का किन रोगों पर क्या फायदा होता है इसके बारे में आपको अवगत कराने का प्रयास करेगें। 


Soybeans Nutrition and Health Effects-सोयाबीन पोषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्रोटीन और सोयाबीन (Proteins and Soybeans)-


प्रोटीन शरीर के विकास के लियें आवश्यक है। त्वचा, मांसपेशियां, नाखून, बाल वगैरह की रचना प्रोटीन से होती है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क (दिमाग), दिल, फेफड़े आदि मनुष्य शरीर के आंतरिक अंगों की रचना में प्रोटीन के स्रोत सोयाबीन (Soybean), अंकुरित गेहूं, बिनौल का आटा, चना, मसूर, मटर, सेम तथा विभिन्न प्रकार की दालें, मूंगफली इत्यादि में है 

प्रोटीन युक्त सोया मिल्क गाय भैंस के दूध का बहुत अच्छा विकल्प है। बहुत से लोग मैडिकल कारण की वजह से सामान्य दूध प्रयोग में नहीं लाते है या फिर वे लोग जो जानवरो से प्राप्त किये हुये पदार्थ नहीं खाते पीते हैं या फिर ऐसे बच्चे जिनमें लेक्टोज से परेशानी होती है उनके लिये तो सोया मिल्क ही एक मात्र अच्छा विकल्प है। 

सोयाबीन का दूध न्यूट्रीसियस होते हुये भी घर में बनाने में काफी सस्ता पड़ता है। एक लीटर सोयाबीन (Soybean) दूध बनाने के लिये लगभग 125 ग्राम सोयाबीन की आवश्यकता होती है। 

महिलाओं के लिए सोयाबीन के फायदे (Benefits of Soybean for Females)-


महिलाओं के लिए सोयाबीन (Soybean) विशेष रूप से लाभप्रद और उपयोगी है। गर्भवती और नव प्रसूता स्त्री को सोयाबीन से बने व्यंजन, सोयाबीन से बना दूध, दही आदि का सेवन कराना चाहिए। सोयाबीन का आटा, दूध, दही आदि के सेवन से गर्भवती का शरीर तो पुष्ट और बलवान बनता ही है और साथ ही गर्भस्थ शिशु को भी पुष्टि प्राप्त होती है। 

जिन गर्भवती महिलाओं का शरीर व् स्वास्थ्य कमज़ोर हो उन्हें पूरे गर्भकाल में सोयाबीन के आटे की रोटी, सोयाबीन (Soybean) से बना दूध, दही तथा अन्य व्यंजनों का उचित मात्रा में सेवन करना चाहिए। इससे उनके शरीर की कमज़ोरी दूर होगी तथा शरीर शक्तिशाली होगा और गर्भस्थ शिशु का भी शरीर मज़बूत होगा और वो एक स्वस्थ, सुडौल तथा निरोग शिशु को जन्म दे सकेगी। 

सोयाबीन में पाया जाने वाला ओमेगा 3 नामक वसा युक्त अम्ल महिलाओं में जन्म से पहले से ही उनमें स्तन कैंसर से बचाव करना आरम्भ कर देता है। जो महिलायें गर्भावस्था तथा स्तनपान के समय ओमेगा 3 अम्ल की प्रचुरता युक्त भोजन करती है उनकी संतानों कें स्तन कैंसर की आशंका कम होती है। महिलाओं की सेहत के लियें सोयाबीन बेहद लाभदायक आहार है।

उच्च रक्तचाप और सोयाबीन (High Blood Pressure and Soybeans)-


रोज कम नमक में भुने आधा कप सोयाबीन (Soybeans) का 8 हफ्तों तक सेवन करने से ब्लड़प्रेशर काबू मे रहता है। इसका स्वाद बढ़ाने के लियें इसमें काली मिर्च भी डालकर सकते हैं। सिर्फ आधा कप रोस्टेड सोयाबीन खाने से महिलाओं का बढ़ा हुआ ब्लडप्रेशर कम होने लगता है। लगातार आठ हफ्ते तक सोयाबीन खाने से महिलाओं का 10 प्रतिशत सिस्टोलिक प्रेशर और 7 प्रतिशत डायस्टोलिक और सामान्य महिलाओं का 3 प्रतिशत ब्लडप्रेशर कम हो जाता है।

कमजोर हड्डी और सोयाबीन (Weak Bone and Soybeans)-


सोयाबीन (Soybeans) हडि्डयों से सम्बन्धित रोग जैसे हडि्डयों में कमजोरी को दूर करता है। सोयाबीन को अपनाकर हम स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं। अस्थिक्षारता एक ऐसा रोग है जिसमें हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं और उसमें फैक्चर हो जाता है। हडि्डयो में कैल्श्यिम की मात्रा कम हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि हडि्डयां टूटती ज्यादा है और बनती कम है। ऐसे में आपके लिए सोयाबीन का सेवन हितकारी है। 

