How to Prevent Children from Arbitrariness-बच्चो को मनमानी करने से कैसे रोकें

क्या आप परफेक्ट माता-पिता हैं (Are You Perfect Parent)-


ये जरुरी नहीं है आप दुनियां के सबसे अच्छे माँ-बाप है और ये भी जरुरी नहीं है कि आप अपने बच्चों (Children) को सही प्रकार से गाइड कर रहे है। वैसे तो हर माँ-पिता अपने बच्चो के लिए अच्छा बनाने के लिए न जाने क्या-क्या प्रयास करते है लेकिन तब भी ये जरुरी नहीं है कि सभी माता-पिता परफेक्ट ही होगें। ये भी तो हो सकता है कि बच्चों को सही मार्ग दिखाने की आपकी गाइड-लाइन गलत हो। क्यूंकि आखिर बच्चे तो जिद्दी होते ही है। 

How to Prevent Children from Arbitrariness-बच्चो को मनमानी करने से कैसे रोकें

बच्चों के कार्यों के लिए माता-पिता की जिम्मेदारी (Parental Responsibility for Children's Actions)-


बच्चों को बेहतर बनाने के उपाय (Tips for Improving Children)-


1- यदि आपका बच्चा (Child) आपसे सीधी जिद करे तो कुछ माता-पिता सीधा-सीधा एक फरमान जारी कर देते हैं कि तुम जो मांग रहे हो वह तुम्हें नहीं मिलेगा। लेकिन कई बार बच्चे की मांग जायज भी होती है। कोई-कोई माता-पिता तो अक्सर बिना सोचे-समझे बच्चे की इच्छा पूरी भी कर देते हैं ताकि उनकी बातचीत में दखल न हो या फिर दूसरों के सामने उनकी इमेज खराब न हो। लेकिन हो सकता है कि बच्चे की हर जिद को पूरी करना आगे चल-कर आपके और आपके बच्चे के लिए दुखदाई साबित हो।

How to Prevent Children from Arbitrariness-बच्चो को मनमानी करने से कैसे रोकें

2- आप वैसे बच्चे (Children) को हमेशा जादा रोकें-टोकें नहीं।लेकिन हर बात के लिए "हां" करना भी गलत है और हमेशा "ना" करना भी सही नहीं है। यानि 'डोंट डू दिस, डोंट टू दैट' का रवैया सही नहीं है। जो बात मानने वाली है उसे आपको मान लेना भी चाहिए। क्युकि अगर उसकी कुछ बातें मान ली जाएंगी तो वह जिद कम करेगा। मसलन कभी-कभी खिलौना दिलाना या उसकी पसंद की चीजें खिलाना जैसी बातें आप मान भी सकते हैं।

3- लेकिन एक बात का ध्यान रहे कि अगर एक बार इनकार कर दिया तो फिर बच्चे की जिद के सामने झुककर हां न करें। यदि बच्चे (Children) को अगर यह मालूम हो कि मां या पापा की 'हां' का मतलब 'हां' और 'ना' का मतलब 'ना' है। तो फिर वह जादा जिद नहीं करेगा

4- ये भी एक जरुरी बात ध्यान रखें कि बच्चे (Children) के किसी भी मसले पर मां-पापा दोनों की सहमति होनी जरूरी है। ऐसा न हो कि एक इनकार करे और दूसरा उस बात के लिए मान जाए। अगर एक सख्त है और दूसरा नरम है तो बच्चा इसका फायदा उठाता है। जो बात नहीं माननी है उसके लिए बिल्कुल साफ इनकार करें और पुरजोर देकर इन्कार करें। ये काम आप दोनों पति-पत्नी मिलकर करें तथा अगर घर में बाकी लोग हैं तो वे भी बच्चे की तरफदारी न करें तभी आपके बच्चे में कुछ दिनों बाद सुधार आएगा।

5- आप अपने बच्चे के सामने खुद को कमजोर बनकर न दिखाएं और न ही उसके सामने रोएं। इससे बच्चा ब्लैकमेलिंग सीख लेता है और बार-बार इस हथियार का इस्तेमाल करने लगता है। आप यह न कहें कि अगर तुम यह काम करोगे तो हम वैसा करेंगे। मसलन अगर तुम होमवर्क पूरा करोगे तो आइसक्रीम खाने चलेंगे। उससे कहें कि पहले होमवर्क पूरा कर लो फिर आइसक्रीम खाने चलेंगे। इससे उसे पता रहेगा कि अपना काम करना कितना जरूरी है और बच्चा (Child) भी समझ जाता है कि ऐसे में फिजूल जिद बेकार है।

How to Prevent Children from Arbitrariness-बच्चो को मनमानी करने से कैसे रोकें

6- आप बच्चे (Children) से बहस की बजाय कई बार समझौता कर सकते हैं कि चलो तुम थोड़ी देर कंप्यूटर पर गेम्स खेल लो और फिर थोड़ी देर पढ़ाई कर लेना। इससे बच्चा दुनिया के साथ भी नेगोशिएट (Negotiateकरना सीख जाता है। हालांकि ऐसा हर बार न हो वरना बच्चे में ज्यादा चालाकी आ जाती है।

7- यह भी देखें कि बच्चा जिद कर रहा है या आप जिद कर रहे हैं। क्योंकि कई बार पैरंट्स भी बच्चे की किसी बात को लेकर ईगो इशू बना लेते हैं। तो यह भी सरासर गलत है।

8- आपका बच्चा  टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, गेम्स से चिपका रहे तो कई पैरंट्स सीधे आकर टीवी या कंप्यूटर ऑफ कर देते हैं और कई माता-पिता रिमोट छीनकर अपना सीरियल या न्यूज देखने लगते हैं। इसी तरह कुछ मोबाइल छीनने लगते हैं और कुछ इतने बेपरवाह होते हैं कि ध्यान ही नहीं देते कि बच्चा कितनी देर से टीवी देख रहा है या गेम्स खेल रहा है। आपको सभी कार्यक्रम के लिए एक समय निर्धारित करना आवश्यक है।

9- कई बार मां अपनी बातचीत या काम में दखलंदाजी से बचने से लिए बच्चों से खुद ही बेवक्त टीवी देखने को कह देती हैं। बच्चे से रिमोट छीनकर बंद न करें और न ही अपनी पसंद का प्रोग्राम लगाकर देखने बैठ जाएं। आप अपने बच्चे (Children) को कुछ बनाना चाहते है तो अपना टीवी देखना कम करें। क्युकि अक्सर बच्चे स्कूल से आते हैं तो मां टीवी देखती मिलती है।

10- बच्चे की पसंद के हर प्रोग्राम में कमी न निकालें कि यह खराब है। बल्कि आप उससे पूछें कि वह जो देख रहा है उससे उसने क्या सीखा और हम भी वह प्रोग्राम देखेंगे।

बच्चों में अनुशासन की शुरुवात कब करें (When to Start Discipline in Children)-


1- आपने कई बार लोगों को अपने एक-दो साल के बच्चों पर चिल्लाते हुए देखा होगा। बच्चे (Children) के बोतल फेंक देने पर या चुप न होने पर कई मां-बाप उन्हें डांट कर चुप कराने की कोशिश करते हैं। लेकिन असल में इस उम्र में बच्चों को अनुशासन सिखाने का कोई फ़ायदा नहीं होता है। सबसे पहले आप जाने कि किस उम्र से बच्चे सीखने योग्य हो जाते हैं और आपको कब उन्हें अनुशासन सिखाना शुरू करना चाहिए।

2- आप कितनी ही कोशिश कर लें लेकिन बच्चे के दो-तीन साल का होने तक आप उसे अनुशासन नहीं सिखा सकते हैं। वो आपकी बातों पर प्रतिक्रिया ज़रूर दे रहे होते हैं लेकिन उनका दिमाग तब तक इतना विकसित नहीं होता है कि वो कुछ सीख सकें। दरअसल में दो तीन साल के बच्चे इस उम्र से पहले सिखाई गयी बातों को ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं। आपके उन्हें सिखाने के सभी प्रयास बेकार हो जाते हैं। इससे माता-पिता को निराशा (Frustration) हो सकती है।

3- यदि आप छोटी उम्र के बच्चों पर चिल्लाते हैं तो उन पर बड़े होने तक भी इसका बुरा असर रहता है। ये बच्चे के मानसिक विकास में बाधा बन सकता है। वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि बच्चे लिए उतना ही बुरा होता है जितना कि माता-पिता द्वारा मार-पीट करना होता है। 

4- इस उम्र में बच्चे आपका ध्यान पाने के लिए कई बार उल्टी हरकतें करते हैं। उन्हें कुछ ग़लत करने पर सबका ध्यान मिलने लगता है। इससे बचने के लिए आप उन्हें कुछ समय के लिए इग्नोर कर सकते हैं। इससे उन्हें सन्देश मिलेगा कि ज़रूरी नहीं है कि रोने से ही उन्हें अटेंशन मिलेगा। 

सिखाने की शुरुआत कब करें (When to Start Teaching)-


आपका बच्चा (Child) जब स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाये तो उसे अनुशासन सिखाना शुरू करें। इस वक़्त तक बच्चे का दिमाग काफ़ी विकसित हो जाता है और वो चीज़ें सीखने में सक्षम हो जाता है। उन्हें ग़लत करने के परिणाम भी समझ आने लगते हैं।