मानसिक रोग और सोयाबीन (Mental Illness and Soybean)-


सोयाबीन (Soybeans) में फॉस्फोरस इतनी होती है कि यह मस्तिष्क (दिमाग) तथा ज्ञान-तन्तुओं की बीमारी, जैसे-मिर्गी, हिस्टीरिया, याददाश्त की कमजोरी, सूखा रोग (रिकेट्स) और फेफड़ो से सम्बन्धी बीमारियों में उत्तम पथ्य का काम करता है। सोयाबीन के आटे में लेसीथिन नामक एक पदार्थ पाया जाता है। जो मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं तथा लीवर के लियें फायदेमंद है। तपेदिक और ज्ञान-तन्तुओं की बीमारी में बहुत लाभ पहुंचता है। भारत में जो लोग गरीब है या जो लोग मछली आदि नही खा सकते है उनके लियें यह मुख्य फास्फोरस प्रदाता खाद्य पदार्थ है। इसको खाना गरीबों के लियें सन्तुलित भोजन होता है।

दिल के रोग और सोयाबीन (Heart disease and Soybeans)-


सोयाबीन में 20 से 22 प्रतिशत वसा पाई जाती है। सोयाबीन की वसा में लगभग 85 प्रतिशत असन्तृप्त वसीय अम्ल होते हैं जो दिल के रोगियों के लियें फायदेमंद है। इसमें ‘लेसीथिन’ नामक प्रदार्थ होता है। जो दिल की नलियों के लियें आवश्यक है। यह कोलेस्ट्रांल को दिल की नलियों में जमने से रोकता है। 

सोयाबीन खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए यह दिल के रोगियों के लिये फायदेमंद है। ज्यादातर दिल के रोगों में खून में कुछ प्रकार की वसा बढ़ जाती है जैसे-ट्रायग्लिसरॉइड्स, कोलेस्ट्रॉल और एलडीएल, जबकि फायदेमंद वसा यानी एचडीएल कम हो जाती है। सोयाबीन में वसा की बनावट ऐसी है कि उसमें 15 प्रतिशत सन्तृप्त वसा, 25 प्रतिशत मोनो सन्तृप्त वसा और 60 प्रतिशत पॉली असन्तृप्त वसा है। खासकर 2 वसा अम्ल, जो सोयाबीन में पायें जाते हैं। यह दिल के लियें काफी उपयोगी होते हैं। सोयाबीन (Soybeans) का प्रोटीन कोलेस्ट्रॉल एवं एलडीएल कम रखने में सहायक है साथ ही साथ शरीर में लाभप्रद कोलेस्ट्रॉल एचडीएल भी बढ़ाता है। 

रजोनिवृत्ति और सोयाबीन (Menopause and Soybean)-


महिलाओं में जब रजोनिवृत्ति (मासिकधर्म) होता है उस समय स्त्रियों को बहुत ही कष्ट होते हैं। रजोनिवृत्त महिलाएं हडि्डयों में तेजी से होने वाले क्षरण से मुख्य रूप से ग्रसित होती है जिसके कारण उन्हें आंस्टियो आर्थराइटिस बीमारी आ जाती है। घुटनों में दर्द रहने लगता है। यह इसलियें होता है क्योंकि मासिक धर्म बंद होने से एस्ट्रोजन की कमी हो जाती है। चूँकि सोयाबीन में फायटोएस्ट्रोजन होता है। जो उस द्रव की तरह काम करता है। इसलियें 3-4 महीने तक सोयाबीन का उपयोग करने से स्त्रियों की लगभग सभी कठिनाइयां समाप्त हो जाती है। महिलाओ को सोयाबीन (Soybeansन केवल अच्छे प्रकार का प्रोटीन देती है बल्कि मासिकधर्म के पहले होने वाले कष्टों-शरीर में सूजन, भारीपन, दर्द, कमर का दर्द, थकान आदि में भी बहुत लाभ करती है

मूत्र रोग और सोयाबीन (Urine disease and Soybean)-


सोयाबीन का रोजाना सेवन करने से मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी का मूत्ररोग (बार-बार पेशाब के आने का रोग) ठीक हो जाता है। 

मधुमेह और सोयाबीन (Diabetes and Soybean)-


सोयाबीन (Soybeans) मोटे भारी-भरकम शरीर वालों के तथा मधुमेह (डायबिटीज) वाले लोगों के लियें उत्तम पथ्य है। सोयाबीन आटे की रोटी इनके लिए एक उत्तम आहार है 

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