इस वक़्त आपको उन्हें अपनी गलतियों से खुद सीखने का मौका भी देना चाहिए। यदि बच्चा गिर जाता है और उसे चोट लगती है तो उसे समझ आ जाता है कि ऐसा करने से उसे दर्द हो सकता है। 

बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से चीज़ों को समझने लगता है। उससे पहले आपको उसे बच्चा ही रहने देना चाहिए। आप एकदम से उसे सब कुछ नहीं सिखा सकते हैं। 

बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन (Nutritional Food for Children)-


अक्सर बहुत सी मां को लगता है कि मेरा बच्चा (Child) तो कुछ खाता ही नहीं है और वह जबरन उसे खिलाने की कोशिश भी करती है अगर वह हेल्दी खाना नहीं खाना चाहता तो मां उसे मैगी, पिज्जा, बर्गर आदि खिला देती है। उसे लगता है कि इस बहाने वह कुछ तो खाएगा। कई पैरंट्स खुद खूब फास्ट फूड खाते हैं या इनाम के तौर पर बच्चे को बार-बार फास्ट फूड की ट्रीट देते हैं बल्कि आप बच्चे के साथ बैठकर हफ्ते भर का घर का मेन्यू तय करें कि किस दिन कब क्या बनेगा। इसमें एक-आध दिन नूडल्स जैसी चीजें शामिल कर सकते हैं। अगर बच्चा रूल बनाने में शामिल रहेगा तो वह उन्हें फॉलो भी करेगा। यह काम तीन-चार साल के बच्चे के साथ भी बखूबी कर सकते हैं।

कभी-कभी बच्चे की पसंद की चीजें बना दें। लेकिन हमेशा ऐसा न करें। पसंद की चीजों में भी ध्यान रहे कि पौष्टिक खाना जरूर हो। इस डर से कि खा नहीं रहा है तो कुछ तो खा ले। इसलिए नूडल्स, सैंडविच, पिज्जा जैसी चीजें बार-बार न बनाएं वरना वह जान-बूझकर भूखा रहने लगेगा और सोचेगा कि आखिर में उसे पसंद की चीज मिल जाएगी। जब भूख लगेगी तो बच्चा नॉर्मल खाना खा लेगा। 

बच्चे टीचर्स की बातें मानते हैं इसलिए टीचर से बात करके टिफिन में ज्यादा और पौष्टिक खाना पैक कर सकते हैं ताकि वह स्कूल में खा ले। बच्चे को हर वक्त जंक फूड खाने से न रोकें बल्कि उसके साथ बैठकर तय करें कि वह हफ्ते में एक दिन जंक फूड खा सकता है तथा इसके अलावा, दोस्तों के साथ पार्टी आदि के मौके पर इसकी छूट होगी। नहीं खाना है ये कहने के बजाय उसे समझाएं कि ज्यादा जंक फूड खाने के क्या नुकसान हो सकते हैं। लॉजिक देकर समझाने से वह खाने की जिद नहीं करेगा। 

यहाँ एक बात यह भी समझने की है कि पैरंट्स खुद भी जंक फूड न खाएं तथा इसके अलावा जिस चीज के बारे में एक बार कह दिया कि इसे खाना गलत है तो बाद में किसी बात से खुश होकर बच्चे को उसे खाने की छूट न दें।

छोटे बच्चों को खाने में क्रिएटिविटी अच्छी लगती है इसलिए उनके लिए जैम, सॉस आदि से डिजाइन बना दें। सलाद भी अगर फूल, चिड़िया, फिश आदि की शेप में काटकर देंगे तो वह खुश होकर उसे भी खा लेगा।

क्या आप परफेक्ट माता-पिता बन चुके हैं (Have you Become Perfect Parents)-


आप ध्यान दें कि दुनिया में कोई भी पैरंट्स परफेक्ट नहीं होते है कभी यह न सोचें कि हम परफेक्टली बच्चों को हैंडल करेंगे तो वे गलती नहीं करेंगे। बच्चे ही नहीं-बड़े लोग भी गलती करते हैं अगर बच्चे को कुछ सिखा नहीं पा रहे हैं या कुछ दे नहीं पा रहे हैं तो यह न सोचें कि एक टीचर या प्रवाइडर के रूप में हम फेल हो गए हैं। बच्चों के फ्रेंड्स बनने की कोशिश न करें। क्योंकि वे उनके पास काफी होते हैं। उन्हें आपकी जरूरत पैरंट्स के तौर पर है इसलिए पेरेंट्स ही बने दोस्त नहीं।

हमने जितना लिखना था उपर लिख दिया है बाकी आप खुद ही समझदार है वैसे ये बच्चा आपका है और इसकी नैतिक जिम्मेदारी भी आपकी है

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